मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी : जनवरी माह चौथा अंक

नाम – फूलों सी महक सी एक औरत
बाप का नाम – इंसान का एक सपना
जन्म शहर – धरती की बड़ी जरखेज़ मिट्टी
कद – उसका माथा तारों से छूता है
बालों का रंग – धरती के रंग जैसा
आँखों का रंग _ आसमान के रंग जैसा
पहचान का निशान – उसके होंठो पर ज़िन्दगी की प्यास है… और उसके रोम रोम पर सपनों का बौर पड़ा है…

अब इस बार बच्चों की शिकायत आई है कि मम्मा आप कैमरा चालू होते से ही खुद भी चालू हो जाती है, ज़रा नमस्ते वस्मस्ते, गुड मोर्निंग करना चाहिए पहले…

मैंने सोचा बात तो सही है, और वैसे भी इस बात पर मैं आँख बंद करके विश्वास करती हूँ कि कोई भी चीज़ कहीं से भी सीखने को मिले तुरंत ग्रहण कर लेना चाहिए… मैं बहुत अच्छी शिष्या हूँ, और बच्चों से बड़े गुरु आखिर कौन हो सकते हैं… उनके जैसा निश्छल होना इस उम्र में तो मुमकिन नहीं है… लेकिन असंभव तो कुछ भी नहीं ना …

और दूसरी बात पिछले वीडियो में मेरे मेक अप को लेकर दो टीम बन चुकी हैं, कुछ लोग कह रहे हैं कैमरे के सामने आना है तो मेक अप ज़रूरी है और कुछ लोग कह रहे हैं आपको मेक अप की क्या ज़रूरत… और सच कहूं मेक अप के नाम पर मैंने सिर्फ आँखों में काजल लगाया था और कुछ नहीं… इसलिए तो कहती हूँ आँखें आपके व्यक्तित्व का आइना होती है…

और तीसरी बात मेरा चेहरा ऐसा है कि मैं ज़रा सा भी कुछ अतिरिक्त प्रयास करूं तो एकदम से उभर कर आता है… यही बात मेरी बातों पर भी लागू होती है..

एक राज़ की बात बताऊँ किसी से कहियेगा नहीं, वास्तव में मैंने कुछ पढ़ा नहीं है, मतलब ज्यादा ज्ञान व्यान है नहीं मुझको, लेकिन बस वही ज़रा सा अतिरिक्त प्रयास इतना उभर कर आता है कि लोगों को मेरे बारे में ज़रा गलत फहमी हो जाती है…

तो पहले ही बता दूं ये जो मैं आध्यात्मिक लफ्फाजियां करती हूँ ना, वह मैंने कहीं पढ़ा नहीं है बस कुछ व्यक्तिगत अनुभव है जिस पर मैं थोडा सा मेक अप चढ़ाकर प्रस्तुत कर देती हूँ…

इसलिए मेरे मेक अप पर ध्यान मत दीजिये… ‘हाय कित्ती सुन्दर लगती है, हाय कित्ती गहरी बातें करती है… ‘ ना जी आप तो इस साधारण से चेहरे के साथ जो जीवन में रोज़ मर्रा काम आने वाली साधारण सी बातें हैं उस पर ध्यान दीजिये… पता नहीं कब कौन सी बात आपके दिमाग के किसी तार को झंकार बीट्स दे दे और और आपके पैर उस बीट्स पर नाच उठे और लगे… अरे हाँ… यही तो कहना चाह रहा था मैं भी….

जी… मैं वही बात कह रही हूँ जो आप जानते हैं, इसमें कुछ अलग नहीं है… कुछ अलग है तो आपका अंदाज़… सिर्फ बात करने का ही नहीं, जीने का भी… यदि आप किसी के सामने भी प्रस्तुत हो रहे हैं… या रोज़ भी यदि लोग आपसे मिल रहे हैं तो आपके जीने का जो अंदाज़ है वही आपके व्यक्तित्व और चरित्र का निर्माण करता है. तो जीवन ऐसा होना चाहिए कि लोगों लगे कि यार जीना इसी का नाम है… फिर चाहे आपके पास बंगला न हो गाड़ी न हो, बैंक बैलेंस न हो लेकिन जब आपसे कोई पूछे कि तुम्हारे पास क्या है… तो आप कह सको मेरे पास माँ है…

एक्चुअली मैं बचपन से बहुत फ़िल्मी रही हूँ, और फिल्मों का बहुत गहरा प्रभाव रहा है मुझ पर… ये जो स्टाइल देख रहे है ना आप यह सब बचपन में बॉलीवुड एक्टर्स की छुप छुपकर नक़ल करने से ही आया है…

तो मुद्दा यह कि जब से मोदीजी ने बॉलीवुड वालों की क्लास ली है…

I mean.. फिल्म इंडस्ट्री वालों के सामने भाषण दिया है तब से मेरा भी फ़िल्मी कीड़ा ज़रा ज्यादा ही मचलने लगा है. आपको बता दूं बचपन से ही मुझे फ़िल्मी कलाकारों के बहुत सपने आते हैं… और रेखा से तो मुझे लगता ज़रूर पिछले किसी जन्म का रिश्ता है… साल भर में दस पन्द्रह बार तो वे ज़रूर सपने में आती हैं… और मैं हूँ भी उनकी बहुत बड़ी मुरीद… और सोच कर रखा है… या इसे मेरी ज़िद कह लो कि पहली किताब तो मैं रेखा पर ही लिखूँगी भाई…

तो आज मैं आपके सामने रेखा पर लिखे एक लेख को पढना चाहूंगी… पूरा याद नहीं इसलिए मैं पढ़कर सुनाती हूँ… फिर बताइयेगा किताब लिखने जितना सामर्थ्य है मुझमें या नहीं…

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY