पटना लिटरेचर फेस्टिवल 2019 : साहित्य, कला और संस्कृति का कुम्भ

ज्ञान भवन 1 फ़रवरी 2019 : बहुप्रतीक्षित पटना लिटरेचर फेस्टिवल की शुरुआत आज ज्ञान भवन में हुई। तीन दिवसीय इस महोत्सव का आयोजन कला, संस्कृति और युवा विभाग, बिहार और नवरस स्कूल ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स द्वारा किया गया है.

इसमें देश और विदेश के प्रतिष्ठित लेखक भाग ले रहे हैं पीएलएफ के दौरान 34 मनोरंजक सत्र हो रहे है जिसमे 8 भाषाओ के लगभग 85 लेखक भाग ले रहे है. उत्सव में आज एक सांस्कृतिक संध्या आयोजित की गई जिसमें प्रसिद्ध कव्वाली गायक निज़ामी ब्रदर्स ने अपनी भावपूर्ण कव्वाली से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

समारोह में सभी प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए में नवरस स्कूल ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स के प्रमुख डॉ अजीत प्रधान ने कहा कि पटना साहित्य महोत्सव 2013 में कहा गया था और यह त्योहार का तीसरा संस्करण है। उन्होंने कहा कि आमंत्रितों की सूची में अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू, मैथिली, अंगिका, वज्जिका और मगही के लेखकों से लेकर फोटोग्राफर्स, फिल्म निर्माताओं, गायकों, सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, इतिहासकारों को आमंत्रित किया हुआ है जो विविधतापूर्ण है।

सत्र की शुरुआत 2018 में दिवंगत प्रसिद्ध साहित्यिक और सांस्कृतिक हस्तियों को श्रद्धांजलि देने के साथ हुई पवन वर्मा ने पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी को विभिन्न मौकों पर उनसे मुलाकात के कुछ व्यक्तिगत उपाख्यानों को साझा करके श्रद्धांजलि दी। कवि श्री आलोक धन्वा ने प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह को श्रद्धांजलि दी। पदमश्री उषाकिरण खान ने कृष्णा सोबती को उनके योगदान के बारे में बताते हुए याद किया। त्रिपुरारी सरन ने वी एस नायपॉल को श्रद्धांजलि दी जबकि डॉ रमा दास ने अन्नपूर्णा देवी को श्रद्धांजलि दी।

आज पहले दिन इस उत्सव की शुरुवात पवन वर्मा से उनकी पुस्तक आदि शंकराचार्य पर मनीष पुशकले ने चर्चा की. आदि शंकराचार्य पर चर्चा करते हुए पवन वर्मा कहा की आदि शंकराचार्य के ऊपर लिखते हुए इस इस किताब के जरिए ये बताने की कोशिश की गई हैं की हिंदू धर्म एक जीवन्त शैली हैं ! इसमें यह भी बताया गया हैं की हिंदू धर्म के पीछे क्या रीति रीवाज हैं ! दार्शनिक स्तर पर पहुँचने के लिए आदि शंकराचार्य से कोई बेहतर पुस्तक नहीं हो सकती हैं !

पवन वर्मा ने यह भी बताया कि आदि शंकराचार्य का जन्म 8वी शताब्दी में केरला के कालाडी में हुआ और उनकी समाधी केदारनाथ में लगी !ये उनकी विशेषता हैं ! 32साल की अल्पायु में उनका निधन हुआ ! पवन वर्मा ने यह भी बताया की इस पुस्तक में यह बताया गया हैं की हिंदू दर्शन की बुनियाद क्या हैं ! विज्ञान का आधार क्या हैं ! आदि शंकराचार्य पर लिखी इस किताब में यह बताया की वहम क्या हैं, दुनिया क्या हैं जैसे विषयों पर चर्चा है . उन्होंने यह भी बताया की यह पुस्तक अब मलयालम, गुजराती, मराठी, बंगाली जैसे भाषा में भी आ रही हैं .

कला के कथा साहित्य और इतिहास में आज की नारी नामक सत्र में संबोधित करते हुए निवेदिता शकील जी ने कहा कि स्त्रियों को जरूरत है साहित्य पढ़ने की, साहित्य से मुहब्बत करने की, आंदोलन करने की.

