गोडसे के आगे गांधी ने घुटने टेके? हार गया गांधीवाद, जीत गया गोडसेवाद?

गांधी यानी वो नाम जिसे सुनते ही आपके मन में अगला शब्द जो आएगा वो है अहिंसा, लेकिन गांधी की अहिंसा क्या आज़ादी के मतवालों के लिए प्रतिकूल हिंसा नहीं थी?

अगर ध्यान से देखें तो आप पाएंगे कि गांधी ने क्रांतिकारियों और आज़ादी के मतवालों पर अत्याचार और नरसंहार करने का खुला लाइसेंस अंग्रेज़ों को दे रखा था अहिंसा के नाम पर, बहरहाल… इसपर चर्चा कभी और होगी।

आज बात करेंगे गांधीवाद की, यानी उनके दिखाए रास्ते की, उनके संस्कारो की। गांधीवाद यानी अहिंसा, कोई एक गाल पर चांटा मारे तो दूसरा गाल आगे कर दो। यही है गांधीवाद।

पढ़ने और लिखने में तो यह बहुत अच्छा लगता है, भाषण देने के लिए उत्तम, लेकिन इसका पालन तो आज तक खुद उनके अनुयायी नहीं कर पाए, उनके परिवार के लोग उनके तथाकथित legal heirs भी नहीं कर पाए, जो गांधी और गांधीवाद पर अतिक्रमण कर के बैठे हैं वे भी नही कर पाए, फिर ये कैसी विचारधारा? जिसे दूसरे पर तो सब मढ़ना चाहते हैं पर अपनाना कोई नहीं चाहता?

गांधी वध के उपरांत नाथूराम गोडसे ने तत्काल वहीं आत्मसमर्पण कर दिया, वे वहाँ से भागे नहीं जबकि वे चाहते तो भाग सकते थे, क्योंकि वे अपनी विचारधारा के प्रति दृढ़निश्चयी थे।

उन्होंने अपनी विचारधारा किसी दूसरे पर नहीं मढ़ी, किसी दूसरे को पाठ नहीं पढ़ाया बल्कि खुद उस पर चल कर बताया, चाहे इसके लिए उन्हें इसकी कीमत अपने प्राण दे कर ही क्यों न चुकानी पड़ी हो, यानी जान जाती है जाए पर अपने उसूलों, अपनी विचारधारा से समझौता नहीं किया जाएगा, बेशक इसके लिए फांसी ही क्यो न लग जाये।

इस बात का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि नाथूराम गोडसे ने कोर्ट में भी सीना चौड़ा कर के अपने किये को कुबूला था और पूरी ताकत के साथ अपनी बात रखी थी, कहते हैं कोर्ट के जज ने कहा था कि अगर फैसला कोर्ट में मौजूद लोगों के हाथ में वोटिंग के जरिये दिया होता तो सर्वसम्मति से नाथूराम गोडसे को बरी कर दिया जाता। यानी नाथूराम गोडसे की विचारधारा इतनी प्रबल थी कि कोर्ट में मौजूद कांग्रेसी भी उस विचारधारा से सहमत थे और उनको बरी कर देते।

वहीं दूसरी तरफ गांधी की अहिंसा वाली विचारधारा थी, जिसने गांधी वध के अगले ही दिन यानी 31 तारीख को गांधी के साथ ही दम तोड़ दिया। गांधीवाद का अंत शायद गांधी की मृत्यु के साथ ही हो गया था, तभी तो ‘अहिंसा के पुजारी’ की मौत के बाद उनके अनुयायी तथाकथित गांधीवादी, अहिंसा की विचारधारा को त्याग कर हिंसा पर उतारू हो गए थे, और देश को गांधी वध के उपरांत दंगों में झोंक दिया था।

नाथूराम गोडसे जाति से ब्राह्मण थे इसलिए ब्राह्मणों के घरों को बाकायदा चिह्नित कर के आग के हवाले कर दिया गया। ब्राह्मण, उनके दुधमुँहे बच्चे, बहु बेटियां सब ज़िन्दा जल कर वीरगति को प्राप्त हो गए।

घर से निकाल निकाल कर ब्राह्मणों को ज़िन्दा जलाया गया था, तो क्या अहिंसा की विचारधारा सिर्फ एक छलावा थी? अगर गांधीवादी वाकई सच्चे थे, अगर वे अहिंसा के पुजारी थे तो उन्हें गांधी के आदर्शों पर चलते हुए अपना सीना भी शांतिपूर्ण तरीके से आगे करना चाहिए था, लेकिन इसके विपरीत उन्होंने जम कर नरसंहार किया, ब्राह्मणों को ज़िंदा आग के हवाले कर दिया, तड़प तड़प कर दुधमुँहे बच्चों ने दम तोड़ दिया था।

जिन ब्राह्मणों से कांग्रेस और गांधीवादियों को इतनी नफरत थी कि उन्हें परिवार सहित ज़िंदा जला दिया गया था, आज उसी कांग्रेस के अध्यक्ष और गांधी के तथाकथित Legal Heirs अपने आपको ब्राह्मण बताते फिर रहे हैं!

आखिर ब्राह्मण बनने की ये होड़ क्यों? क्या उन्हें अपनी विचारधारा पर भरोसा नहीं रहा? ये ब्राह्मणों की जीत है, ये ब्राह्मणवाद की जीत है, ये नाथूराम गोडसे की जीत है ये गोडसेवाद की जीत है, तो क्या ये माना जाए कि गांधीवाद ने आज गोड़सेवाद के आगे घुटने टेक दिए? क्या आज गांधीवाद गोड़सेवाद से हार गया? क्या आज गांधी की विचारधारा गोडसे की विचारधारा से हार गई? तो क्या मान लिया जाए कि आज गांधी गोडसे से हार गए?

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