ED की छापेमारी, अपनी ही शिकायत पर कार्रवाई से बिलख रहे अखिलेश

परसों प्रवर्तन निदेशालय ने 2007 से 2011 के बीच मायावती सरकार द्वारा बनाये गए स्मारकों से सम्बंधित घोटाले में 7 स्थानों पर छापेमारी की। इन स्मारकों पर 41.48 अरब रुपया खर्च हुआ था।

अखिलेश यादव ने सत्ता में आने के बाद लोकायुक्त एन के मेहरोत्रा को इसकी जांच सौंपी थी और अपनी 20 मई 2013 की रिपोर्ट में लोकायुक्त ने 1410 करोड़ के घोटाले की बात कही थी और 199 लोगों के इसमें लिप्त होने की बात सामने आई थी। इस घोटाले की वजह से उत्तर प्रदेश की सरकार को 111 करोड़ का नुकसान हुआ।

राज्य के विजिलेंस विभाग ने, 1 जनवरी, 2014 को लखनऊ के गोमती नगर थाने में मायावती के मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबू सिंह कुशवाहा समेत 19 नामजद और अन्य अज्ञात के खिलाफ जांच शुरू की।

उसी विजिलेंस की जांच के आधार पर प्रवर्तन निदेशालय ने मनी लॉन्डरिंग एक्ट के तहत केस दर्ज किया।

इस मसले में मजेदार बात ये है कि लोकायुक्त ने मायावती के मंत्रियों का नाम तो लिया मगर मायावती का नहीं लिया, ऐसा प्रतीत होता है जबकि इन स्मारकों को खड़ा करने के पीछे मायावती ही थी।

लेकिन उनके मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबूसिंह कुशवाहा अब बसपा में नहीं हैं और शायद इसीलिए मायावती सन्नाटे में है कि ना जाने वो लोग उनके बारे में क्या राज़ उगल दें।

अखिलेश यादव के खनन घोटाले के उजागर होने और बी चन्द्रकला पर रेड होने पर वो चिल्लाये थे कि सी बी आई हमारे गठबंधन को तोड़ने के लिए काम कर रही है। उनके चाचा रामगोपाल यादव ने तो प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को धमकी दे दी कि वो बनारस से चुनाव लड़ना भूल जाएँ।

एक तरफ मायावती ने कोई बयान नहीं दिया मगर अखिलेश कल फिर बोले कि गठबंधन के खिलाफ साज़िश की जा रही है।

वो कैसे भाई?

लगता है अखिलेश कहना चाहते हैं कि अब मायावती उन पर ही तो बरसेगी कि उनके स्मारकों की जांच अखिलेश ने ही तो बिठाई जिसकी वजह से वो फंसती नज़र आ रही हैं।

आज अखिलेश यादव इस घोटाले पर कार्रवाई के लिए भाजपा सरकार को कैसे दोष दे सकते हैं। 2012 में अखिलेश ने सरकार बनाई और उन्होंने ही मायावती के खिलाफ जांच लोकायुक्त को सौंपी।

2014 में भी अखिलेश ही सत्ता में थे जब मायावती के मंत्रियों समेत अन्य लोगों पर विजिलेंस की FIR दर्ज कर जांच शुरू की गई।

यानि अखिलेश ही मायावती को टांगना चाहते थे।

फिर भाजपा कैसे जिम्मेदार हुई? अखिलेश ने तो खुद ही मायावती के खिलाफ जाल बुना था, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि एक दिन ये जाल उनके लिए ही समस्या बन जायेगा।

अभी तो अखिलेश के खनन घोटाले की जांच चल रही है जिसमें उनकी गर्दन ज़रूर नपेगी क्यूंकि चन्द्रकला मुंह खोलने में देर नहीं करेगी।

अपने जिस गठबंधन पर घमंड कर रहे हैं अखिलेश, वो टूटने में देर नहीं लगेगी, मायावती वो बला हैं जिस पर जो जितना विश्वास करेगा उतना डूबेगा।

आज़म खान तो अखिलेश को पहले ही कह रहे हैं गन्दगी पर चांदी का वर्क लगा कर खा रहे हो!

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