आपको कुछ याद नहीं रहता, क्योंकि आप सच नहीं बोल रहे होते

झूठ की दो सबसे बड़ी दिक्कतें हैं – एक – उसे याद रखना पड़ता है, दूसरा – वो देर सवेर सामने आ ही जाता है।

आप अपने रोबोट रामू काका को लेकर दौरे पर आये फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रॉन से ‘शिष्टाचार’ भेंट करते हैं, तब कहते है कि राफेल के बारे में कोई बात नहीं हुई, फिर आप संसद में झूठ बोल देते हैं कि मैक्रॉन ने आपको डील के बारे में बताया था।

फ्रांस की सरकार को हाथोंहाथ आपके नंगे झूठ को उघाड़ने के लिए स्टेटमेंट देना पड़ता है कि ऐसी कोई बात नहीं हुई, पर आप ‘शिष्टाचार’ को सड़क पर फेंक अपने नंगे झूठ पर डटे रहते हैं।

दुनिया को 20 से ज्यादा दिन लगते हैं, आप ढाई दिन में कैलाश मानसरोवर कर आते हैं। लगभग 13 घंटे में कठिन दुर्गम 34 किलोमीटर नाप लेते हैं, आप वो फ़ोटो डालते है, जो लोग बता देते हैं कि इंटरनेट पर सालों से है।

आप सितंबर की अपनी यात्रा में कहते है कि आप किसी चीनी अधिकारी से नहीं मिले, जनवरी में आप कहते है कि चीनी अधिकारी आपको यह बताने कैलाश आये थे कि वहां नौकरियों की कोई दिक्कत नहीं।

आप एक से बढ़कर एक करारे ट्वीट लिख डालते हैं, जबकि नेपाल दूतावास में आपको शोक संदेश मोबाइल से कॉपी करना पड़ता है। थोड़ा बहुत इशारा हो जाता है कि आपके लिए आपके नाम से ट्विटर पर लिखने वाला इंसान आपसे कहीं ज्यादा दिमाग वाला है।

आप अस्पताल में अपनी आखिरी साँसें गिनते पूर्व प्रधानमंत्री से मिलने जाते हैं, और बाहर आकर आपका बयान होता है कि बुजुर्गों का सम्मान हम जानते हैं, हम सबसे पहले मिलने आये। ऊपर आसमान में कहीं डॉ राजेन्द्र प्रसाद, नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी आप पर हंस रहे होते हैं।

आप कैंसर से पीड़ित एक व्यक्ति के पास जाते हैं, ‘सद्भावना भेंट’ का बहाना लेकर। फिर आप भरी सभा में राफेल को लेकर उसी कैंसर पीड़ित को घसीट लाते हैं।

एक दिन आप कहते हैं कि पर्रिकर के बेडरूम में राफेल डील की सब फ़ाइलें पड़ी हैं, अगले दिन कहते हैं कि पर्रिकर को कुछ नहीं पता।

नारी सशक्तिकरण की बातें करते आप संसद में पहली महिला रक्षा मंत्री को ‘AIADMK’ के सांसदों के पीछे छुपी बोलते हैं, अगले ही दिन उसी महिला द्वारा तर्कों से नंगा किये जाने पर कहते हैं कि सब प्रधानमंत्री का किया-धरा, निर्मला सीतारमण को कुछ पता नहीं।

बात दरअसल ये है कि आपको कुछ भी पता नहीं। एक परिवार के नाम को ढोते, या तो आप अव्वल मूर्ख है, या महाधूर्त। आप ‘सद्भावना भेंट’ भले ही करें, आपके मन में सद्भावना कहीं नहीं होती। होती है तो क्षुद्रता, गिद्धता। किसी की मृत्यु को, किसी की बीमारी को अपने नुकीले पंजों से नोंचने की हवस। उन्हीं पंजों से, जिससे आप और आपका परिवार इस देश को दशकों से नोंचता, बींधता आ रहा है।

और उसपर दिक्कत ये भी है कि आप ऐसे ही महाधूर्तों की चापलूसी से घिरे हुए हैं। आपको बचपन में जादू दिखाने वाले, आपके पिता के इशारों पर सिखों के गले में टायर डालने वालों को आप सियासत सौंप देते हैं। आपके तर्कहीन और मूर्खतापूर्ण सवालों को आपके परिवार की पालतू मीडिया ‘पलटवार’ कह कर अखबारों में छापती है।

आपको कुछ याद नहीं रहता, क्योंकि आप सच नहीं बोल रहे होते हैं। पर सच की उससे बड़ी दिक्कत ये है कि वो छुपाये नहीं छुपता। देश की जनता ना ही आपकी तरह धूर्त है, ना ही आपकी तरह मूर्ख।

बाकी, अगर कोई ईश्वर है, तो आपका न्याय ज़रूर करेगा।

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