माल्या का प्रत्यार्पण : भारतीय मीडिया की बौद्धिक और चारित्रिक दरिद्रता

भारत के भगोड़े कारोबारी विजय माल्या के ब्रिटेन से सम्भावित भारत प्रत्यार्पण की घटना कितनी महत्वपूर्ण है – इसका अनुमान अधिकांश भारतीयों को नहीं है।

ऐसे मामलों में भारतीयों की जानकारी का स्रोत भारतीय मीडिया है, और भारतीय मीडिया की बौद्धिक और चारित्रिक दरिद्रता की बात किसी से छुपी नहीं है।

बात माल्या की कम है, प्रत्यार्पण की ज्यादा है। पर नारेबाजों के देश में ऐसी बातों पर कौन ध्यान देता है?

मीडिया वालों ने तो यह तक पता करने का प्रयास नहीं किया कि माल्या के पास अपील की सहूलियत किस हद तक है और इसमें कितना समय लग सकता है।

हमें तो भारत के बारे में ही कुछ पता नहीं तो ब्रिटेन के न्यायतंत्र के बारे में जानकारी की बात सोचना ही हास्यास्पद है।

मैं यहाँ सुविधा के लिए बिंदुवार अपनी बात रखूँगा।

1- ब्रिटेन के न्यायतंत्र की रचना ऐसी है कि ब्रिटेन से किसी को किसी अपराध में दूसरे देश में प्रत्यार्पित करवा पाना करीब करीब असम्भव है। न्यायतंत्र अभियुक्त के पक्ष में loaded है। प्रत्यार्पण के लिए बहुत कठिन बाधाओं से गुज़रना पड़ेगा।

न्यायिक प्रक्रिया भारत की तरह ढीली ढाली नहीं है, पुख्ता प्रमाण माँगती है। फिर मानवाधिकार के बहुत ऊँचे मानदंड हैं जिनकी माँग पूरा किए बिना सफलता की कोई सम्भावना नहीं।

2- ब्रिटेन से भारत के प्रत्यार्पण की एक भी मिसाल नहीं है।

3- ब्रिटेन से अमेरिका जैसे देश में प्रत्यार्पण की बहुत कम मिसालें हैं। अबू हमज़ा जैसे कुख्यात आतंकवादी को ब्रिटेन से अमेरिका प्रत्यर्पित करवाने में वकीलों को लोहे के चने चबाने पड़े।

4- अबू हमज़ा के अमेरिका प्रत्यार्पण में तक़रीबन दस वर्ष लग गए। ध्यान रहे कि ऐसा इसके बावजूद हुआ कि अमेरिकी जाँच व्यवस्था, उनके काग़ज़ पत्तर, सबूत के स्तर और भारतीय काग़ज़ पत्तर के स्तर का भेद ज़मीन और आसमान का भेद है।

5- माल्या के मामले में दो वर्ष लगे हैं।

6- भारतीय जाँच एजेंसियाँ अक्षमता और ढील ढाल के लिए मशहूर हैं। आरुषि वाला मामला याद होगा। सीबीआई ने आदमी के डीएनए की जगह जानवर का डीएनए भेज दिया था। सारे सबूत ही मिटा दिए थे। यह सब ब्रिटेन में नहीं चलेगा। जज बिना सुने ही मुक़दमे ख़ारिज करेगा।

7- यह कोई मामूली बात नहीं है कि ऐसे घटियापन और अक्षमता के लिए कुख्यात भारतीय जाँच तंत्र ने ऐसे पुख्ता watertight प्रमाण दिखाए जिन्होंने ब्रिटेन जैसी सख्त न्यायिक प्रक्रिया वाले देश के ऊँचे मानकों को संतुष्ट किया। यह अपने आप में एक बेमिसाल और ऐतिहासिक घटना है।

8- ब्रिटेन में भारतीय न्यायतंत्र की तरह अपील दर अपील, सुनवाई दर सुनवाई, छोटी बेंच बड़ी बेंच का अंतहीन जाल नहीं है जो पुश्त दर पुश्त चलता रहे। ब्रिटेन में सर्वोच्च न्यायालय जूता और सैंडिल की परिभाषा तय करने के लिए आधी रात को सात जजों की बेंच नहीं बिठाता। और न्यायालय की अंतहीन सीढ़ियाँ हर कदम पर फिर से नई सुनवाई नहीं शुरु करतीं।

9- सर्वोच्च न्यायालय सिर्फ बहुत बड़े महत्व के, संवैधानिक टाइप के मसले ही सुनता है।

10- विजय माल्या के पास अपील का अब सिर्फ एक ही पायदान है – उच्च न्यायालय। उच्च न्यायालय के ऊपर अपील की कोई व्यवस्था नहीं। पहले शायद European court of human rights तक जाने की सुविधा रही होगी, अब Brexit के कारण शायद वह रास्ता भी बंद होगा।

11- ब्रिटिश हाई कोर्ट भारतीय अदालतों की तरह फिर से क ख ग घ से सुनवाई शुरु नहीं करेगा। वह सब निचली अदालत में पहले ही हो चुका है। बचाव पक्ष को नई और ताज़ा दलीलें देनी होंगी। और यह सुनवाई सम्भवत: एक दिन में निपट जाएगी।

12- हाई कोर्ट द्वारा निचली अदालत के फ़ैसले और उस पर गृह मंत्रालय की मुहर के बाद उच्च न्यायालय द्वारा इस फ़ैसले का निरस्त होना क़रीब क़रीब असम्भव है।

13- मूर्खों को समझाने के लिए यह भी कहना पड़ेगा कि इस सारी प्रक्रिया का भारतीय चुनावों से कोई सम्बंध नहीं है।

14- अनुमान लगाया जा सकता है कि यह सारी प्रक्रिया 6 सप्ताह से तीन महीने के अंदर पूरी हो जानी चाहिए।

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