दीदी की दादीगिरी : अनशन, अहिंसा और संप्रभुता

गाँधी ने सात्विक क्रोध के प्रदर्शन के लिये अनशन का रास्ता अपनाया और काफी हद तक अंग्रेजों को कन्फ़्यूजिया दिया कि वे भारत को लगभग जलता हुआ छोड़ कर चले गये साथ में एक कोढ़ छोड़ गये कि जनप्रतिनिधियों के मन में साम्राज्यवादी हवस का बीज बो कर गये।

जिन्ना को भारत के हर हिस्से में पाकिस्तान की तमन्ना लिये पाकिस्तान का कायदे आज़म बनना पड़ा पर शीघ्र ही जन्नत नशीन होने की वज़ह से ये तमन्ना ए बेताब पाकिस्तान के सियासतदानों का भी लक्ष्य बन गया।

खालिस्तान या आज़ाद कश्मीर का स्वप्न उसी हवस में देखे गये सपने की तासीर रही। पाकिस्तान अपनी इसी दिये से अपने कई हिस्सों में आग लगा चुका है परन्तु एक घोर राष्ट्रवादी सोच के कारण आप किसी पाकिस्तानी को अपने देश की बुराई करते शायद ही देखेंगे पर वहीं अपना आर्यावर्त काले अंग्रेजों की तटस्थता की ओट में ओछी सोच और धर्मनिरपेक्षता के छ्द्म ताने बाने में उलझ कर अपनी संप्रभुता को खोने की कगार पर खड़ा है।

मेरा आशय वर्तमान परिदृश्य में दीदी के दादीपने को गान्धीवादी लबादे ओढ़ाकर एक नए सत्याग्रह की शुरुआत से है। आखिर क्या कारण है कि वाजपेयी की सरकार के समर्थन में “मुहब्बत एक से होती है हज़ारों से नहीं” शेर पढ़ कर अपना पक्ष रखने वाली, यूपीए के अन्तर्गत रेल मंत्रालय पाने के लिये पहले खुद फिर अपने प्रतिनिधि के हाथों रिमोट से रेल चलाने वाली ममता आज कल एनडीए सरकार से इस कदर खफ़ा कि अपने मातहत एक उच्च पुलिस अधिकारी से एक निहायत ही मामूली पूछ ताछ को आपातकाल सरीखा घोषित कर रही है।

दाल में काले के शक के बदले पूरी दाल को काली जता देने वाली ये नाटकीय कोशिश ममता को कितना राहत पहुँचा पायेगी यह तो भविष्य में ही साबित हो पायेगा पर ५ लाख की करमुक्त आय सीमा और १०% आर्थिक आरक्षण की घोषणा के चलते लड़खड़ाती, चटखारे युक्त सरकार विरोधी समाचारों के अभाव में क्षुधित, शुष्क कंठ और मृतप्राय साम्यवादी मीडिया को संजीवनी तो ज़रूर पहुँचा पा रही है।

इससे पहले अरविन्द केजरीवाल भी उपराज्यपाल के ए०सी० रिसेप्शन पर ये अराजक कोशिश कर चुके हैं। वे केजरीवाल जो मानते थे कि उनकी सत्ता प्राप्ति के एक हफ़्ते के अंदर पूर्व मुख्यमन्त्री जेल में होंगी अब उसी शीला दीक्षित से हाथ मिलाये मोदी की बखिया उधेड़ने में लगे हैं।

हाथी वाली बुआ साइकिल वाले भतीजे के साथ हाथ मिलाने से गुरेज़ नहीं कर रही है वह भी उस भाई के बेटे के साथ जिसके शासन काल में वह अतिथिगृह काण्ड हुआ था कि अगर कमल असमय में हाथी के लिये नहीं खिलता तो सामाजिक न्याय की पैरोकार बहनजी अपनी निर्भय अभिव्यक्ति के बदले निर्भया की पहली अभिव्यक्ति बन चुकी होतीं।

जिस कमल ने हाथी को उत्तर प्रदेश की सत्ता पर कई बार काबिज करवाया, आज न जाने क्यों वह हाथी कमल दल से भरे तालाब को ही छिन्न भिन्न करने की आशा में अंकुशधारी महावत से दोस्ती गाँठने की भूल कर रहा है।

दरअसल हर छोटा क्षेत्रीय और जागीर नुमा राजनीतिक दल हर मजबूत केन्द्रीय सत्ता धारी पार्टी से डरता है। ढुलमुल और मिली जुली अल्पमत सरकारें इन छोटे मोटे क्षत्रपों के डर से इनकी कई ज़ायज़ और नाज़ायज़ माँगें मानती ही रहती हैं पर बहुमत वाली सरकार इन टुच्ची हरकतों को नज़र अंदाज़ करने में सक्षम होती हैं और इनकी दाल नहीं गल पाती है।

मुफ़्ती मोहम्मद सईद और फिर मेहबूबा मुफ़्ती के साथ बीजेपी के सरकार बनाने पर तंज कसने वाला हर पार्टी के रहनुमा खासकर उमर अब्दुल्ला तो एनडीए सरकार में मन्त्री भी रह चुके हैं। आज मोदी की साम्प्रदायिकता और हिटलर शाही से त्रस्त चन्द्रबाबू नायडू ने अटल की साम्प्रदायिक सरकार में अपने सांसद बालयोगी को लोकसभा का स्पीकर बनवाने में कतई संकोच नहीं किया था पर आज “ऐसे वैसे कैसे कैसे हो गये”।

