लोकपाल : बहुरूपियों से सावधान!

किसी भी सरकारी संस्था के भ्रष्टाचार मुक्त व सक्रिय क्रियान्वयन के लिए तीन मूल तत्व – जवाबदारी (Accountability), सत्यनिष्ठा (Integrity) एवं पारदर्शिता (Transparency) आवश्यक होते हैं।

जैसे शरीर में वात, पित्त, कफ का संतुलन बिगड़ने से शरीर अस्वस्थ हो जाता है, वैसे ही उपरोक्त तीनों तत्वों में असंतुलन से सरकारी तंत्र अस्वस्थ अर्थात भ्रष्टाचार युक्त एवं निष्क्रिय हो सकता है।

जब शरीर अस्वस्थ होता है तो हम नि:संदेह अस्पताल जाते हैं, लेकिन इससे ये निष्कर्ष नहीं निकलता कि अस्पताल अच्छा स्वास्थ्य देता है। बल्कि अस्पताल जाना अक्सर लोगों का अंतिम विकल्प होता है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए योग, व्यायाम, अच्छा भोजन ही धारणीय होता है अर्थात जीवन की प्रक्रिया में सुधार लाकर ही अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है, अस्पताल मात्र एक आपातकालीन सपोर्ट सिस्टम होता है।

यदि किसी समाज में जीवन की प्रक्रिया में गड़बड़ी के कारण 90% आबादी रोगग्रस्त हो, तो कितने भी अस्पताल बना लो, वो मरीज़ों से पटा रहेगा। ऐसे ऐसे भी रोग होंगे, जिन्हें डॉक्टर ने पहली बार देखा होगा और इलाज के अभाव में मरीज़ दम तोड़ते रहेंगे।

ये होता है! वर्षों बाद जाकर इलाज मिलता है! इस प्रकार केवल अस्पताल बना भर देने से स्वास्थ्य की कल्पना नहीं की जा सकती, एक बेहतर जीवन प्रक्रिया नितांत आवश्यक है। उसके बाद ही अस्पताल आपातकालीन सपोर्ट सिस्टम के रूप में उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं, अन्यथा नहीं!

सरकारी तंत्रों की कार्य प्रणाली लम्बे समय तक गड़बड़ रही है जिसमें जवाबदारी(Accountability), सत्यनिष्ठा (Integrity) एवं पारदर्शिता (Transparency) इन तीनों मूल तत्वों का ख़ासा अभाव रहा है। इसी कारण 90% सरकारी तंत्र पूर्ण रूपेण रोगी रहा है।

सरकारी तंत्रों को इस रोग से निजात दिलाने के उद्देश्य से सन 2013 में लोकपाल एवं लोकायुक्त एक्ट 2013 पास हुआ, जिसे एक अस्पताल की तरह ही सरकारी तंत्र का इलाज करना था। लेकिन साथ में ये चिंता भी व्यक्त कि गई कि देश में चारों तरफ़ भ्रष्टाचार है, क्या बिना प्रक्रिया में सुधार किए अर्थात बिना व्यवस्था में जवाबदारी(Accountability), सत्यनिष्ठा (Integrity) एवं पारदर्शिता (Transparency) रूपी योग, व्यायाम और उत्तम आहार को शामिल किए, लोकपाल जैसा अस्पताल प्रभावी होगा?

ऐसे में लोकपाल इतनी शिकायतों से पटेगा कि इसका हाल भी न्यायालय, केंद्रीय सूचना आयोग जैसे होगा जिसमें सुनवाई की तारीख़ ही महीनों या सालों बाद मिलेगी। उसके बाद चूँकि जवाबदेही, सत्यनिष्ठा एवं पारदर्शिता ये तीनों तत्व सरकारी तंत्र से अनुपस्थित हैं जाँच का आधार क्या होगा, ऐसी स्थिति में लोकपाल वर्षों वर्ष जाँच करेगा, तब जाकर शायद सत्य के क़रीब पहुँचे या नहीं भी पहुँच सकेगा।

पारदर्शिता के अभाव में बहुत सारी शिकायतें केवल शक के आधार पर होंगी। जहाँ भ्रष्टाचार नहीं भी हुआ, वहाँ भी ज़िलाधिकारी कामधाम छोड़कर लोकपाल के चक्कर काटेंगे, क्योंकि पारदर्शिता के अभाव में किसी ने शक के आधार पर शिकायत कर दी है! इसीलिए काम करने और निर्णय लेने में अधिकारी हिचकेंगे! काम रुकेंगे!

उपरोक्त स्थिति में लोकपाल निष्क्रिय और नकारात्मक सिद्ध होगा। और चूँकि जाँच लम्बित होंगे तो लोकपाल में शिकायत राजनीतिक उद्देश्य से की जाएँगी, विदेशी ताक़तें भी अपने देशी एजेंटों के माध्यम से इसका इस्तेमाल कर पाएँगी और चूँकि PM, CM कार्यालय भी लोकपाल अंतर्गत आते हैं तो उन मामलों में भी जिसमें सरकार पाक साफ़ है, उन्हें लम्बित कर सरकार को कमज़ोर किया जा सकेगा। ये पूरे सिस्टम को इलाज के नाम पर अनेस्थिसिया देकर लकवाग्रस्त करने जैसा होगा!

इसीलिए ये कहा गया कि लोकपाल के बेहतर क्रियान्वयन के लिए और देश की संप्रभुता सुरक्षित रखने के लिए सर्वप्रथम सरकारी तंत्रों में जवाबदारी, सत्यनिष्ठा एवं पारदर्शिता सुनिश्चित होना चाहिए। तत्पश्चात् ही लोकपाल भ्रष्टाचार की रोकथाम में सहायक सिद्ध होगा अन्यथा एक त्रासदी सिद्ध होगा!

इसी दिशा में केंद्र में मोदी सरकार ने आते ही कॉरपोरेट कार्य संस्कृति को सरकारी काम काज में लाने पर बल दिया जिसमें जवाबदारी (Accountability), सत्यनिष्ठा (Integrity) एवं पारदर्शिता (Transparency) तीनों ही तत्व एक साथ उपस्थित होते हैं। ऐसी कार्य संस्कृति को सरकारी तंत्र में स्थापित करने के लिए कॉरपोरेट जगत से संयुक्त सचिव पद पर लेट्रल एंट्री की चतुर्थ प्रशासनिक सुधार आयोग के शिफ़ारिश को तवज्जो देना भी इसी का एक अंग है।

केंद्र सरकार द्वारा जवाबदारी के सुनिश्चित किए जाने का ख़ौफ़ इस क़दर नौकरशाही में है कि IAS एसोसिएशन मोदी सरकार के आगे गिड़गिड़ा रहा है कि मालिक रहम! अब तक जो किया, नेता के मन मर्ज़ी से किया, आगे से सही करेंगे!

लेकिन सरकार ने एक नहीं सुनी! पूर्व कोयला सचिव समेत 5 अफ़सरों को, जो मनमोहन सरकार में कोयला घोटाले में लिप्त थे, जेल में डाल दिया! अब तक का इतिहास है कि इतने बड़े पद पर रहा अधिकारी जेल नहीं गया है। अब तक चपरसी, BDO भी जेल जाते थे, वो भी बड़ी मुश्किल से! अब भ्रष्टाचार में दोषी मिलने पर मुख्य सचिव से लेकर DM, SSP तक सभी पकड़ पकड़ के रगड़ दिए जा रहे हैं।

मोदी सरकार ने अधिकारियों को कह दिया है कि “Perform or perish”. और अभी तक 381 क्लास-A सरकारी अफ़सरों को सज़ा दी जा चुकी है जिसमें से 24 IAS हैं। किसी की नौकरी गई, किसी को बलपूर्वक सेवानिवृत्त किया गया, कोई जेल गया, कईयों का कैरियर ख़त्म हो गया आदि आदि।

अभी तक ये सारे सरकारी मुलाज़िम “नेता चोरी करवा रहा है” इस बहाने बच लेते थे। इनकी कोई जवाबदारी नहीं थी! 100 रुपए का घोटाला करके नेता को पार्टी फ़ंड के लिए 40 रुपया देते थे, 60 रुपया अपने जेब में रखते थे फिर भी ईमानदार बनते थे। इनकी करोड़ों की बेनामी सम्पत्ति होती थी। शेल कम्पनी के माध्यम से काला धन सफ़ेद करते थे। P-नोट के माध्यम से मॉरिशस रूट से बेनामी निवेश करते थे।

