जॉर्ज का जाना

जॉर्ज का जाना कि जैसे हमारे समय की झाड़ियों में खिले फूल का झड़ जाना।

मैं जॉर्ज से नहीं मिला। एक बार लंका पर भाषण देते हुए देखा था। पर जॉर्ज से मेरी अंतरंगता है। जॉर्ज मेरे पुराने दोस्त हैं – उम्र के लम्बे फ़ासले के बावजूद। उम्र फ़ालतू चीज़ है, उम्र से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

जॉर्ज समाजवादी थे, लोहिया के चेले। मैं तो बचपन से संघ से जुड़ा रहा हूँ। हमारी विचारधाराएँ जुदा रहीं, शायद अब भी हैं। पर विचारधारा की कीमत क्या है आदमी के आगे? जो आदमी न हुआ उसकी विचारधारा कौन सी?

तो इसमें किसी को अचरज क्यों हो कि मेरे जैसा संघी जॉर्ज जैसे शख्स का बचपन से मुरीद रहा। झाड़ी में जो पीला फूल खिला है उसकी विचारधारा क्या है? उसकी विचारधारा है – खरा होना, खाँटी होना, सच्चा होना। और इस विचारधारा के आगे दूसरी सारी विचारधाराएँ पानी भरती हैं।

जॉर्ज के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। आज बहुत कुछ लिखा जाएगा, श्रद्धांजलियां प्रकट की जाएँगी, आत्मा की शांति के लिए प्रार्थनाएं की जाएँगी। पर मुझे लगता है जॉर्ज के जीवन की सुगंध पकड़ में न आएगी। सुगंध चीज़ ही ऐसी है, सूंघने की चीज़ है पकड़ने की नहीं।

जॉर्ज का मूल भाव है – खरापन, खुरदुरापन, खांटीपन। आज के इस चमचमाते ज़माने में जब हर चीज़ और हर शख्स पॉलिश कर कर चमकता हुआ दिखता है, इस खुरदुरेपन की क्या कीमत है यह मैं कैसे किस भाषा में बता पाऊंगा?

आपातकाल में मेरे जैसों की जॉर्ज से दोस्ती परवान चढ़ी। और ऐसी चढ़ी कि अबतक न उतरी। जॉर्ज हमारे हीरो रहे। रोमांटिक अच्छा शब्द नहीं है, सस्ता है, पर शायद रोमांटिक हीरो।

जब इंदिरा अप्रियदर्शिनी ने 1977 में चुनाव घोषित किए तो जॉर्ज ने उस समय के विपक्ष के संयोजक मोरारजी को चिट्ठी लिखी कि चुनाव एक धोखा है, तानाशाही पर लोकतंत्र का मुलम्मा चढ़ाने की साज़िश है, हमें इस धोखे में हिस्सा नहीं लेना चाहिए।

जॉर्ज ने हम सब क़ैदियों की, खास तौर पर युवा क़ैदियों की भावनाओं को आवाज़ दी। हमने अपने बैरक से सर्वसम्मत प्रस्ताव पास कर जॉर्ज की बात का समर्थन किया। यह बात दीगर है कि जॉर्ज का आकलन सही होते हुए भी समय के तूफान में इंदिरा को बहा ले गया।

जॉर्ज की क्या कीमत थी – इस बात का अनुमान इस बात से लगाइए कि दूसरे बड़े नेताओं की तरह इंदिरा ने चुनाव के पहले उन्हें रिहा नहीं किया। जॉर्ज चुनाव समाप्त होने तक कारावास में रहे, मेरे जैसे मामूली लोगों के संग रिहा हुए।

जब मोरारजी की सरकार पर राजनारायण, चरण सिंह जैसे लोगों की क्षुद्रता के कारण संकट के बादल घिरे तो जिस बहादुरी से संसद में जॉर्ज ने सरकार का बचाव किया – उसे कौन भूल सकता है? पर जॉर्ज आदमी थे, दोस्ती को बहुत महत्व देते थे। मधु लिमये की दोस्ती का बंधन न तोड़ पाए, सरकार गिर गई।

कारागार में साथ बिताए समय ने विचारधारा जैसी सतही बातों के पूर्वाग्रह को काट कर लोगों के दिलों को जोड़ने में मदद की – यही था जॉर्ज जैसे समाजवादी और ऊपर ऊपर से क्रिस्तान शख्स की अडवाणी-अटल से आजीवन दोस्ती का राज। वफ़ादारी, विश्वास, आदर और लगाव के धागों से बंधी दोस्ती जो अंत तक चली।

हम राजनीति के लसलसाव में इस क़दर फँसे हैं कि हमें कभी कभी आदमी नहीं दिखता। पर अटल और जॉर्ज जैसे लोग मामूली लोग नहीं थे – उनका फैलाव राजनीति के बाहर भी था, वे बँधे नहीं थे। अटल, जो तीन चार मंत्रियों पर पूरी तरह भरोसा करते थे, उनमें जॉर्ज भी एक थे। यह भरोसा विचारधारा से नहीं, दोस्ती और आत्मीयता से पैदा हुआ था।

जॉर्ज सादा शख्स थे। यह बात मैं बार-बार कहता हूँ क्योंकि यह बात अब इतनी दुर्लभ है। जॉर्ज की ज़िंदगी पर नज़र डालिए – आपको इस बात के सबूत हर जगह मिलेंगे। उन्होंने ईमानदारी का ढोल नहीं पीटा। फ़क़ीर ईमानदारी का ढोल नहीं पीटते।

यह कोई मामूली बात है कि कर्नाटक का रहने वाला, जन्म से ईसाई बम्बई और सुदूर बिहार में इतना लोकप्रिय था? कितने ईसाई हैं बिहार में? यह इस बात का सबूत है कि जब कोई बड़ा आदमी खड़ा होता है जातपांत, क्षेत्र, भाषा, मज़हब की इतनी मज़बूत दिखती दीवारें किस तरह भरभराने लगती हैं।

जॉर्ज उस ज़मीन का आदमी था जिसे लोग हिन्दुस्तान कहते हैं। जॉर्ज से हमारा रिश्ता खून का रिश्ता था। खून जो ज़मीन से बनता है।

अधूरा लेख…

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