रक्तदाता प्रतिदिन रक्त नहीं दे सकता, शरीर का सारा रक्त नहीं दे सकता

एक बात आप हमेशा देखेंगे… वामपंथी कार्यकर्ता अच्छी जगहों पर, उच्च पदों पर बैठे होते हैं। सम्पन्न होते हैं, और उनकी यह संपन्नता उन्हें अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता के पुरस्कार स्वरूप मिली होती है।

वहीं एक संघ का कार्यकर्ता अपनी जेब से खर्च करके, अपना समय और श्रम लगाकर राष्ट्रहित में काम करता है। अक्सर जान भी दे देता है… पर बदले में व्यवस्था से कुछ भी नहीं पाता, कुछ अपेक्षा भी नहीं रखता। कुछ अपेक्षा रखना तुच्छ माना जाता है।

यह भावना प्रशंसनीय है, यह समर्पण श्लाघ्य है। पर परिणाम के स्तर पर यह हमारी बाधा बन जाता है।

एक वामपंथी के व्यक्तिगत हित और उसकी राजनीतिक और वैचारिक विचारधारा एक दूसरे से एलाइनमेंट में होते हैं। जिसमें व्यक्ति की प्रगति होती है, उसी में विचारधारा का भी हित होता है। ऐसे में व्यक्ति अधिक समर्पण और उत्साह से काम करता है, ज्यादा सकारात्मक परिणाम मिलते हैं।

एक वामपंथी अगर एक NGO चलाता है तो इसमें वह खुद भी पैसे बनाता है, और उसका देशद्रोही एजेंडा भी मजे में चलता है। एक वामपंथी अगर पत्रकार बनता है, तो उसे अखबार और टीवी चैनल वाले सिर्फ आजीविका ही नहीं देते, प्रसिद्धि और समृद्धि भी देते हैं। अगर एक वामपंथी कुछ लिखता है तो दूसरा वामपंथी उसे छापता है, तीसरा उसे प्रमोट करता है और चौथा उसे बेचता है। लिखने वाले को लिखने के अलावा और किसी बात की चिंता नहीं करनी होती।

और इसके विपरीत अगर एक राष्ट्रवादी इनमें से कोई भी काम उठाता है तो यह उसकी आजीविका के काम के अतिरिक्त होता है। उसकी आजीविका इससे नहीं चलती। वह अपना समय और संसाधन लगाता है। उससे अपेक्षा होती है कि वह कोई त्याग और बलिदान करता रहे। और अक्सर उसे इसमें दूसरे राष्ट्रवादी का सहयोग तो नहीं ही मिलता है, बल्कि ईर्ष्या ही मिलती है।

यह हिसाब लगाने वाले मिल जाते हैं कि अपने इस उद्यम से उसने कुछ लाभ तो नहीं कमा लिया? अपनी किताब बेच कर उसने पैसे तो नहीं कमा लिए? समाजसेवा के उसके प्रकल्प में उसे कहीं कोई व्यक्तिगत लाभ तो नहीं हो रहा? अगर वह एक विद्यालय चला रहा है तो उससे पैसे तो नहीं बना रहा? अगर वह राजनीति में उतरा है तो कहीं वह ऊपर तो नहीं जा रहा? उसकी महत्वाकांक्षा को उसका ईंधन नहीं, स्खलन और भ्रष्टाचार ही समझा जाता है।

त्याग और बलिदान बेहद श्लाघ्य भावनाएँ हैं, पर उनकी सीमा है। आप अगर राष्ट्रसेवा में रत हैं तो भी आप तभी ज्यादा प्रभावी होंगे जब आपकी महत्वाकांक्षाएं और विचारधारा के हित एक एलाइनमेंट में हों। आदमी रक्तदान करता है तो अपने शरीर का सारा रक्त नहीं दे सकता। रोज़ रोज़ रक्त नहीं दे सकता। इसलिए जो अपना रक्त सनातन के लिए देते हैं, उनका पोषण भी यहीं से मिलना चाहिए… ताकि मज्जा में रक्त बनता रहे।

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