अब ये सब सम्भव नहीं रहा! वो सोचते हैं कि कमा के रखेंगे कहाँ? अब उतना ही कमा रहे हैं कि महीने का राशन फ़्री में आ जाए। घर में गद्दे के नीचे माल रखने वाले फँस रहे हैं! अब अधिकारी नेता की नाजायज़ बात मनाने से पहले और अपनी टोपी उसके सर डालने से पहले दस बार सोच रहा है!

ठीक इसी प्रकार सत्यनिष्ठा (Integrity) एवं पारदर्शिता (Transparency) के लिए भी सरकार ने कार्य संस्कृति में बदलाव और तकनीकी से इस्तेमाल पर ज़ोर दिया है और उसे लागू किया है। DBT, ऑनलाइन प्रणाली, ऑनलाइन फ़ाइल ट्रैकिंग आदि उनमें से एक है!

अतः अन्ना हज़ारे ये क़तई नहीं कह सकते कि लोकपाल नियुक्ति में हुए विलंब से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में कमी आयी। वरन भ्रष्टाचार के मामलों में जिस प्रकार सीबीआई, सीवीसी, ईडी ने सक्रियता दिखाई है और जितने बड़े बड़े अधिकारी इस सरकार में सज़ायाफ़्ता हुए, बाद में लोकपाल इन्हीं संस्थाओं को अपने अधीन रखकर भी ऐसी कार्यवाही अगले दस वर्षों में भी कर पाएगा, ये कहना मुश्किल है।

लेकिन अन्ना हज़ारे को इससे मतलब नहीं है क्योंकि उनका अपना एक सेट एजेंडा है मोदी का विरोध। भ्रष्टाचार को लेकर वो यदि वाक़ई गम्भीर होते तो उपरोक्त कार्यों की सराहना करते और व्यवहारिक बिंदुओं को समझते, न कि अनर्गल विरोध करते!

मोदी सरकार पहले भी कह चुकी है कि सारी तकनीकी ख़ामियों को दुरुस्त कर लोकपाल लागू करेगी। और वो इसी दिशा में कार्यरत भी है। इसी प्रस्तावित बजट में ही लोकपाल कार्यालय के लिए 4.29 करोड़ का प्रावधान रखा गया है। सम्पत्ति की घोषणा जो इसी लोकपाल एक्ट का ही प्रावधान था, सरकार ने बहुत पहले ही लागू कर दिया।

लोकपाल नियुक्ति लम्बित होने का एक तकनीकी कारण ये भी था कि अभी कोई विपक्ष का नेता लोकसभा में नहीं है और लोकपाल नियुक्ति के लिए बने कमिटी में विपक्ष के नेता (Leader of Opposition) की अनिवार्यता होती है, जिसके लिए सरकार ने संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया हुआ है। जिसके पास होते ही लोकपाल की नियुक्ति का रास्ता साफ़ होगा। और लोकपाल की नियुक्ति सम्भव होगी और वो लोकपाल प्रभावी भी होगा!

(Note- According to Parliament rules, the biggest Opposition party in the House has to have at least 10 per cent of the total strength of the Lok Sabha, or 55 seats, to be eligible for the post of Leader of Opposition. The Congress, with 44 MPs is the largest Opposition party, thus there is no Leader of Opposition in Loksabha)

अन्ना हज़ारे के अनशन की वास्तविकता ये है कि जब मोदी सरकार कई संरचनात्मक व तकनीकी ख़ामियों को दूर करने के बाद लोकपाल नियुक्ति की ओर अग्रसर है, इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने भी डेड लाइन दे डाली है, तो अन्ना हज़ारे अनशन की नौटंकी करके ये साबित करना चाहते हैं कि मेरे अनशन से लोकपाल नियुक्त हुआ, ये सरकार तो कुछ करने वाली नहीं थी। अतः ऐसे बहुरूपियों से सावधान!

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