पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने फतवों को कहा गैर-कानूनी, हमारा तो ‘सेक्युलर’ है शायद

कल के अख़बार में खबर थी कि पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने फतवों को गैर कानूनी करार कर दिया।

अदालत ने दूसरों को नुकसान पहुंचाने के मकसद से जारी किये जाने वाले फतवों को भी गैर कानूनी करार दिया और कहा कि ऐसे फतवों को जारी करने वालों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाया जाना चाहिए।

एक इस्लामिक देश का सुप्रीम कोर्ट शायद हमारे सेक्युलर देश के सुप्रीम कोर्ट से ज्यादा ही इस्लामिक कानूनों को समझता होगा। और उससे हमारे यहाँ भी सीख लेनी चाहिए।

मगर कैसे ली जाये… जब हमारे सेक्युलर दल इतना भी नहीं समझते कि ट्रिपल तलाक़ पाकिस्तान जैसे इस्लामिक मुल्क में भी बैन है लेकिन वो हमारे देश में इसे जारी रखने पर आमादा हैं।

हमारे यहाँ उत्तराखंड हाई कोर्ट के जस्टिस राजीव शर्मा और जस्टिस शरद कुमार शर्मा की बेंच ने फतवों पर अपने 30 अगस्त 2018 के आदेश में प्रतिबंध लगा दिया था।

अपने आदेश में हाई कोर्ट ने उत्तराखंड की सभी धार्मिक संस्थाओं, वैधानिक पंचायतों और लोगों के अन्य समूहों को ‘फतवे’ जारी करने से प्रतिबंधित कर दिया क्यूंकि इससे लोगों के मौलिक अधिकारों और मान सम्मान को ठेस लगती है।

मसला एक जनहित याचिका में उठाया गया जिसमे कहा गया कि रूड़की के लक्सर गाँव की लोकल पंचायत ने एक बलात्कार से पीड़ित लड़की के परिवार को गाँव से निष्काषित करने का फतवा जारी कर दिया कर दिया।

11 अक्टूबर, 2018 को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता की खंडपीठ ने पंचायत के फैसले पर रोक लगा दी मगर अभी 4 महीने में निर्णय नहीं हो पाया है।

इस बीच जस्टिस मदन बी लोकुर रिटायर हो गये हैं। जिस परिवार को गांव से निष्कासित किया गया, उसके बारे में कुछ पता नहीं कि वो गाँव में है या नहीं!

हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील जमीयत उलेमा ए हिन्द ने की थी। सुप्रीम कोर्ट साधारणतया ऐसी अपीलों पर राज्य सरकार को ही नोटिस जारी करता है, मगर मज़े की बात है इस अपील पर हाई कोर्ट को भी पार्टी बना कर नोटिस जारी किया गया।

पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने कहा – “दूसरों को नुकसान पहुँचाने के मकसद से जारी फतवा गैर कानूनी है” जिसका सीधा मतलब है वो शरिया के अनुसार न्यायसंगत नहीं है।

रूड़की के परिवार को भी, ज़ाहिर है नुकसान ही पहुँचाने के मकसद से फतवा जारी हुआ… फिर उसमें कानूनी उधेड़बुन क्यों?

हाई कोर्ट के फैसले के बाद देवबंद के दारुल उलूम ने 2014 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सहारा ले कर कहा कि हाई कोर्ट का फैसला गलत है।

ये कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा था – “फतवा एक राय है जो एक विशेषज्ञ देता है लेकिन ये संवैधानिक योजनाओं में मान्य नहीं है। ये न्याय करने की एक अनौपचारिक व्यवस्था है जिसका मकसद दो पक्षों के बीच सुलह कराना है।”

समझ नहीं आता कि पीड़ित परिवार को गाँव से निष्कासित करने में दो पक्षों के बीच कैसे न्याय हो सकता है। और फिर हमारे देश में फतवों के जरिये दी जाने वाली राय तो किसी का सर कलम करने के लिए भी कह देती है।

इमाम बरकती ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सर कलम करने के लिए 25 लाख का इनाम रख दिया था। तस्लीमा नसरीन और सलमान रुश्दी का सर कलम करने के भी फतवे जारी हो चुके हैं।

ऐसे फतवों से भला कैसे दो पक्षों के बीच सुलह होती है!!!

सुप्रीम कोर्ट को इस विषय में तुरंत फैसला करना चाहिए। फतवे केवल राय ही नहीं रह गए हैं, बल्कि ये सामानांतर न्याय व्यवस्था स्थापित कर रहे हैं जो खुद सुप्रीम कोर्ट के लिए एक बड़ी चुनौती हैं।

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY