भारत पर जनसांख्यिकीय हमला : सवाल अस्तित्व और अस्मिता का

स्टीफन पी कोहेन की बेहद प्रसिद्ध किताब ‘द आइडिया ऑफ पाकिस्तान’ है।

लगभग पूरी किताब में एक अंडरस्टेटेड तरीके से एक ही बात है कि पाकिस्तान के संसाधन बेहद सीमित हैं और आबादी बेहिसाब बढ़ रही है।

साथ ही शिक्षा प्रणाली ऐसी है जो लोगों को रोजगार मुहैया कराने वाली नहीं है। डाक्टर, इंजीनियर, लेक्चरर कुछ भी बनना हो, सबसे पहले इस्लाम के इम्तिहान में पास होना अनिवार्य है।

लेकिन पाकिस्तान के पास इस बढ़ती आबादी को रोकने का कोई ब्लूप्रिंट तो दूर इस पर बात करने की भी हिम्मत नहीं है। क्योंकि हम जिसे आबादी कहते हैं, मस्जिद, मुल्ला और जेहादी गठजोड़ के लिए वे इस्लाम के सिपाही हैं।

सैम्यूअल हंटिंगटन भी ‘द क्लैश ऑफ सिविलाइज़ेशंस’ में लगभग यही बात पूरे किताब में दोहराते हैं। इस्लामी आबादी दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ रही है, तेल हमेशा नहीं रहने वाला, फिर क्या होगा?

इन्हें युद्ध में झोंका जाएगा। या ये खुद युद्ध में उतरेंगे क्योंकि उनके सामने समृद्ध इलाकों में पसरने के अलावा कोई रास्ता नहीं होगा। लेकिन कई मिलियन अरब महीनों पैदल चलकर यूरोप में शरणार्थी के रूप में दाखिल हो सकते हैं, ये बात उस समय सोचना शायद संभव नहीं था। यह हमने अभी देखा 2015 में।

अब आप सोच सकते हैं कि ड्रोन और मिसाइल युग में भला आदमियों की क्या ज़रूरत है या ये क्या कर लेंगे मैदान में? तो सीधी बात है कि आपके पास बहुत अच्छे साजोसामान से लैस दो लाख की सेना है लेकिन सामने अगर 20 लाख की फौज रायफल और एके-47 के साथ ही है तो मुकाबला बराबर का ही समझें।

द्वितीय विश्वयुद्ध के आखिरी दिनों में चीनी फौज कहीं से भी अत्याधुनिक हथियारों से लैस अमेरिकी फौज के आगे नहीं टिकती थी। लेकिन कोरियाई युद्ध में उन्होंने अमेरिका का रास्ता रोक दिया, भले से दस लाख से ज्यादा चीनी सैनिक मारे गए।

जब चीन के पास उन्नत हथियार नहीं थे तो उनकी रणनीति बहुत सरल थी- ह्यूमन वेव । इसमें हज़ारों हज़ार सैनिक एक साथ तेजी से धावा बोलते हैं और कितने भी मारे जाएं लेकिन यह काफिला खत्म नहीं होता। और आखिर में मज़बूत सेना भी पस्त हो जाती है। यानी तुम्हारी गोलियां खत्म हो जाएंगी पर हमारे आदमी नहीं।

आबादी हमेशा से सबसे बड़ा हथियार रहा है युद्ध में। युद्ध के जनसांख्यिकीय पहलुओं के अध्येताओं के एक स्कूल का मानना है कि एक देश की आबादी घट रही हो और सामने किसी शत्रु देश की आबादी बढ़ रही तो वह देश तुरंत युद्ध के मैदान में उतरता है क्योंकि वह जानता है कि अगर वह आज नहीं लड़ा तो सौ साल बाद बिना लड़े ही हार जाएगा।

बहुत से लोगों का यह मानना है कि प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व फ्रांस लड़ाई टाल सकता था। लेकिन वह जानता था कि उसकी आबादी घट रही है और उसी अनुपात में उसका औद्योगिक उत्पादन भी। दूसरी तरफ जर्मनी की आबादी और उद्योग दोनों तेज़ रफ्तार से बढ़ रहे थे। जिस अल्सेस लोरेन के खनिज संसाधनों के लिए दोनों देशों ने इतनी लड़ाई ली थी, वह जर्मनी कुछ दशक बाद बिना लड़े ही छीन लेता।

इस समूह का यह भी मानना है कि सोवियत संघ अमेरिका के साथ हथियारों की होड़ के कारण अर्थव्यवस्था चरमराने की वजह से नहीं टूटा। इसलिए टूटा कि सोवियत संघ में मुस्लिम आबादी रूसियों की आबादी से ज्यादा हो गई थी। साथ ही अमेरिका ने दशकों से पाकिस्तान और सऊदी अरब की मदद से वहां करोड़ों की संख्या में कुरान और वहाबी साहित्य पहुंचाया, उसका असर भी अपना रंग दिखाने लगा था।

मने सोवियत संघ में इस्लाम जाग उठा था और मार्क्स को भागना ही था। यानी सोवियत तोप-टैंक और केजीबी और एनकेवीडी की मशीनरी भी कुछ कर नहीं पाई।

फिर भारत में क्या होगा?

लोकतांत्रिक देशों में जहां वोट गिने जाते हैं वहां हेडकाउंट यानी मतदाता की संख्या ही निर्णायक है। इसमें किसी समुदाय की आबादी 30 प्रतिशत ही लेकिन यदि वह मोटिवेटेड और ध्येय की प्राप्ति के लिए प्रतिबद्ध है तो वह बड़ी चालाकी से टैक्टिकल वोटिंग कर सत्ता पर कब्जा कर सकता है।

हो सकता है कि यह 30 प्रतिशत वाला समूह सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से बाकी के 70 प्रतिशत से बिलकुल अलग हो और उसका अपना एजेंडा बाकी के 70 प्रतिशत के बिलकुल विपरीत हो, लेकिन क्या फर्क पड़ता है। जिसकी सरकार, उसकी सरदारी। पराजित लोगों का भाग्य और इतिहास विजेता लिखते हैं।

नेता कहीं के भी हों, उन्हें वोट दिखते हैं, राष्ट्रहित नहीं। अमेरिका में डेमोक्रेटों को मेक्सिकन और लैटिन अप्रवासियों में वोट दिखते हैं तो अपने देश की सेक्यूलर पार्टियों को बांग्लादेशी घुसपैठियों में। असम और बंगाल में अब ये निर्णायक भूमिका में हैं।

असम के बदरूद्दीन अजमल, जिनकी भारतीय नागरिकता ही संदिग्ध है, वहां का मुख्यमंत्री बनने के सपने देख रहे हैं। असम में बांग्लादेशियों की थोक में घुसपैठ को सुप्रीम कोर्ट भी डेमोग्राफिक इन्वेज़न (जनसांख्यिकीय हमला) करार दे चुका है।

निस्संदेह यह डेमोग्राफिक इन्वेज़न ही है। लेकिन काँग्रेस नेता तरुण गोगोई के लिए ये वोट थे। और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को लेकर बदरूद्दीन अजमल खुलेआम विधानसभा में गोगोई को धमकाते थे- कह के तो दिखाओ कि असम में कोई बांग्लादेशी घुसपैठिया है, सरकार गिरा देंगे। उधर ममता जी की खुली चुनौती है… हिम्मत है तो बंगाल में एनआरसी लाकर दिखाओ, ईंट से ईंट बजा देंगे तृणमूली।

हमले के दूसरे तरीके भी अपनाए जा रहे हैं और वह है डेमोग्राफिक इंप्लोज़न। यानी तेज़ी से आबादी बढ़ाना। हर दशक जनसंख्या आंकड़ों में हम यह देखते हैं कि बाकी सभी की आबादी मामूली रफ्तार से बढ़ रही है जबकि एक खास समुदाय की आबादी सुरसा के मुंह की तरह।

इसके लिए हमें एक बेहद सख्त जनसंख्या नियंत्रण कानून की आवश्यकता है। यद्यपि हम जानते हैं कि भारत में किसी भी दल की हिम्मत नहीं है जो दबे सुर में भी इसकी मांग उठा दे। फिर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से यह उम्मीद की जा सकती है। इसलिए कि आप असम में एनआरसी लाए, तीन तलाक पर अध्यादेश लाए। तो उम्मीद की जा सकती है कि जनसंख्या नियंत्रण कानून भी किसी दिन बनेगा।

हम अगर नरेंद्र मोदी को एक बार फिर समर्थन दें और पूर्ण बहुमत से भगवा सरकार बनाएं तो संभवत: अगली बार इस दिशा में कोई कदम उठाया जा सके। इसलिए मेरा वोट और सपोर्ट नरेंद्र मोदी को है। आपका भी होना चाहिए क्योंकि किसी और से तो उम्मीद भी नहीं की जा सकती भारत को इस डेमोग्राफिक इन्वेज़न (जनसांख्यिकीय हमला) से बचाने की। आबादी देश में भी बढ़ रही है और पड़ोस में भी। सवाल अस्तित्व और अस्मिता का है। तो मित्रों अगली बार-फिर मोदी सरकार।

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY