ममता बनर्जी का पश्चिम बंगाल : इस्लामीकरण के मध्यचरण का काल

मैंने आज से करीब ढाई वर्ष पूर्व, जब मालदा जल रहा था, तब बंगाल को लेकर चार भागों में एक लेख लिखा था।

आज जब बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भारत के संविधान और उसके संघीय व्यवस्था का सर्वजिनिक चीरहरण कर रही है तब वह लेख बड़ा सामयिक हो गया है।

पश्चिम बंगाल व वहां घटित हो रही घटनाओं को समझने के लिए मैं आज उसी लेख को अपना आधार बना रहा हूँ।

पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 3 फरवरी 2019 की शाम को सीबीआई के अधिकारियों को गिरफ्तार करा के और कोलकोता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के घर डेरा डाल कर जो भारतीय संघीय ढांचे में आग लगाई, उससे भारत जल रहा है। मेरा मन भी जल रहा है।

आज पश्चिम बंगाल में जो दिख रहा है वो उसके इतिहास की ही अगली कड़ी है। आज ममता बनर्जी के व्यक्तित्व व मानसिकता में जो जड़ता दिख रही है वह भारत के किसी राज्य के मुख्यमंत्री न हो कर यदि किसी शत्रु राष्ट्र के शासक के रूप में दिख रही है तो उसका भी इतिहास है।

मैं आज जिस दृष्टि से भारत के बंगाल को देख रहा हूँ वह तटस्थ भाव से इतिहास को पढ़ने और समझने वाले मौन की दृष्टि से देख रहा हूँ।

मैं आज जो लिख रहा हूँ वह यह कटु सत्य को स्वीकार कर लिख रहा हूँ कि आज का काल, 15 अगस्त 1947 में बने ‘पश्चिम बंगाल’ की, ‘पूर्वी बंगलादेश’ बनने के मध्य चरण का काल है।

पश्चिमी बंगाल के राजनीतिक नेतृत्व को इस मध्य चरण काल तक पहुंचाने में, पूरे 70 वर्ष लगे हैं और इतिहास मुझे बता रहा है कि यदि मध्य चरण वक्री नहीं हुआ तो, इसके आगे की पूर्वी बंगलादेश बनने की यात्रा ज्यादा गति से होगी।

ममता बनर्जी और उनका साथ देते विपक्ष की भूमिका देख कर क्या यह समझ लेना चाहिए कि भारत, पश्चिम बंगाल को खो चुका है? क्या वहां रहने वालों ने अपने बुद्धिजीवी अहंकार के आगे, अपने भारतीय होने के व्यष्टित्व को खो चुके हैं? क्या वे जो भारतीयता के ऊपर बंगालियत के आवरण को ओढ़े हुए हैं, वे नोआखली और पूर्वी पाकिस्तान के हिन्दू ही बनने जा रहे हैं?

आज का पश्चिमी बंगाल राजनीति शास्त्रियों का विषय बिलकुल भी नहीं है, यह समाजशास्त्रियों का विषय है। अब क्योंकि मैं कोई समाजशास्त्री नहीं हूँ, इसलिए मैं पूरे ही बंगाल को समझने और समझाने के लिए इतिहास का ही सहारा लूंगा।

मैं समझता हूँ कि बंगाल में जो हो चुका है, जो हुआ है और जो होगा, उससे निपटने के लिए भारतीय राजनीति असमर्थ है, इसके लिए पूरे भारत को समर्थ होना पड़ेगा और उसे डायरेक्ट एक्शन के प्रतिकार की मानसिकता बनानी पड़ेगी।

1947 से पहले का बंगाल मुस्लिम बहुल राज्य था जहाँ, 56% मुस्लिम और 42% हिन्दू थे। पूरे भारत में, बंगाल ही एक मात्र राज्य था जहाँ, 1935 के प्रोविंशियल ऑटोनॉमी स्कीम के अंतर्गत, बंगाल प्रोविज़नल मुस्लिम लीग (मुस्लिम लीग का ही हिस्सा) गठबंधन बना कर शासन में थी।

इस तरह मनोवैज्ञानिक रूप से, बंगाल का मुस्लिम वर्ग, मुगल साम्राज्य के पतन के बाद भारत के उस भूभाग का शासक था जहां कम था। वैसे तो बंगाल राज्य में मुस्लिम ज्यादातर उसके पूर्वी भाग में ही थे लेकिन पश्चिम में स्थित कलकत्ता में हिन्दू 64% और मुस्लिम 33% थे। यहां पर व्यापार में हिंदुओं का, और उनमें भी राजस्थान से आये मारवाड़ियों का दबदबा था। 

इसी पृष्ठभूमि में मुस्लिम लीग ने जब 16 अगस्त 1946, को पाकिस्तान की मांग को लेकर ‘डायरेक्शन एक्शन डे’ की घोषणा कर बंगाल बन्द का आह्वान किया तो बंगाल के मुस्लिम लीग के मुख्यमंत्री हुसैन शहीद सुहरावर्दी ने बंगाल के गवर्नर सर फ्रेडरिक बॉरोज से कह कर, बन्द को सफल बनाने के लिए 16 अगस्त को सार्वजनिक छुट्टी करा दी।

इसके विरोध में उस वक्त तक बंटवारे का विरोध कर रही कांग्रेस, कम्युनिस्ट और हिन्दू महासभा ने हिन्दू व्यापारियों से अपनी दुकानों और प्रतिष्ठानों को खोलने का आह्वान किया और उसी के प्रतिकार में कलकत्ता में नरसंहार हुआ था।

कलकत्ता में हुए इस हिन्दू मुस्लिम दंगे के वैसे तो और भी कारण थे, लेकिन उसका एक ही परिणाम था कि बंगाल के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी की छत्रछाया में हिंदुओं का सरकारी नरसंहार हुआ था। इसमें 72 घण्टे में, 4000 लोग मारे गये थे और करीब एक लाख लोगों के घर उजड़ गये थे।

इस दिन के लिए मुस्लिम लीग ने पूरी तैयारी की थी। 16 अगस्त के दिन का पूरा कार्यक्रम, एक प्रभावशाली मुस्लिम अख़बार, ‘द स्टार ऑफ़ इंडिया’ में बाकायदा छापा गया था जिसके संपादक, रागहिब एहसान थे जो मुस्लिम लीग के विधायक भी थे।

अख़बार ने मुस्लिम समुदाय को कलकत्ता, हावड़ा, हुगली, मेटियाबुर्ज़ और 24 परगना के विभिन्न चयनित स्थानों से पैदल चल कर, ओचतेरलोनी मोन्यूमेंट, जो आज शहीद मीनार कहलाता है, वहां पहुंचने का आवाहन किया गया था, जहाँ जमा हुई भीड़ को सुहरावर्दी को संबोधित करना था।

इसी के साथ, मुस्लिम लीग के 3-3 कार्यकर्ताओं को हर मस्जिद पर भेजा गया था, जहाँ उन्हें जुम्मे की नमाज़ से पहले समुदाय को मुस्लिम लीग के डायरेक्ट एक्शन डे की पूरी योजना समझाई गयी थी। फिर उसके बाद शुक्रवार को जुम्मे की नमाज़ के बाद, सभी मस्जिदों पर, भारत के मुसलमानों की आज़ादी के लिए विशेष नमाज कही गयी थी।

वहां से मुफ़्ती मौलवियों ने कुरान से प्रेरणा लेकर मुसलमानों से आज़ाद हो जाने का आह्वान किया व डायरेक्ट एक्शन डे के, रमजान के महीने पर पड़ने पर, उसे जहाँ अल्लाह का संकेत बताया गया, वहीं उसे सीधे मुहम्मद साहब के संघर्ष और फिर अंततोगत्वा मक्का पर उनके कब्ज़े से जोड़ दिया गया था।

ऐसी तकरीरों से उमड़े धार्मिक उन्माद में मुस्लिम लीग ने रमजान के पवित्र महीने में कलकत्ता के हिन्दू काफिरों का नरसंहार हो जाने दिया था। इस 16 अगस्त 1946 को ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के नाम पर, कलकत्ता में शुरू हुए इस नरसंहार को पूरे बंगाल को लपेट में ले लिया था और उसके ही परिणाम स्वरूप नोआखली में नरसंहार हुआ था, जो हिन्दुविहीन कर दिया गया था।

बंगाल से उठे दंगों के दावानल ने आगे बढ़ कर बिहार, यूनाइटेड प्रोविंस, पंजाब और नॉर्थवेस्ट फ्रन्टियर के इलाकों को अपनी चपेट में लिया और हिन्दू समुदाय के मानस को तोड़ कर रख दिया। इस हारी हुयी मानसिकता के साथ ही कुछ ही महीने में कांग्रेस का नेतृत्व बंटवारे के लिए तैयार हो गया था।

अब आप यह सब पढ़ कर प्रश्न करेंगे कि इसका आज के बंगाल से क्या मतलब है?

इसका बड़ा गूढ़ मतलब है।

इस डायरेक्ट एक्शन डे के होने के कुछ महीनों में ही, जहाँ भारत के हिन्दू समुदाय में मुस्लिम लीग और मुसलमानों के खिलाफ आक्रोश और नफरत भर दी थी वही कांग्रेसी नेतृत्व के हाथ पैर फूल गये थे और उन्होंने बंटवारे को ही एक मात्र उपाय मानकर, मुस्लिम लीग के सामने समर्पण कर दिया था। लेकिन इन ही कुछ महीनों में बंगाल के राजनैतिक भद्रलोक की प्रतिक्रिया शेष भारत के हिंदुओं से अलग थी।

16 अगस्त 1946 को ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ पर हिन्दुओं के इस नरसंहार के बाद पूरे भारत में दंगों की लहर चल पड़ी। इन दंगों से लगी आग ने हिन्दू और मुस्लिम समुदायों को पूरी तरह से दो फाड़ कर दिया था।

1946 के जाते जाते कांग्रेस और अखण्ड भारत के समर्थकों को यह पहली बार एहसास हुआ कि जिस अहिंसा और शांति के दर्शन पर, हिन्दू मुस्लिम सौहार्द्र की कल्पना को लेकर वह भारत की स्वतंत्रता का सपना देख रहे थे, वह जिन्नाह और मुस्लिम लीग के हाथों मात खा चुका है।

कलकत्ता, बंगाल से शुरू 1946 के दंगों का असर यह हुआ कि बंगाल के पूर्वी भाग, सिन्ध, नॉर्थ वेस्ट फ्रन्टियर व पंजाब के पश्चिम वाले मुस्लिम बहुल इलाकों में सदियों से रह रहे हिंदुओं ने वहां से भरी संख्या में पलायन करना शुरू कर दिया। जो हिन्दू वहां शुरू में रुके रह गए उन्हें भी मुस्लिम उग्रता के आगे बाद में भागना पड़ा।

इस पलायन को न गांधी रोक पाए और न ही कांग्रेस के पास ऐसी कोई योजना थी कि जिससे उन इलाकों में रह रहे हिंदुओं को सुरक्षा प्रदान की जा सके या उनको भविष्य के प्रति आश्वस्त किया जा सके।

जब आप 1946-47 के इस भारत को देखते हैं तो यह साफ हो जाता है कि मुस्लिम लीग और उसका मुसलमान हिन्दुओं से नफरत करता था और वह ब्रिटिश सरकार के सहयोग से भारत के बंटवारे से कम में मानने को तैयार नहीं था।

इस बंटवारे और हिन्दू उत्पीड़न का सिर्फ एक ही उपाय था कि भारत में गृह युद्ध हो जाये लेकिन उस वक्त के हिन्दू को कांग्रेस ने इसके लिए तैयार ही नहीं किया था। हिन्दू नेतृत्व मानसिक रूप से पराजित हो चुका था।

अब आप बताइये कि क्या ऐसी स्थिति में यह सम्भव था कि कोई हिन्दू, एक ऐसे मुस्लिम लीग के नेता, जिसने हिन्दुओं का कत्ले आम कराया हो, के साथ मिलकर, भारत से अलग हो कर कोई परिकल्पना कर कर सकता था? मैं नहीं समझता हूँ कि कोई कर सकता था लेकिन 16 अगस्त 1946 के ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के आगाज़ और हिंदुओं के कटने के बाद, बंगाल ने यह कर दिखाया था।

1947 के शुरू में जब यह लगभग मान लिया गया था कि ब्रिटिश शासन, मुस्लिम लीग के लिए पाकिस्तान बनवाकर ही रहेगा, तब पंजाब और बंगाल के हिन्दू बहुल इलाकों को पाकिस्तान का हिस्सा बनने से बचाने के लिए हिन्दू महासभा और कांग्रेस ने, पंजाब और बंगाल का धार्मिक आधार पर बंटवारा किये जाने की मांग की, जिससे बंगाली अस्मिता आहत हो गयी थी।

बंगाल के बंटवारे की मांग पर बंगाल के राजनीतिज्ञों का ‘आमार बांग्ला’, वन्देमातरम से पहले आ गया था। बंगाल के इस धार्मिक आधार पर होने वाले बंटवारे को रोकने के लिए बंगाल के मुख्यमंत्री और 16 अगस्त को ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ पर हिंदुओं का कत्ले आम करने वाले मुस्लिम लीग के हुसैन शहीद सुहरावर्दी ने 27 अप्रैल 1947 को एक स्वतन्त्र ‘बृहत बंगाल’ की मांग की जिसमें उन्होंने आसाम को भी शामिल किया था।

इस प्रस्ताव को 29 अप्रैल 1947 को बंगाल के मुस्लिम लीग के प्रभावशाली नेताओं अब्दुल हाशिम और फज़ुल क़ादिर चौधरी ने भी समर्थन देने की घोषणा कर दी थी। यह स्वतन्त्र बंगाल का प्रस्ताव सुहरावर्दी ने कुछ मुस्लिम नेताओं की मदद से ही नहीं रखा था बल्कि इस प्रस्ताव पर उनकी बंगाल के हिन्दू राजनीतिज्ञों से भी बात हो चुकी थी।

उनके प्रस्ताव को बंगाल राज्य के कांग्रेस के प्रमुख नेता शरत चन्द्र बोस, किरण शंकर रॉय और सत्य रंजन बक्शी का भी समर्थन प्राप्त था। इसी लिये सुहरावर्दी की ‘स्वतन्त्र बृहत बंगाल’ की घोषणा के बाद ही शरत चन्द्र बोस ने, एक स्वतन्त्र राष्ट्र ‘सॉवरेन सोशलिस्ट रिपब्लिक ऑफ़ बंगाल’ का प्रस्ताव रक्खा था। यहाँ यह भी महत्वपूर्ण है कि सुहरावर्दी और शरत चन्द्र बोस के इस प्रस्ताव को बंगाल के गवर्नर फ्रेडरिक बॉरोज का समर्थन प्राप्त था।  

इसके बाद बंगाल को एक स्वतन्त्र राष्ट्र बनाने के प्रस्ताव को मूर्त रूप देने के लिए मुस्लिम लीग के अब्दुल हाशिम और शरत चन्द्र बोस 12 मई 1947 को गाँधी से मिले और उनसे आशीर्वाद मिल जाने के बाद, 20 मई 1947 को बंगाल के गवर्नर फ्रेडरिक बॉरोज के समर्थन से  ‘बंगाल को एक स्वतन्त्र राष्ट्र’ बनाये जाने की आधिकारिक प्रस्ताव रखा था।

हालाँकि गाँधी जी के आशीर्वाद मिल जाने के अगले ही दिन 13 मई 1947 को कांग्रेस के अध्यक्ष जेबी कृपलानी ने इस तरह के किसी भी प्रस्ताव को यह कह कर मानाने से इंकार कर दिया था कि, “कांग्रेस का सिर्फ एक ही ध्येय है कि वह ज्यादा से ज्यादा हिन्दू बहुल क्षेत्रों को मुस्लिम लीग के प्रभाव क्षेत्र और पाकिस्तान से बचा सके।”

सुहरावर्दी को शुरू से ही जिन्नाह का समर्थन मिला हुआ था क्योंकि सुहरावर्दी के साथ जिन्नाह को यह एहसास था कि बिना बंगाल के पश्चिमी हिस्से के, पूर्वी हिस्सा पंगु रहेगा। लेकिन जब कांग्रेस ने बंगाल को एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने के प्रस्ताव को एक सिरे से ख़ारिज कर दिया तब जिन्नाह ने भी इस प्रस्ताव के समर्थन से अपने हाथ खीच लिए और अंत में कम्युनिस्ट पार्टी ने भी इस तरह के किसी भी प्रस्ताव को समर्थन देने से मना कर दिया।

यहां यह जरूर स्पष्ट करना चाहूंगा कि 1947 में हुए बंगाल के बंटवारे को रोकने के लिए जहाँ कुछ  प्रबुद्ध बंगाली हिन्दू ‘भद्रलोक’ उसका विरोध कर रहे थे, वहीं ज्यादातर बंगाली हिन्दुओं का बंगाल के बंटवारे को भरपूर समर्थन प्राप्त था।

बंगाली हिन्दुओं का इस बंटवारे को समर्थन, इतिहास का एक ऐसा विरोधाभास है जिसकी कम ही तुलना मिलती है। 1905 में लार्ड कर्जन ने जब बंगाल का बंटवारा किया था तब बंगाली हिन्दू ने ही इसका सबसे ज्यादा विरोध किया था और अंततोगत्वा 1911 में बंटवारे को खत्म कर एक ही बंगाल बनाया गया था।

तब भी पूर्वी हिस्से में मुसलमान ज्यादा थे और पश्चिम में कम, लेकिन इन 40 वर्षो में हिन्दू मुसलमान का दुराव इतना पूर्ण हो चुका था कि बंगाली हिन्दू बंटवारे के पक्ष में खड़ा हो गया था।

भारतीय और बंगाल के इतिहास की इस विचित्र घटना का इतना विस्तार से मैंने इसलिए उल्लेख किया है ताकि लोग यह समझ सकें कि 72-73 वर्ष पहले भी बंगाल की राजनीति में ऐसे भद्रलोक थे जिनको ‘आमार बांग्ला’ के नाद में ‘वन्देमातरम’ का नाद नहीं सुनाई देता था। 1946 में कटने के बाद भी अपने कातिल के साथ ही बंग्ला के नाम पर सोना चाहते थे।

जब हम आज के बंगाल की बात करते हैं तो हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि वहां स्वतंत्रता से पूर्व से ही मुस्लिम राजनीतिक वर्ग शासन तन्त्र में रहा है। इसलिये जब पश्चिम बंगाल में 70 के मध्य में वामपंथियों का शासन आया तब शासकीय समर्थन से धर्मनिर्पेक्षता का ‘आमार बांग्ला’ के नाम पर इस्लामीकरण आसानी से हो गया। वामपंथियों की इसी कार्यप्रणाली का अनुसरण ममता बनर्जी ने भी राजनीतिक लाभ के लिए किया जिसने अब भारतीयता के कलेवर को ही छोड़ दिया है।

आज हिन्दू बंगालियों पर शेष भारत के हिन्दुओं को तंज़ नहीं करना है क्योंकि पश्चिम बंगाल की धर्मनिर्पेक्षता के शासकीय इस्लामीकरण के साथ इनकी तीन पीढ़ियों ने बिस्तर गर्म किया है। अभी बंगाल में हिन्दू, ‘आमार बांग्ला’ की तन्द्रा पूरी तरह नहीं टूटी है लेकिन ममता बनर्जी ने एक मौका अवश्य दे दिया है। वो लोग जाग रहे हैं लेकिन उनमें अभी वह आत्मिक शक्ति नहीं जागृत हुयी है जो उन्हें रातों रात प्रतिकार की ऊर्जा प्रदान कर दे।

यह बीमारी पुरानी है और इसका निदान राजनीतिक समाधान से ज्यादा वहां के इस्लामीकरण के बोझ से दबे तन्त्र को ध्वस्त करने में है। मैं नहीं समझता कि बिना यह किये वहां के समाज के पास पुनः वापसी का कोई वास्तविक सफल मार्ग शेष बचा है। पश्चिम बंगाल को बचना है तो वंदेमातरम के मार्ग पर ही आना होगा।

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