कभी काँग्रेस विरोध के गर्भ से पनपे कुकुरमुत्ते भी आज कल खुद को बरगद से विशाल मानते हुए काँग्रेस से अपनी शर्तों पर समझौते कर रहे हैं, कारण इन सब क्षत्रपों को काँग्रेस अपने नाबालिग अध्यक्ष और आजतक हिन्दी की वर्तनी से जूझती अध्यक्षमाता की वज़ह से काँग्रेस 1985 के दो एम०पी० वाले बीजेपी से भी कमजोर नजर आ रही है और इस काँग्रेस से मनचाहे समझौते सदैव सहज लग रहे हैं, जबकि राजीव शासित काँग्रेस से इन सबकी दूरी आप सबको अबतक याद होगी।

अगर बीजेपी की सरकारों को छोड़ दिया जाये तो बाकी सारी सरकारें नाम मात्र का विपक्षी नेतृत्व कहला सकती हैं। केजरीवाल के पहले खेप की सरकार से लेकर चरण सिंह, चन्द्रशेखर, देवगौडा, गुज़राल की सत्ता तो कांग्रेसी चूल्हे पर सिंकी हुई अ-काँग्रेसी कठपुतली सरकारें थीं जिनकी डोर इन्दिरा, राजीव या सीताराम केसरी के हाथों में रहीं।

आज जिस हिन्दुत्व का आरोप लगा कर मोदी को वामपन्थी मीडिया गरिया रहा है उसे यह याद क्यों नहीं आता कि आज़ादी के वक्त तो काँग्रेस ही हिन्दूवादी पार्टी थी वरना मुसलमान हिन्दुस्तान छोड़कर जिन्ना के पाकिस्तान क्यों जाते और पाकिस्तान के इलाके से हिन्दू भारत की ओर पलायन क्यों करते?

जब द्विराष्ट्र सिद्धान्त पर देश का बँटवारा हुआ और संविधान में धर्मनिरपेक्षता का कहीं भी ज़िक्र ना था तब कैसी सेक्यूलर काँग्रेस और कैसी धर्मनिरपेक्षता? ये तो मुसलमानों के डर का दोहन करने के लिये सेक्युलर कन्सेप्ट अध्यारोपित करके एक प्रगतिशील हिन्दू की आधारशिला रखी गई थी जो धर्मभ्रष्ट होगा और अपने धार्मिक पतन को प्रगतिशीलता समझेगा। और ऐसा हुआ भी।

अब पुनः लौटते हैं दीदी के दादी अवतार पर। दरअसल बंगाल की जनता एक धर्म भीरु समाज है जिसे अपने सनातन संस्कृति पर गर्व है। बाँग्ला देश के मुसलमान भी हिन्दू पौराणिक कथानकों पर जात्रा नृत्य का हिस्सा बनते हैं जबकि वह एक इस्लामिक राष्ट्र है। सिंगूर के सिंह की सवारी कर सत्ता का सिंहासन पाने वाली ममता मुस्लिम मतों की सुरभि से मतवाली होकर ताज़िये के बेखौफ़ जुलूस के लिये विजया दशमी के मूर्ति विसर्जन तक पर रोक लगा चुकी है।

आप सब को यह याद ही होगा कि सनातन की शाक्त परंपरा बंगाल में ही पल्लवित और पुष्पित हुई। इसलिये असंतोष तो पनपा ही होगा ये वे जानती हैं और उन्हें ये भी बखूबी पता है कि मोदी के रूप में एक नायक अभी सक्रिय है जो अल्पसंख्यकों को वोट-बैंक से मात्र वोट बनाने में माहिर है और उत्तर प्रदेश में दिखा भी चुका है। यह असन्तोष मोदी की प्रखर हिन्दुत्ववादी छवि का आसरा पाकर कब तृणमूल को निर्मूल कर देगा, क्या पता? इसीलिये इस चाय के प्याले में फूँक मार कर तूफ़ान उठा दिया गया और मीडिया के चित्र प्रसारक उत्तल लेन्स का आसरा लेकर एक यलगार का ऐलान कर दिया गया।

जब वाम मोर्चा बंगाल में सबल था तो इन्हें कांग्रेस में उम्मीद की किरण दिखती थी और आगे चलकर इन्हें जब कांग्रेस मज़बूत दिखी थी तो अपेक्षाकृत कमजोर भाजपा का गठबन्धन एनडीए में सहयोगी दिखने लगा। अब बीजेपी की बुलंदी की वज़ह से सारे अ-भाजपाई मित्र दिखने लगे हैं यहाँ तक कि वाम मोर्चा भी जिनके खिलाफ़ इनका राजनीतिक आविर्भाव हुआ।

ये न्यायालय प्रेरित सीबीआई का पूछ ताछ प्रकरण एक सिगरेट का बुझता हुआ बट है जिसे फूँक मार मार कर ममता ने दावानल सरीखा प्रस्तुत कर दिया है। मोदी विरोधी सारे नेता गण इस जलती अगरबत्ती को फूँक मार मार कर मोदी विरोध का दावानल तैयार करने में लगे हैं। सीबीआई की निष्पक्षता या स्वायत्तता का मुद्दा एक ज्वलंत मुद्दा हो सकता है पर अभी तो दीदी के दादीगिरी के जलवे कई दिनों तक अराजकता का अहसास देते रहेंगे।

किसी व्यक्ति या दल या संस्थान द्वारा अहिंसापूर्ण अनशन द्वारा देश की सम्प्रभुता और वैश्विक साख पर बट्टा लगाने की कोशिश न्यायालय, संसद या संविधान द्वारा आपराधिक मामला माना जाना चाहिये और इसके सक्रिय स्रोत चाहे वह दल हो या व्यक्ति , दंड का भागी बने यही इस आलेख का लक्ष्य है।

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