घरेलू कार्य में हाथ बंटाना ही नारी का असली सशक्तिकरण

बांये से - भठूरे का आटा, फ्रेंच ब्रेड का आटा, एवं पिज़्ज़ा का आटा जिसमे अलग-अलग प्रक्रिया से खमीर उठाया जा रहा है.

न्यू यॉर्क टाइम्स में एक समाचार पढ़ा कि जापान में कामकाजी महिला एक सप्ताह में औसतन 25 घंटे घर में कार्य करती है, जबकि उसका पति घरेलू कार्य में पांच घंटे से कम योगदान देता है.

जापान हो या भारत, एक महिला को छोटे बच्चे संभालना, उन्हें नहलाना, सुलाना, बच्चों का लंच बॉक्स पैक करना, उन्हें खिलाना और स्कूल छोड़ना, उनका होमवर्क करवाना, उनके झगड़े सुलझाना, घर साफ करना, कपड़े धोना, बिस्तर बिछाना, खाना बनाना, बाजार से दैनिक जीवन में खाने और प्रयोग होने वाला सामान लाना पड़ता है. इसमें मैंने बर्तन धोने या कपड़े प्रेस करने के बारे में लिखा ही नहीं है.

तभी अधिकतर महिलाओं को फेसबुक पर हम पुरुषों की तरह लम्बी-लम्बी पोस्ट लिखने का समय नहीं मिलता.

अधिकतर भारतीय मध्यम वर्गीय परिवारों को घरेलू कार्य के लिए आंशिक मदद मिल जाती है, जैसे कि कोई सेवक (मुझे नौकर शब्द का प्रयोग मानवीय गरिमा के सन्दर्भ में उचित नहीं लगता) घर की सफाई और बर्तन साफ़ कर देता है. धोबी कपड़े प्रेस कर देगा. बागवानी के लिए माली और टॉयलेट की सफाई के लिए भी मदद मिल जाती है. सब्जी भी ठेलेवाला घर के द्वार पे दे जाता है.

लेकिन अमेरिका में, वह भी न्यू यॉर्क में, ऐसी सुविधाओं के लिए कम से कम प्रति घंटे 15-20 डॉलर या लगभग 1500-2000 डॉलर महीने का पारिश्रमिक प्रति दिन कुछ घंटे के काम का देना पड़ेगा. अतः सारा कार्य स्वयं करना पड़ता है.

इस वर्ष पत्नी कार्यालय के कार्य में अत्यधिक व्यस्त है. वे एक ग्रांट या सरकारी अनुदान का प्रस्ताव लिख रही है जो अगर स्वीकृत हो गया तो अमेरिकी सरकार से करोड़ों रुपये का अनुदान रिसर्च के लिए मिलेगा, जिससे वह अपने कार्य के लिए डॉक्टरों और लैब असिस्टेंट को नौकरी दे सकती है, इक्विपमेंट खरीद सकती है तथा रिसर्च सम्बन्धी ट्रवेल कर सकती है. अतः हर दिन वह रात 8 बजे के बाद घर आ रही है. उन्हें कार से लेने भी स्टेशन जाना पड़ता है.

यही हाल पुत्र का है जो इस समय न्यू यॉर्क में काम कर रहा है. अतः घर संभालने की जिम्मेवारी पूर्णतया मेरे पास आ गयी.

रोज रात को और शनिवार-रविवार को खाना बनाना, वह भी दाल, चावल या रोटी, सब्जी, पास्ता, पिज़्ज़ा, थाई करी, चाइनीज़ भोजन, पूड़ी-सब्जी जैसे पकवान, बर्तन डिशवाशर में (बर्तन धोने की मशीन; लेकिन इसमें कड़ाही, कुकर, तवा और भगौने साफ़ नहीं होंगे), शर्ट की कालर और बांहे घिसना, कपड़े धोने और सुखाने के लिए मशीन में लगाना, बाथरूम और टॉयलेट की सफाई, ग्रोसरी (परचून) स्टोर और बाजार से शॉपिंग, सब मैं कर रहा हूँ. पत्नी शनिवार-रविवार को कुछ देर के लिए हाथ बंटा देती है.

कार्यालय के कार्य अपनी जगह है. चूंकि पत्नी व्यस्त है, मैंने अपने कार्य और विजिट को कण्ट्रोल में रखा हुआ है.

कहावत है कि कंगाली में आटा गीला. दिसंबर 2018 के अंत में मेरा चार वर्ष पुराना चश्मा टूट गया, जिसमें दूर और पास दोनों पावर के लेंस लगे थे. अमेरिका में आधुनिक तकनीकी के लेंस वाला नया चश्मा बनने में एक सप्ताह तक लग सकता है. जिस दिन चश्मा टूटा, उसी दिन पिज़्ज़ा बनाने का कार्यक्रम था, चूंकि मुझे देखने में उलझन हो रही थी, पुत्र ने सुझाव दिया कि मुझे धूप के काले चश्मे – जिसमें दोनों पावर का लेंस लगा था, उससे रसोई में कार्य करना चाहिए.

अतः पुत्र की होशियारी की दाद देते हुए घर का कार्य काला चश्मा पहन कर किया. मेरा अनुमान है कि इस समय मैं सप्ताह में औसतन 25 घंटे घर में कार्य कर रहा हूँ, जबकि पत्नी का घरेलु कार्य में पांच घंटे से कम योगदान है.

नारी का यही असली सशक्तिकरण है. पत्नी की ग्रांट जमा करने की लास्ट डेट 7 फ़रवरी है. आशा है उसके बाद कुछ राहत मिलेगी.

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