लिखने के क्षेत्र में औरतों की धमक बहुत कम है लेकिन लिखने वाली औरतों ने तो रसोइयों में बैठकर लिखा जिनका कहीं नामों निशान नहीं है. उन्होंने महादेवी वर्मा की कविता पढ़ते हुए कहा कि न जाने कितनी औरते हैं जो लिखना चाहती है लेकिन लिख नही पाती. कुंतला की छवि के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि वो मुखर है कालिदास के लिए वही शकुंतला दूसरी नायिका हो जाती है जो औरों के लिए वो कुछ और रहती है.

सिखावत हुसैन रुकैया बेगम के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि वो 100 साल पहले लिखी थी लेकिन वो कहती थी कि औरते होंगी घर के बाहर और मर्द होंगे घर के अंदर जो समाज मे हिंसा फैलाते हैं. रुकैया बेगम की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि मुस्लिम महिलाओं के लिए पहला स्कूल उन्होंने ने ही खोला जब लोगों ने उसका विरोध किया तो वो लड़कियों के लिए बसें भी चलवाई हालांकि आवाज़ उसके बाद भी उठी लेकिन वो रुकी नहीं.

मंटो पर बोलते हुए निवेदिता ने यह बताया कि महिलाओं पर उनसे अच्छा कौन लिख सकता है. रुकैया की कहानी का शीर्षक -एक समाज जिसमें मर्द घर में होंगे, पर भी चर्चा की और यह बताया कि रुकैया ने मुस्लिम महिलाओं के लिए पहला स्कूल खोला.

झारखण्ड के महिला आयोग की अध्यक्ष और उपन्यासकार महुआ मांझी ने महिला लेखिकाओं पर बोलते कहा कि आजकल महिलाएं काफी निडर और निर्भीक बेखौफ लिख रही हैं. अभी के साहित्य में महिला लेखिकाओं में कोई पाखंड नहीं दिखता है. उन्होंने झारखण्ड जैसे पिछड़े राज्यों में डायन जैसी कुप्रथाओं पर महिला लेखिकाओं से ज्यादा से ज्यादा लिखने की अपील की और लड़कियों के तस्करी पर अपनी लेखनी के जरिये ध्यान आकृष्ठ कराने की कोशिश की.

सुमेधा ओझा वर्मा ने अपनी बात रखते हुए कहा कि मैं महिला सशक्तिकरण को नहीं मानती क्योंकि महिला खुद सशक्त हैं बस उनको ये भ्रम है कि वो कमजोर हैं, फिर उन्होंने अपने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि मैं नहीं मानती कि पहले की महिलाएं साहित्य नहीं लिखती थी वो साहित्य लिखती थी लेकिन उनके साहित्य को उजागर नहीं किया जाता था, उन्होंने ऋगवेद की चर्चा करते हुए कहा कि ऋगवेद लिखने में भी 21 महिलाओं का हाथ था.

अवैया के बारे में चर्चा करते हुए कहा कि तमिलराजा की वो खास कवि थी,फिलॉस्फर थी यहां तक कि वो उनकी गाइड भी थी। सुमेधा ने बिहार की ढाई हजार साल पहले की कवयित्री आम्रपाली जो बुध से प्रेरित थी उनकी जिक्र ‘थेरीगाथा’ में है और अंत में उन्होंने कहा कि और अंत मे कहा कि महिलाएं पहले से ही साहित्य लिखती आ रही हैं क्योंकि यही वजह कि हम आज बिना किसी डर के लीख रहे हैं

