Honesty is the best policy

किताबों में पढ़े यह शब्द किताबों तक ही सीमित रह गये। सामान्य जीवन में जब ईमानदारी के पाठ की वास्तविकता को समझा तो किताबों में पढ़ी बात “किताबी” लगने लगी।

फिर भी गाहे बगाहे ऐसे कई उदाहरण सुनने में मिल जाते हैं जिनसे एक ईमानदार समाज की कल्पना पुनः जागृत हो जाती है।

तस्वीर केरल के कुन्नूर जिले के अज़हीकोड गाँव में स्थित एक दुकान की है।
विशेषता यह है के इस दुकान में कोई दुकानदार नहीं है।

दुकान जनशक्ति चेरिटेबल ट्रस्ट के सदस्यों द्वारा खोली गई है जो दिव्यांगों के हित के लिये समूचे केरल में उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं। दुकान में रखे गये सारे उत्पाद दिव्यांगों द्वारा बनाये गये हैं। दुकान में साबुन / वाशिंग पाउडर / हैंडवाश /मोमबत्तियां / बैग आदि उपलब्ध हैं।

सभी उत्पादों पर उनका दाम यानी एमआरपी लिखा हुआ है। ग्राहक दुकान में आता है। अपनी पसंद का सामान उठाता है। उस पर लिखा दाम देखता है और दुकान में रखे एक गल्ले यानी कैश बॉक्स में पैसा डाल कर सामान ले जाता है। इस सारी प्रक्रिया में उसे एक ही आदमी देखता है और वह है उसकी अंतरात्मा।

दुकान में कोई दुकानदार कोई रखवाला नहीं है। दुकान के बाहर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा है कि यह सामान विकलांग व्यक्तियों ने बड़ी मेहनत से बनाया है और आशा है के खरीददार उनकी मेहनत का उचित मूल्य प्रदान करेगा।

ट्रस्ट का एक सदस्य सुबह 6 बजे दुकान खोल देता है और देर शाम तक दुकान खुली रहती है।

बेईमानी और भ्रष्टाचार से लिप्त इस समाज में एक दुकान बिना दुकानदार के चलाने के आइडिया के बारे में जब ट्रस्ट के एक सदस्य आर विजयन से पूछा गया तो उनका जवाब कुछ वज़ प्रकार था ……

“ईमानदारी जीवित है। हिंदुस्तान आज भी एक ईमानदार राष्ट्र है। भ्रष्टाचार व्याप्त है परन्तु अधिकतर देशवासी आज भी बेईमानी के निवाले को छोड़ ईमानदारी की रोटी खाना पसंद करते हैं। दुकान खुली है। कोई भी कुछ भी उठा सकता है। परंतु ऐसा होता नहीं है। हमें एक सामान्य मानवी की ईमानदारी पर विश्वास है”।

1 जनवरी 2019 को इस दुकान को खोला गया था और शायद आप सब जान कर आश्चर्यचकित हों के तब से लेकर अब तक इस दुकान से एक नये पैसे का सामान भी चोरी नहीं हुआ है। हर रोज़ दुकान से लगभग 1000 रुपये का सामान बिकता है। ग्राहक आते हैं। सामान लेते हैं और कैशबॉक्स में पैसे डाल कर जाते हैं। सामान की बिक्री में अब “एक रुपये” का भी फर्क नहीं मिला है। दुकान चल रही है और बिना दुकानदार के चल रही है।

एक समय था जब मैं स्वयं पूर्वाग्रहों से पीड़ित था। समाज और राष्ट्र से जुड़े हर विषय पर एक “धारणा” बना चुका था। परंतु फिर किसी दिन सिक्के के दूसरे पहलू को देखना शुरू किया तो समाज और राष्ट्र का सकारात्मक पहलू भी दिखाई दिया।

जहां एक ओर चोर उच्चके और ठग ही दिखाई देते थे वहां ईमानदार और राष्ट्रवादी जन भी दिखाई दिये। इकबाल ने यूं ही नहीं लिख डाला “सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा”

वतन की अच्छाईयाँ देखने निकलें तो महसूस होता है के लाखोँ खामियों के बावजूद अपना वतन बेहतरीन है।

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