आक्रामकता, कुशल रणनीति और गहरी समझ बनाती है विजेता

भारतीय क्रिकेट टीम में एक से बढ़कर एक खिलाड़ी हुए, कर्नल सी के नायडू, मुश्ताक़ अली, गुंडप्पा विश्वनाथ, बिशनसिंह बेदी, सुनील गावस्कर, कपिलदेव, सैयद किरमानी, संदीप पाटिल, दिलीप वेंगसरकर बड़ी लंबी फेहरिस्त है।

कपिल देव के नेतृत्व में भारत ने पहली बार 1983 में विश्व विजेता बनने का गौरव भी हासिल किया लेकिन इसके बावजूद भारतीय टीम कभी भी विश्व की धाकड़ टीमों में शुमार नहीं हो पा रही थी।

जब सचिन तेंदुलकर का भारतीय टीम में पदार्पण हुआ और सचिन ने एक के बाद एक विश्व कीर्तिमान बनाने शुरू किए तब भारतीय टीम की स्थिति ऐसी हो गई कि पूरी की पूरी टीम केवल सचिन पर ही निर्भर हो गई, सचिन जल्दी आउट तो पूरी की पूरी टीम मानों केवल औपचारिकता निभाने ही मैदान पर आती थी और तुरंत पैवेलियन लौट जाती थी। विरोधी टीमों की भी कोशिश केवल सचिन को आउट कर लेने की होती थी क्योंकि उनको पता था कि सचिन आउट तो टीम इंडिया आउट।

सचिन तेंदुलकर न केवल बेहतरीन खिलाड़ी थे बल्कि व्यक्तिगत तौर भी बेहद शालीन, संयमित रहते थे, आज भी रहते हैं। एक खिलाड़ी के तौर पर सचिन का रेकॉर्ड बेजोड़ रहा है, लेकिन सचिन कभी बेहतर कप्तान नहीं बन सके थे। बल्कि कप्तान बनने के बाद सचिन और भी ज़्यादा दबाव में आ गए और इसका असर उनके खेल पर भी साफ दिखने लगा था। सचिन इस दबाव को ज़्यादा दिन झेल नहीं सके और उन्हें कप्तानी से हटना ही पड़ा।

सचिन के बाद सौरव गांगुली ने भारतीय टीम की कमान संभाली और वो सौरव गांगुली ही थे जिनके नेतृत्व में भारतीय टीम में जान फूँक दी, प्रतिभा की कमी पहले भी नहीं थी, कमी थी तो सिर्फ कुशल नेतृत्व की।

सौरव गांगुली ने विरोधियों की आंखों में आंखें डालकर भिड़ना, आखरी दम तक किला लड़ाने, किसी एक खिलाड़ी पर निर्भरता को ख़त्म कर दिया। उसका नतीजा ये हुआ कि समूचे विश्व में भारतीय टीम की धाक बढ़ने लगी।

विरोधी टीमों की केवल सचिन को लेकर रणनीति बनाने की नाकाम होने लगी और सौरव गांगुली के नेतृत्व में अब भारतीय टीम वो बन चुकी थी जो उसे होना चाहिए था।

सौरव गांगुली की आक्रामक शैली से थोड़ा सा विपरीत लेकिन पूरे दमख़म, ग़ज़ब के क्रिकेट कौशल, एक बेहतरीन फिनिशर, ग़ज़ब के रणनीतिकार महेंद्र सिंह धोनी ने भारतीय टीम को वहाँ से आगे ले जाने का काम किया जहाँ सौरव गांगुली छोड़ गए थे।

धोनी के नेतृत्व में भारत एक बार फिर विश्व विजेता बना और सचिन जैसे बेहद प्रतिभाशाली खिलाड़ी का विश्व विजेता टीम का हिस्सा बनने का सपना पूरा हुआ।

विकेट के पीछे खड़े धोनी को हर खिलाड़ी की नब्ज़ समझ आती है और वो उसी हिसाब से फील्डिंग जमाते हैं, गेंदबाजी करवाते हैं और अक्सर विरोधियों को चकमा दे जाते हैं। लगभग हारे हुए मैच भी धोनी ने कई बार भारत को जिताये हैं।

कांग्रेस ने लंबे समय तक देश पर राज किया उसका सबसे बड़ा कारण ये था कि उसके सामने कोई और बड़ी पार्टी थी ही नहीं। पहले जनसंघ, फिर भाजपा ने जब खुद को विकल्प के तौर पर प्रस्तुत किया तो ये हाथी और चूहे की लड़ाई थी।

