आजीवन काँग्रेस की ईंट से ईंट बजाते रहे जॉर्ज

मजदूरों के मसीहा और ईमानदार राजनीतिज्ञ जॉर्ज फर्नांडीज को विनम्र श्रद्धांजललि। 88 साल की उम्र में आज वह दुनिया से विदा हो गए।

जॉर्ज की मां उन्हें पादरी बनाना चाहती थीं। 16 साल की उम्र में उन्हें एक क्रिश्चियन मिशनरी में भेजा भी गया था। लेकिन वहां की हिप्पोक्रेसी देख कर वह दो साल बाद लौट गए।

मुम्बई चले गए। बेंच पर सोते-सोते टैक्सी ड्राइवरों से दोस्ती हुई फिर उन के नेता बन गए। लोहिया से प्रभावित जॉर्ज एक समय मुम्बई में मज़दूरों के मसीहा बन गए।

इमरजेंसी आई तो इंदिरा गांधी ने उन्हें डाइनामाइट कांड में फर्जी तौर पर फंसा दिया। बहुत दिनों तक वह अंडरग्राऊंड रहे, पर बाद में पकड़े गए तो उन्हें बेड़ियों में जकड़ कर रखा गया। जितना जुल्म जॉर्ज के साथ इमरजेंसी में हुआ किसी और राजनीतिज्ञ के साथ नहीं। तो आजीवन वह काँग्रेस की ईट से ईट बजाते रहे।

प्रेम विवाह के बावजूद पत्नी लैला से उन की कभी नहीं पटी। एक आई ए एस अफसर की पत्नी जया जेटली से जॉर्ज की नजदीकियां भी बहुत चर्चा में रही। जया ने भी सारी कीमत चुका कर जॉर्ज से अपने संबंधों को छुपाया नहीं। यहां तक कि जब जॉर्ज बीमार पड़े, अल्जाइमर और पार्किन्शन जैसी बीमारियों से जूझ रहे थे तो उन की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी।

बाद में लैला विदेश से लौटीं तो उन्हों ने जया जेटली को घर से न सिर्फ निकाल दिया बल्कि जॉर्ज से मिलने पर रोक लगा दी। जया जेटली हाईकोर्ट गईं अपने भावनात्मक संबंधों का हवाला दिया और जॉर्ज से मिलने की अनुमति मांगीं। हाईकोर्ट ने दे दी।

अब के दिनों में तो सिर्फ दो ही लोग जॉर्ज से नियमित मिलते थे। एक जया जेटली, दूसरे लालकृष्ण आडवाणी। बाकी लोग जॉर्ज को भूल गए थे। मंत्री रहते हुए भी जॉर्ज अपने काम खुद करते थे। अपने कपड़े खुद धोते थे, अपनी कार खुद चलाते थे।

उन का घर सब के लिए सर्वदा खुला रहता था। घर के इस तरह खुले रहने का ही परिणाम था कि अर्जुन सिंह के इशारे पर तहलका के तरुण तेजपाल की टीम ने जया जेटली का फर्जी स्टिंग किया था।

जॉर्ज जैसा निर्भीक, निडर और ईमानदार नेता भारतीय राजनीति में अब दुर्लभ है। जब मैं दिल्ली में रहता था, तब तुगलक लेन वाले उन के घर जाता था। वह सब से खुल कर मिलते थे, चाय बनाते और पिलाते थे। लेकिन मैं तो चाय भी नहीं पीता।

लखनऊ भी जब कभी वह आते तो मिलता था। एक बार गोरखपुर में भी मिला था। वह बड़ी आत्मीयता से मिलते, नाम याद रखते। नाम से ही संबोधित करते। खादी का कुरता पायजामा पहनने वाले जॉर्ज के कपड़े कभी मैं ने प्रेस किए हुए नहीं देखे।

जॉर्ज साहब आप का जाना तकलीफदेह तो है ही पर आप को असाध्य कष्ट से छुट्टी मिली, इस की ख़ुशी भी है। सचमुच आप सर्वदा याद आएंगे जॉर्ज साहब।

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