आधुनिकता की कसौटी पर मिथक नामक सत्र के दौरान पदम श्री उषा किरण खान ने कहा कि मिथक आकर्षित करता हैं.उन्होंने कहा कि प्राचीन इतिहास लिखा ही नहीं गया वो तो हमेशा साहित्य और मिथक के पीछे पीछे ही चला .परंपरा कोई बुरी चीज नहीं होती हैं . उसमे कोई नई चीज आती हैं और कुछ निकलती हैं .उन्होंने कहा की आधुनिक समाज के हिसाब से भी परम्परा होनी चाहिए. लेखिका मैत्रेय पुष्प ने ईस्वरी के उपन्यास के बारे में पूरी विस्तारपूर्वक चर्चा की . रजो के बारे में मैत्रीय पुष्पा ने कहा की वो झाँसी की रानी के साथ स्वतंत्रता संग्राम में भी भाग लिया . मैत्रीय पुष्पा ने कहा कि जो ये कहते हैं की स्त्री से कोई आशा नहीं की जा सकती हैं .ये मिथक हैं . पदम् श्रीनरेन्द्र कोहली ने अपने सम्बोधन में आधुनिकता और मिथक पर बात की .उन्होंने कहा की ये आधुनिकता क्या हैं? केवल नया होना, भिन्न होना या इसका कुछ और स्वरूप हैं . दूसरी मिथक शब्द पर चर्चा करते हुए बताया की मिथक शब्द जो हैं ही नहीं . रामकथा में अहिल्या के चरित्र के माध्यम से उन्होंने वर्ण व्यवस्था पर चर्चा की. नरेन्द्र कोहली ने रामकथा के जरिए आज के ऋषियों और राक्षसो पर कटाक्ष भी किया . उन्होंने कहा कि रूढ़ि कोई तोड़ देना चाहिए और परंपरा में कुछ निकलता हैं, बदलता हैं . अंत में अनामिका ने यह कहते हुए कि युग और काल के हिसाब से लेखक कहानियाँ गढ़ते और रचते हैं सत्र के समापन की घोषणा हुई .

भोजपुरी आज का लेखन डॉ ब्रजभूषण मिश्र ने भोजपुरी साहित्य की चर्चा करते हुए कहा कि भोजपुरी साहित्य का प्रचलन आजादी के बाद ही आया, आजादी के पहले भोजपुरी साहित्य नाममात्र का था.

मृत्युंजय कुमार सिंह ने कहा कि भोजपुरी साहित्य का कैनवास बहुत बड़ा है लेकिन भोजपुरी समाज के लोगों में भोजपुरी साहित्य को पढ़ने की रुचि नहीं है फिर उन्होंने भोजपुरी साहित्य के लेखकों के साथ होने वाले दिक्कतों को बताया कि किताबे बिकती नहीं है जिसके कारण भोजपुरी साहित्य लिखने वालों की कमी है उन्होंने भोजपुरी साहित्य के लेखकों के साथ एक और दिक्कत ये भी बताई की हर भोजपुरी क्षेत्र में अलग अलग तरीके से भोजपुरी बोली और समझी जाती हैं ।

नयी जमीं पर बदलता कथा का स्वरुप सत्र के दौरान प्रसिद्ध कथाकार ऋषिकेश सुलभ ने कहा कि हम साहित्य को कैसे मापते हैं उसका सिर्फ एक ही पैमाना हो सकता है कि क्या वो हमारे सरोकारों की बात करता है. सिर्फ नदी पहाड़ों कि चर्चा को साहित्य तो कह सकते हैं, मगर अच्छा साहित्य नहीं.

वंदना राग ने कहा कि ज़मीनी हकीकतें कुछ सालों में बहुत बदल गई है और इस वजह से लेखक ने जो लिखा है उससे आज का पाठक जुड़ नहीं पाता. अवधेश प्रीत ने बताया कि हम सब एक आभासी दुनिया में जी रहे हैं। महिलाओं और पुरुषों के लिए, जो अब दादा दादी है , उनके पास बच्चों के लिए पारंपरिक कहानियां नहीं हैं। यह टेक्नोलोजी का प्रभाव है जिसके लिए हमारे पास अधिक समय नहीं है।

उन्होंने बदलती हिंदी पर चर्चा करते हुए कहा कि हिंदी साहित्य आजकल बदल रहा है। आज के समय में वर्चुअल वर्ल्ड अफवाहें तेजी से फैलती हैं। समय बदलने के कारण लिटरेचर पर खतरों के बारे में बात भी की ।

अंतिम सत्र पीर गूंगी ही सही गाती तो है सत्र में कविता पाठ का आयोजन हुआ जिसमें अनामिका ने आम्रपाली, गगन गिल ने इस तरह शुरू होती हैं यात्राएँ, कभी कभी अपना सच कह देना चाहिए, एक गऊ मेरे भीतर हैं जिसे कटने का डर हैं! रजत ने – विदा लेते हैं अब जब बेटे ! और अलोक धन्वा ने रचा जिसे युगों में, पुराने शहर में नाम कि कविता का पाठ किया । इसके अलावा मुकेश प्रत्युष, सुरेश रितूपर्ण, शिवानी आनंद , प्रत्युष गुलेरी और माधव कौशिक ने भी अपनी कवितायेँ सुनाई.

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