कांग्रेस अपने पुराने और देशव्यापी संगठन की बदौलत केंद्र और अनेक राज्यों में सत्तारूढ़ बनी हुई थी। इसके अलावा जब स्वतंत्रता के बाद से ही सत्ता की चाबी कांग्रेस या कहें कि गांधी परिवार के पास ही थी तो ज़ाहिर है कि सारा का सारा सिस्टम कांग्रेस द्वारा ही बनाया गया और उसमें केवल उन्हीं लोगों को सिस्टम में फलने फूलने दिया जो उसकी शर्तों पर काम करने को राजी थे या उनके हिसाब से अपने आपको फिट करने, बदलने को तैयार हुए।

कांग्रेस के इस एकाधिकार को चुनौती देनेवाली हर छोटी बड़ी पार्टी या तो कांग्रेस के साथ हो गई या समाप्त हो गई। लेकिन सिर्फ एक पार्टी ही इस एकाधिकार को पूरी दृढ़ता के साथ चुनौती देती रही और वो थी भाजपा।

भाजपा में अटलजी, आडवाणीजी, सुषमाजी, गोपीनाथ मुंडे, सुमित्रा महाजन, प्रमोद महाजन, अरुण जेटली जैसे अनेकानेक बेहतरीन नेता हुए। जो न केवल कुशल राजनीतिज्ञ बल्कि अच्छे वक्ता भी थे, हैं।

अटलजी के नेतृत्व में 1998 से लेकर 2004 तक सरकार ने बेहतर काम किया, परमाणु परीक्षण किया, तमाम तरह के प्रतिबंधों को झेला लेकिन कांग्रेस के बनाये सिस्टम को समझने, उसे भेदने में स्व. अटलजी पूरी तरह से नाकाम रहे और 2004 की इस हार से निराश होकर सक्रिय राजनीति से सन्यास लेकर राजनीतिक, सामाजिक पटल से अदृश्य हो गए।

जब 2013 में भाजपा ने तब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया तभी एक महाविजय की नींव रख दी गई थी। उसके बाद मोदी और शाह के अगुआई में जब भाजपा ने ताबड़तोड़ रैलियाँ की, मोदी ने देश की जनता को भरोसा दिलाया कि वो एक बेहतर भारत बनाकर देंगे तो देश की जनता ने उन पर भरोसा जताया और न केवल केंद्र बल्कि एक के बाद एक अनेक राज्यों में भाजपा की सरकार बन गई।

अपने एकाधिकार को ख़तम होते देख कांग्रेस भाँप गई कि अगर मोदी की राह में रोड़े नहीं अटकाए गए तो ये हमें रोड पर ला देगा। अपने सिस्टम में फिट प्यादों को आये दिन नए नए प्रपंच करने के आदेश दिए जाने लगे। अवॉर्ड वापसी, असहिष्णुता, टुकड़े टुकड़े गैंग, जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस ये सब उसी का हिस्सा थे।

लेकिन गांगुली जैसी आक्रमकता और धोनी जैसी कुशल रणनीति, गहरी समझ के बूते मोदी न केवल अपना कार्यकाल पूरा कर रहे हैं बल्कि देश को साफ स्वच्छ करके, आंतकवाद से मुक्त करके, रोड रेलवे, व्यापार, विदेश नीति, कूटनीति से देश को उन्नति की ओर ले जा रहे हैं। कांग्रेस के सिस्टम पर ही मोदी ने प्रहार किया है और ये केवल मोदी ही कर सकते थे।

आये दिन EVM पर सवाल खड़े करने वाली और अपने काबिल (?) वकील कपिल सिब्बल के जरिये विदेश में एक टैक्सी ड्राइवर चूज़े के मार्फ़त EVM हैक (?) करके दिखाने वाली कांग्रेस और 2014 में इसी हैकिंग के ज़रिये भाजपा पर चुनाव जीतने का आरोप लगाने वाली कांग्रेस इस बात का जवाब दे कि जब 2014 तक उसी की सरकार थी, सारा सिस्टम उसी का था तो उसी की नाक के नीचे भाजपा ऐसा करने में कामयाब कैसे हो गई? उस वक़्त सिस्टम ने अपने आकाओं को ख़बर क्यों नहीं की?

दरअसल कांग्रेस और समूचा विपक्ष ये समझ चुका है कि 2019 में मोदी ने उनके लिए कुछ भी छोड़ा नहीं है।

मैच हारने पर हर कप्तान अपनी टीम की गलतियों को स्वीकार करता है, विजेता टीम के उज्ज्वल पक्ष की तारीफ करता है, लेकिन राजनीति में ऐसा नहीं होता है वहाँ स्वयं में कोई ग़लती नज़र नहीं आती, विजेता का उज्ज्वल पक्ष नज़र नहीं आता और हार की ज़िम्मेदारी लेने की बजाय किसी और के माथे ठीकरा फोड़ा जाता है।

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