अजीब ‘दासता’ है ये…

इन साल की 25 जनवरी की 2 खबरें हैं।

  • जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में कांग्रेस नेता शशि थरूर अतिथि के तौर पर आये थे। दो दिन पहले ही ‘प्रियंका वाड्रा’ को सीधे ही पार्टी का जनरल सेक्रेटरी ‘नियुक्त’ किया गया था।

मीडिया ‘नियुक्त’ मतलब appointed कहती है, मेरे ख़्याल से मनोनीत मतलब chosen सही शब्द रहता। because they are the chosen ones – थरूर इस बात की इशारों में पुष्टि करते हैं।

थरूर ने खुल कर स्वीकार किया कि कांग्रेस में गांधी परिवार का कोई विकल्प नहीं है। पार्टी में परिवार सबसे आगे, सर्वोपरि है – और हम कांग्रेसियों को उससे कोई गुरेज़ नहीं, अपितु हमने इस बात को सहर्ष स्वीकार कर लिया है।

‘सहर्ष स्वीकार’ कैसे – ‘सारे नेता परिवार के आगे झुक क्यों जाते हैं?’ – इस बात पर थरूर का कहना था, ‘अगर आज की तारीख में कांग्रेस के नेतृत्व के लिए अगर ‘free and fair’ चुनाव होते हैं, तो आप किसी भी मौजूदा कांग्रेस नेता को अगर वर्तमान अध्यक्ष के सामने रखोगे, वर्तमान अध्यक्ष ही जीतेंगे।

पार्टी का अस्तित्व परिवार से ही है; और इससे इतर किसी भी और विचारधारा को किसी भी तरह की स्वीकृति या सम्मान मिलेगा – इस बात को लगभग सिरे से खारिज करने वाले थरूर ये कहना नहीं भूले कि आगामी चुनाव ‘विविधता’ वाली भारत की आत्मा का मुक़ाबला भाजपा से है।

  • 25 जनवरी की ही शाम को दो और महानुभावों के साथ पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न दिए जाने की घोषणा हुई। 2004 से 2014 तक UPA कार्यकाल में रक्षा, विदेश और वित्त जैसे मंत्रालयों को संभालने वाले मुखर्जी देश के 13वें राष्ट्रपति थे।

वैसे अगर सन 69 से कांग्रेस में उनके कैरियर की शुरुआत देखी जाए तो वे इंदिरा के एकदम खास टीम में थे। यहाँ ये बात भी जानिएगा कि सन 54, 57 और 62 में तमिलनाडु में कद्दावर कांग्रेसी नेता के. कामराज ने ही सन 66 में इंदिरा को शास्त्री जी के आकस्मिक निधन के बाद प्रधानमंत्री बनवाया था।

सन 69 में ही जब कांग्रेस के दो फाड़ हुए, इंदिरा को बाहर निकाला गया। इंदिरा ने अपने समर्थकों को लेकर Congress (I) का गठन किया, जहाँ I stands for Indira. कामराज, मोरारजी देसाई, बीजू पटनायक जैसे दिग्गजों के अलग होने के बाद खाली हुई जगह में मुखर्जी बड़े अच्छे से Indira loyalist के रूप में स्थित हो गए।

सन 84 में इंदिरा की मृत्यु के बाद मुखर्जी को ये लगा कि उन्हें प्रधानमंत्री बनाया जाएगा, ना कि अनुभवहीन राजीव को। पर जब राजीव को कुर्सी सौंपी गई, तो उन्होंने अपनी अलग पार्टी तक बना ली। पर बाद में राजीव के समझाने के बाद वापस कांग्रेस में आ गए। सोनिया को अध्यक्ष बनाने में ही इन्हीं का हाथ था।

2004 में वापस प्रधानमंत्री बनने का जब मौका आया, तो इन्हें पीछे रखा गया और रोबोट से पादुका रखवा कर राज किया गया। दिक्कत ये ही थी कि प्रणब मुखर्जी के पास दिमाग था, और कद्दावर भी। इसलिए अगर कभी प्रधानमंत्री बन जाते, चाहे 1984 में चाहे 2004 में, परिवार से बड़े बनने के अवसर को हाथ से जाने ना देते।

खैर, जब वित्त मंत्री होते हुए कुछ मल्टीनेशनल कंपनियों के टैक्स मामले में मुखर्जी अडिग रहे तो उन्हें राष्ट्रपति बना कर साइडलाइन किया गया।

सन 14 में मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद मुखर्जी को वो इज्ज़त दी जिसकी वो भारतीय राजनीति के सार्वजनिक जीवन में 50 साल से अधिक बिताने के बाद कहीं न कहीं हकदार थे।

जब इस 25 जनवरी को उन्हें भारत रत्न की घोषणा हुई, तो कांग्रेस में खलबली मच गई। घंटे भर तो पार्टी और पार्टी अध्यक्ष के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से बधाई या शुभकामना का संदेश तक ना निकला। अगर बधाई दी भी तो इतनी हिम्मत नहीं कि भारत सरकार को धन्यवाद ज्ञापित कर पाए।

इससे इतर पूरा इकोसिस्टम ये साबित करने में लग गया कि ये संघ के प्रोग्राम में जाने के कारण मिला है।

रोज़ कांग्रेस की जूठन चाटने को तैयार बैठी आम आदमी पार्टी ने उन्हें lapdog of ambanis कहा तो राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने संघ में जाने का इनाम कह दिया।

2006 में भोपाल के अपने एक स्कूल का उदघाटन सोनिया गांधी से करवाने वाले, जिसमें तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को नहीं बुलाया गया, ऐसे भास्कर अख़बार की हैडलाइन थी कि ‘संघ के शाखा में जाने का मुखर्जी को मिला इनाम’। ऐसा ही कितने ही और अखबारों में था।

अगर यह सब छप रहा है तो इसमें कहीं ना कहीं परिवार की सहमति थी, बिना उसकी सहमति किसी पालतू अखबार की इतनी हिम्मत नहीं।

अगर किसी का कद परिवार से बढ़ने लगता है, तो नीचे से जमीन खोद दो, बौना कर दो उसे। एक पार्टी को 50 से ज्यादा साल देने वाले व्यक्ति को एक ही दिन में इसलिए छोटा साबित कर दिया जाता है क्योंकि उसका कद परिवार से ऊपर चला जाता। उस परिवार का जो खुद को जीते जी भारत रत्न दे सकता है, पर वाजपेयी या मुखर्जी तो क्या, कांग्रेसी रहे अम्बेडकर, पटेल या नरसिम्हा राव को नहीं।

ऊपर प्रदर्शित तस्वीर उस बात की ही बानगी है। आप अगर कांग्रेस में हो तो परिवार के साथ नहीं तो भले नाम की साथ फोटो खिंचवा लो, वो भी आपकी स्वामिभक्ति का वाजिब प्रमाण है।

आपको ज़बरदस्त फर्राटेदार अंग्रेज़ी आती होगी, आप विधि विशेषज्ञ होंगे, आप चाहे राजघराने वाले सिंधिया हो या गुर्जर वोट बैंक वाले स्मार्ट से पायलट, आप परिवार से आगे नहीं जा सकते, और जी-हुज़ूरी में, परिवार की गुलामी में ही आपका जीवन है। आपकी सारी काबिलियत सिर्फ इस बात के आगे बेबस है कि आपके नाम के आगे गांधी नहीं है।

परिवार की इस ‘दासता’ में ही आपका अस्तित्व है, जो परिवार से शुरू होकर परिवार पर ही खत्म होता है।

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