खुशी खुशी कर दो विदा कि रानी बेटी कसाइयों के हाथ ना पड़े

पता नहीं छह माह पूर्व कहां से मोहल्ले में आ गई थी एक छोटी सी गाय की बछिया उम्र यही कोई सात आठ माह। अभी सींग के खुड्डे ही सर पर जमें थे पर थी बहुत सुंदर व चपल चंचल।सुबह जब भी गेट खोलो अमूमन मेरे घर के बाहर ही खड़ी मिलती थी और आंखों में झांकती सी पूछती सी थी दादा कुछ है खाने को मैं बहुत भूखी हूं।

ऐसे में मैं घर के अंदर जाकर रोटियां व कच्चे आलू ला उस के आगे डाल देता था। वह बेचारी मुश्किल से एक रोटी या आलू ही खा पाती तब तक अन्य बेसहारा गाय आ कर उसका हिस्सा चट कर जातीं। और वह छुटकी मायूस सी मेरी ओर देखती रह जाती।

सभी बेसहारा गायों को खिलाने की ना हिम्मत थी मेरे पास और ना ही खिला सकता था। इसलिए अगले दिन से उसको घर के अंदर बुला लिया। अब वह आराम से बिना किसी बाधा के उसके लिए उपलब्ध किए चारे को खा सकती थी।

अब तो यह नियम सा बन गया रोज का। सुबह जैसे ही गेट खोला वह बाहर ही इंतजार करती मिलती थी। गेट खुलते ही अधिकार पूर्वक अंदर आ एक टब जो उसके लिए ही रखा था उसमें रखी खाद्य सामग्री को पेट भर खाया और जब पेट भर गया तो गेट खटखटा कर बता दिया कि जा रही हूं गेट खोल दो। और मैं गेट खोल उसको रास्ता दे देता था साथ ही पीठ गर्दन पर हाथ फिरा उसको आमंत्रण भी दे देता था कि कल जरूर आना और वह भी हाथ पर जीभ फिरा आभार व्यक्त करती थी। इस दौरान गोबर उठाना और यदि मूत्र विसर्जित किया है तो उसको साफ़ कर देना आदि क्रियाएं भली भांति सीख चुका था।

आज क्लीनिक जाने से पहले अचानक बाहर शोर मचा और जानवरों के भागने की आवाजें सुन तुरंत माजरा जानने बाहर निकला। सात आठ लोग घेर कर निराश्रित गोवंशो को लोडर में पकड़ कर बैठा रहे थे। हमारी वाली बछिया के पीछे भी तीन लोग पकड़ने को भाग रहे थे। वह उनसे बचती कभी इस ओर कभी उस ओर दौड़ते हुए दसियों बार घर के सामने से गुजरी। मैंने दोनों गेट खोल दिए थे ताकि वह बचने के लिए अंदर आ जाए पर इस आपाधापी में वह खुले गेट को देखा ना सकी और उन लोगों के काबू में आ जब लोडर में चढ़ा दी गई तब मुझे देख रंभा कर आवाज दी। मैं भी धीमें कदमों से उसके पास पहुंचा और उसकी गर्दन को सहला उसे आश्वत किया। मुश्किल से यह मिलन दो मिनट का भी ना रहा और लोडर स्टार्ट हो चल दिया। हम दोनों एक दूसरे को जब तक नम आंखों से देखते रहे जब तक देख सकना संभव रहा।

कल जब सुबह गेट खोलूंगा तब बाहर मेरे इंतजार में कोई खड़ा ना होगा। सोच कर ही मन दुखी है पर एक बात का इत्मीनान है कि वह जिस भी गोशाला में होगी उसको दोनों टाइम भोजन पानी मिलेगा और ठंड बरसात गर्मी में उसे छत मिलने से दिक्कत ना होगी। मैं तो सिर्फ एक समय ही पेट भर पाता था और छत भी मुहैय्या नहीं कर सका था उसके लिए।

फिलहाल तो बीजेपी सरकार को नमन है जिसने इनके दुख दर्द को समझा और उनके भरण-पोषण के लिए व्यवस्था बनाई। हिंदूवादी सरकार होने का यह लाभ है हम हिंदुओं को वरना अभी तक प्रदेश में कब्रों की चारदिवारी सुरक्षित करना, अपनी मूर्तियां लगवाना और जालीदार टोपी पहन कर इफ्तार पार्टी करने वाली सरकारें ही बनती थीं।

जय जय हिंदुत्व
जय हो योगी जी की
जयतु जयतु हिंदू राष्ट्रम।।

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