अर्थव्यवस्था-1 : किस ओर जा रहा है विश्व

जैसा कि आप लोगों को पता ही है कि यूरोप और अमेरिका की चमक दमक और वैभव केवल 100-150 वर्ष पुरानी हैं। मैं, आज इस लेख में उनकी औपनिवेशिक लूट के बारे में न लिखकर, अब क्या हो रहा है, इस पर सन्क्षेप में आपको बताऊँगा।

2008 तक पश्चिमी समृद्ध यूरोप में पिछले 150 वर्षो से चला आ रहा क्रम रूक गया और 2019 में तो उलटी दिशा में जा रहा है।

क्या था वह क्रम?

वह क्रम था, परदादा से अधिक दादा के पास वैभव होना, दादा से अधिक बाप के पास स्पेंडिंग पावर का होना और बाप से अधिक बेटे के वैभव का होना।

जी… ठीक पढ़ा आपने, यही क्रम चला आ रहा था, 2008 तक।

2009 में जब बैंकिंग क्राइसिस अपने चरम पर पहुँची और डीप एनालसिस हुई तब पश्चिमी यूरोप ने यह पाया कि उसका 25 वर्ष के नवयुवक, जो कि सरकार की नौकरी में है, की वार्षिक आय उसके 75 वर्षीय दादा से कम है और घर ख़रीदने के लिए या तो ‘बैंक ऑफ़ मम & डैड’ के सहारे पर चला गया है या अगले 10-15 वर्षो तक वह किराए पर ही रह पाएगा।

यही स्थिति 2018 आते आते अमरीका की हो गई है और यह स्थिति केवल डेट्रॉएट के अश्वेत समुदाय की नहीं, बल्कि टेक्सस के श्वेत समुदाय की भी हो रही है।

तो केवल सौ – सवा सौ वर्षों में पैदा हुआ आधुनिक अर्थ शास्त्र, चीत्कार कर रहा है। यूरोप और अमरीका के फाइनेन्शियल सिस्टम में जितने पैसे आ रहे हैं उससे अधिक बाहर निकल रहे हैं।

विश्व स्तर पर अमरीकी डॉलर की साख लगातार कम होती जा रही है। NATO कितने दिन तक आधुनिक स्वरूप में बचा रहता है यह देखने वाली बात होगी।

अब आते हैं पड़ोसी पर। भिखारी पाकिस्तान नहीं, चपटे चीन पर। चीन के वामपन्थियों ने अपना प्रभुत्व पूरे विश्व में बढ़ाया। तीन-चार दशकों सामरिक ताक़त भी बढ़ाई, पर आज वह 73 ट्रिलियन डॉलर के क़र्ज़ में डूबा हुआ है।

अब क़र्ज़ का भी एक सिद्धान्त समझ लीजिए, यदि आपने बैंक से एक लाख क़र्ज़ लिया है तो यह आपकी समस्या है, पर यदि आपने 100 करोड़ क़र्ज़ लिया है तो यह बैंक की समस्या है, आपकी नहीं। अर्थात 73 ट्रिलियन डॉलर का चीनी क़र्ज़, चीन की समस्या नहीं है बल्कि उन Financial Institutions की है जिन्होंने उसे क़र्ज़ दिया है।

आप को यह याद रखना होगा कि 1990 में चंद्रशेखर जब 40 वर्ष की कामी वामी प्रत्यक्ष लूट के बाद, अप्रत्यक्ष रूप से काग्रेस के सहयोग से PM बने थे तो देश का मुद्रा भंडार पूरा ख़ाली।

अगली कड़ी में Gold, dollar और विश्व तथा भारत की अर्थ व्यवस्था पर अपनी राय रखूँगा…

आप लोगों को यदि मेरी यह लेखमाला अच्छी लगेगी तो हर सप्ताह अर्थ व्यवस्था पर सनातनी दृष्टिकोण के साथ लिखता रहूँगा।

क्रमश:..

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