अर्थव्यवस्था-3 : अर्थव्यवस्था का मूल है ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’

पिछली कड़ी पर आईं प्रतिक्रियाएं उत्साहवर्धक थीं, कुछ ने भारत के बारे में कम लिखने पर निराशा जताई और कुछ लोगों ने कहा कि इस अर्थ व्यवस्था का राजनैतिक विश्लेषण भी करिए।

आज की चर्चा की शुरूआत हम ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ से करेंगे। यह एक बहुत पुरानी कहावत है जो अर्थ व्यवस्था का मूल है।

आप शांति प्रिय हैं तथा दूसरे की भैंस नहीं छीनना चाहते उस स्थिति में भी आपके पास लाठी होनी चाहिए, अपनी भैंसों को बचाने के लिए।

1950 में, नेहरू ने लाठी न रखने का निर्णय लिया और चीन आपकी लाखों एकड़ रूपी ज़मीन नामक भैंसें खोल ले गया।

आप में से कुछ लोग सिंगापुर और स्विट्ज़रलैंड का उदाहरण देने लग जाएँगे जिनके पास भारी सेना नहीं है, पर इन दो अर्थ व्यवस्थाओं ने अपने देश को दुनिया का बाज़ार बनाया है।

स्विट्ज़रलैंड, इटली, जर्मनी और फ्रांस से घिरा हुआ है और इन तीनों देशों के द्वारा पूर्ण रूप से सुरक्षित है।

सिंगापुर की सेना और चीनी सेना 1975 से ही साथ साथ हैं तथा सिंगापुर की भौगोलिक स्थल सीमा किसी प्रकार का अतिक्रमण नहीं है। इस विषय पर विस्तार से अगली कड़ियों में चर्चा करेंगे।

[अर्थव्यवस्था-1 : किस ओर जा रहा है विश्व]

[अर्थव्यवस्था-2 : बौद्धिक संपदा के बाद, अगली लड़ाई Artificial Intelligence को लेकर]

अब आते हैं आज की वैश्विक अर्थ व्यवस्था पर। एक टर्म कहा जाता अंतराष्ट्रीय क़र्ज़ बाज़ार में ‘Predatory lending’। अमेरिका, आज की तारीख़ में लगभग 20 ट्रिलियन डॉलर, चीन के क़र्ज़ में है, और जो संकेत मिल रहे हैं उससे यह लगता है बहुत जल्दी ही, अमेरिका, चीन के उपर प्रीडेटरी लेंडिंग का आरोप लगा सकता है।

दूसरी बड़ी ख़बर पिछले सप्ताह में थी कि चीन और रूस और उज़बेकिस्तान ने अंतराष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण ख़रीदा, पर उससे अधिक मुख्य बात यह थी कि इन तीन देशों ने इसकी आधिकारिक घोषणा भी की। रूस ने पिछले एक वर्षो में लगभग 100 बिलियन डॉलर को ‘स्वर्ण’ में बदल लिया है।

Gold reserve का यह खेल जो रुस और चीन, डॉलर के विरूद्ध खेल रहे है वह बहुत रोचक होने जा रहा है। आपकी सूचना के लिए पिछले महीने भारत के रिज़र्व बैंक ने जमकर के सोना ख़रीदा है।

जब हम Gold की बात करते हैं तो सनातन अर्थ व्यवस्था में Gold का स्थान सदैव से ही प्रमुख था। वास्तव में Gold को सनातन धर्म में एक तीर्थ की संज्ञा दी गई है, और यहाँ तक कहा गया है कि यदि आप किसी कारणवश तीर्थ यात्रा न कर पाएँ तो घर की लक्ष्मी को Gold अवश्य ख़रीद कर दें।

और आज वैश्विक अनुमान के अनुसार भारतीय महिलाओं (लाल बिन्दी और नो ब्रा वालियों को छोड़कर) के पास दुनिया के सोने का 10-12% रिज़र्व है। हालाँकि मेरा मानना है कि यह संख्या 20% से अधिक है।

Gold का महत्व, क्रिप्टो करेंसी के लुढ़कने से और बढ़ता जा रहा है।

देखिए, वैभव क्या होता है। वैभव वही धन होता है जो बढ़े, और जिसका उपयोग किया जा सके। और यहाँ पर क्रिप्टो करेंसी पिछड़ जाती है।

मान लीजिए, आपके पास 500 बिट क्वायंस है पर उनको आप पहन तो नहीं सकते और ना ही आप गिरे हुए रेट पर बेचेंगे। कहा यह जा रहा है कि क्रिप्टो करेंसी का चक्र ‘तीन साल’ का होने वाला है, अर्थात दिसंबर 2018 में invested पैसा 2021 के पहले नहीं वसूल होगा।

ज़िले ज़ॉन (Gilets Jaunes, pronounced Zile Zon)

अर्थव्यवस्था की बात करते हुए हमें ज़िले ज़ॉन की ओर भी नज़र डालनी होगी। ज़िले ज़ॉन, कदाचित आप लोगों ने न सुना हो या इसको कुछ और नाम से जानते हो। ज़िले ज़ॉन (Yellow vest movement) फ्रांस में एक ऐसा आंदोलन चल रहा है जिसकी पृष्ठभूमि, फ़्रांसीसी क्रांति जैसी दिखती है।

आपको एक clue दे दे रहा हूँ कि ज़िले ज़ॉन को किसी सेलेब्रिटीज़ का समर्थन नहीं मिला है। अर्थात यह एक Genuine आंदोलन है। मैने यह clue क्यों दिया, क्योंकि जब फ्रॉड अन्ना हज़ारे ने भारत में आंदोलन किया था तब भारत के छँटे हुए फ्रॉड सेलेब्रिटीज़ उसके साथ आ गए थे।

अब जैसे ही भारत में आप देखते हैं कि गुरूमेहर कौर, बरखा दत्त, रवीश कुमार या शबाना आज़मी किसी आंदोलन के साथ हैं तो पक्का यह फ़र्ज़ी आंदोलन है। ज़िले ज़ॉन के ऊपर अगली कड़ी में…

क्रमश:…

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