थोपे जाते मिथक

भारत में बरसों तक प्रचलित रहे मिथकों में से एक था ‘आर्यन इन्वेज़न थ्योरी’। पहले तो जिसने ये थ्योरी दी उसी ने रिजेक्ट कर दी। उसके बाद इसके लिए कोई साक्ष्य भी नहीं मिले, इसलिए भी इसे बनाए रखना मुश्किल हुआ।

इस थ्योरी को अम्बेडकर ने भी सिरे से ख़ारिज कर दिया था। इसके साथ साथ अम्बेडकर नाक की माप के आधार पर बनाई जातियों वाली ‘नेज़ल इंडेक्स थ्योरी’ को भी ख़ारिज करते थे।

अजीब सी बात है कि आज खुद को अम्बेडकरवादी बताने वाले कई लोग इस ‘आर्यन इन्वेज़न थ्योरी’ के मिथक में यकीन करते हैं।

उनमें से कुछ तो ऐसे हैं कि सीधा संसद में ऐसे ‘मिथक’ का प्रचार करते हैं। अब बहस संसद में थी इसलिए उसपर कोई कार्यवाही नहीं हो सकती।

यही दूसरे ‘मिथक’ की याद दिला देता है। इस दूसरे ‘मिथक’ में कहा जाता है कि कानून की नजर में सभी भारतीय नागरिक बराबर है!

अगर ये ‘मिथक’ सच होता तो जिस बात के लिए मेरे ऊपर एक असंवैधानिक काले कानून के जरिये मुकदमा हो सकता है, वैसे ही सांसद पर भी लागू होते।

ऐसे ही मिथकों में से एक ये भी है कि अमीर व्यापारियों पर टैक्स लगाकर गरीबों तक पैसा पहुँचाया जायेगा!

टैक्स के नियम एक वेतनभोगी और एक व्यापारी के लिए ठीक उल्टे होते हैं। एक नौकरीपेशा आदमी के लिए उसकी तनख्वाह वो रकम है जो टैक्स काट कर मिलती है। उसपर टीडीएस यानि टैक्स डिडक्शन एट सोर्स लगता है। व्यापारी पूरे साल खर्च करने के बाद दिखाता है कि उसके पास मुनाफा बचा, वो उस मुनाफे पर टैक्स देता है।

जैसे ही उसे लगेगा कि उसे ज्यादा मुनाफा हो गया है, वो उस मुनाफे के पैसे को पहले ही अपने ऑफिस के लिए कंप्यूटर/एसी लेकर या कंपनी के डायरेक्टर (खुद) के लिए कार लेकर खर्च कर दे तो कौन सा बढ़ा हुआ टैक्स उसपर लागू होगा? जीएसटी में लगातार टैक्स भरते रहने के कारण मुनाफे को रोककर उसे बाद में खर्च दिखा देना मुश्किल होता है। इसलिए भी जीएसटी से दिक्कत है।

कल पटना लिटरेचर फेस्टिवल में प्रख्यात साहित्यकार नरेन्द्र कोहली की चर्चा का विषय ‘आधुनिकता’ और ‘मिथक’ पर बातचीत था। उन्होंने शुरुआत एक प्रचलित ‘मिथक’ से की जिसके मुताबिक कहा जाता है कि हिन्दी के पाठक घटते जा रहे हैं।

उन्होंने पूछा कि इसकी जांच के लिए कौन से सर्वेक्षण करवाए गए? कैसे पता चला कि हिन्दी के पाठक पहले ज्यादा थे और अब कम? प्रकाशकों की गिनती हर साल बढ़ती ही है, उनके बंगले ऊँचे होते जाते हैं, उनकी अगली पीढ़ियाँ इसी व्यवसाय में आ रही हैं। जाहिर है कि सच्चाई, पाठकों के कम होने वाले ‘मिथक’ से कहीं कोसों दूर खड़ी है।

बाकि उन्होंने इससे आगे भी काफी कुछ कहा था, जिसका ज़िक्र हम जाने दे रहे हैं। पटना लिटरेचर फेस्ट में आज दूसरे दिन भी उनका दोपहर में एक कार्यक्रम है। इस बार उनकी चर्चा का विषय ‘विश्व साहित्य में हिन्दी’ है।

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