Oxymoron यानी विपरीत लक्षणा अलंकार, जैसे ‘नंगई ओढ़ना’

Oxymoron एक अंग्रेजी शब्द है। हिंदी अर्थ होगा ‘विपरीत लक्षणा अलंकार’।

जैसे आप कहेंगे, he is seriously funny – तो यहाँ दो शब्दों – seriously और funny जिनका अर्थ एकदम विपरीत है, पर यहां ये मिलकर एक अलंकृत भाषा का अनुभव कराते हैं। और उदाहरण हुए – open secret, clearly confused, pretty ugly और ऐसे ही खूब हैं।

एक oxymoron मैंने भी लिखा है। ‘नंगई ओढ़ना’! इसमें नंगेपन और ओढ़ने/ पहनने की बात हो रही है। दोनों विपरीत अर्थ लिए हैं, पर कोई नंगई ओढ़ ले तो आप क्या कर लेंगे।

अब आप इस खबर को ही देखिए… दरअसल खबर ये है कि भारत के पास दशकों पुराने Mig विमान अब रिटायर होने की कगार पर है। 36 राफेल के बाद भी लगभग 100 – 110 छोटे सिंगल-इंजन विमानों की और आवश्यकता रहेगी।

अब अगर 100 आज के आज ही खरीद ले तो वायु सेना का अगले 10 सालों के बजट एक ही साल में ख़त्म हो जाएगा। इसलिए भारत धीरे धीरे खरीदेगा।

अब इन 100 से 110 विमानों की कीमत 20 अरब डॉलर होगी। लगभग डेढ़ लाख करोड़ रूपये का सौदा होगा ये।

इतनी बड़ी रकम के लिए दुनिया की बड़ी कंपनियां दौड़ में हैं। जहां स्वीडन की SAAB अपने Gripen जहाज भारत को बेचना चाहती है, अमेरिका की Lockheed Martin अपने F-16 जहाज बेचना चाहती है।

‘Make in India’ के दिनोंदिन चलते प्रचार को लेकर साल 2017 में SAAB ने अपना दांव खेला कि वो सारे जहाज भारत में बनाने को तैयार है। अप्रैल 2018 में भारत ने RFI (request for information) जारी किया। शायद अगले 2-3 महीनों में इसके अगले कदम की ओर बढ़ेंगे।

अब Lockheed Martin ने अपने पत्ते खोले कि वो तो यहां ही फैक्टरी लगा देगा। भारत के 110 और इसके अलावा किसी और को भी चाहिए तो भी भारत की मैन्यूफैक्चरिंग फैसिलिटी से ही एक्सपोर्ट करेगा।

यहां 2 बातों पर गौर कीजियेगा –

  • SAAB हो या Lockheed Martin, या कोई और भी हो (कुछ कंपनियां और भी थी, पर वो क्लियर नहीं हो पाई) हर कोई भारत को बेचने के लिए भारत में ही बनाने को तैयार है। ऐसा पहले नहीं होता था। इससे पहले तो बोफ़ोर्स या ऑगस्टा जैसे सीधा पैसे नेताओं और अधिकारियों के खाते में पहुँचते थे। मीडिया को ‘सेट’ करने के लिए क्रिस्चियन मिशेल जैसे दलालों ने भर भर के भारतीय पत्रकारों को रिश्वत दी थी।
  • रक्षा जहाज कोई किराने की दुकान में रखा मैगी का पैकेट नहीं जो फट से उठा के दे दिया। वायुसेना की हर ऐसी खरीद कितनी ही प्रक्रियाओं से होकर गुजरती है। जिसमें आराम से 2 से 3 साल लग जाते हैं। फिर उसके बाद पहले विमान के बनने में 3 साल और जोड़िए। हर बड़ी खरीद कम से कम 5 साल में शुरू हो पाती है।

23 जनवरी को दरअसल खबर ये थी कि Lockheed-Martin भारत में अपना प्लांट लगाना चाहता है जहां से भारत के अलावा वो बाकी देशों को भी यहीं से एक्सपोर्ट करे।

ये लगभग हर मीडिया हाउस, अखबार की खबर थी। पर हमारे ‘राजस्थान के सबसे बड़े अखबार’ को मोदी सरकार की तारीफ़ बढ़ाने वाली ये बात हज़म नहीं हुई। तो इस खबर को तो किनारे में सरकाया गया, और एक नई खबर ‘मैनुफैक्चर’ की गई कि ‘राफेल विवाद से घबराई सरकार ने मिग के विकल्प पर फैसला टाला’!

चूंकि रक्षा सौदों की प्रक्रिया बहुत लंबी और कितने ही मानकों को देख कर होती है, तो वक़्त लेती है। पर इसी बात को ऐसे बताया गया जैसे कुछ नहीं हुआ है, और ‘राफेल राफेल’ चिल्लाने से सरकार घबरा गई है।

बाकी ‘सूत्र बताते हैं’ लिखने मात्र से खबर ब्रह्म-शब्द बन जाती हैं। ना खाता, ना बही, जो हम कहें वही सही। मैंने इस विषय पर अच्छा खासा google किया कि क्या इसी महीने में ऐसा कुछ हुआ कि सरकार ने ये फैसला टाला है, एक भी जगह से ऐसी कोई खबर नहीं आयी।

पर चूंकि इस अखबार को कांग्रेस से अपनी वफादारी एक ही दिन में कम से कम 10 बार साबित करनी होती है तो देश की रक्षा जैसे विषय पर भी ‘सूत्रों के हवाले’ से मनगढंत बात रची गयी।

‘मोदी, तुझसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं’ पिछले चार साल से एक दिन छोड़ कर एक दिन लिखने वाला ये अखबार अब जी जान से तुला है ये साबित करने के लिए, देखो, अपना असली बैर तो मोदी से है।

जिस राफेल केस को सुप्रीम कोर्ट से क्लीन चिट मिल चुकी है, उस पर एक मंदबुद्धि रोज़ झूठ पर झूठ बोले जा रहा है। 5 सवाल पूछता है, निर्मला सीतारमण तर्कों सहित उत्तर देती है, फिर 3 मिनट में वापस वो ही 5 सवाल पूछता है, और ये अखबार उसे ‘राहुल का पलटवार’ कहकर छाप देते हैं। जबकि ऑगस्टा में मिशेल के अलावा 2 और बिचौलिये पकड़े जा चुके हैं, इटली में इसी डील को लेकर लोगों को जेल हो चुकी है कि उन्होंने भारत के तत्कालीन शासन को रिश्वत दी थी, उस पर इन बिके हुए कागज़ के टुकड़ों की खामोशी देखने लायक होती है।

ऐसे ही जस्टिस लोया के केस में सुप्रीम कोर्ट क्लीन चिट दे चुका है तो जजों पर ही सवाल उठा दिए गए। इसी सवाल उठाने की औकात को ‘सुनंदा पुष्कर’ मामले में लकवा क्यों मार जाता है?

नंगई ओढ़िये। पर उसके बाद भी नंगे ही रहेंगे। और वो दिन गए जब लोग अखबारों की विश्वसनीयता की कसमें खाते थे। इस सोशल मीडिया के दौर में लोग नंगई उजागर भी करेंगे, और खुल कर कहेंगे भी, कि आप नंगे हैं। और आपका नंगई का ये अलंकार आपके ‘निष्पक्ष’ कहलाने वाले शरीर को शोभा नहीं देता।

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