जहां का राजा हो व्यापारी, वहां की प्रजा रहे भिखारी

कम्युनिस्ट विचारधारा का उद्देश्य रहता है शक्ति का केंद्रीकरण और समाजवाद चाहता है पूंजी का नियंत्रण समाज के हाथ में हो। दोनों की बातों से लगता है ये परस्पर विरोधी विचार हैं, लेकिन असल में दोनों का मकसद एक ही होता है भावशून्य समाज का निर्माण।

18वीं सदी के अंत में ब्रिटेन में मजदूर आंदोलन ने पूंजीवादियों की हालत खराब कर दी तब वे मजदूर और कच्चे माल के लिए उपनिवेशों पर दबाव और दमन बढ़ाना शुरू कर दिए।

उस दौर में ब्रिटेन में “फेबियन व्यवस्था” लागू हुई, सरकार ने व्यवसायिक एजेंसियों को उपनिवेशी बंदरबांट के लिए खुली छूट दे दी, नतीजा जो बीमारी यूरोप की थी उसका संक्रमण अफ्रीका और एशिया पर हो गया।

असल में यूरोप कभी समृद्ध समाज नहीं था, वहां कभी निरंकुश राजसत्ता रही तो कभी वामपंथ का उभार आया, भ्रष्ट वामपंथियों ने फिर पूंजीवाद को पनपने का मौका दिया तो कभी मजदूर आंदोलन को हवा दी, यानि हमेशा यूरोप अस्थिर समाज की अफरा तफरी में रहने को अभिशप्त था।

उसके उलट भारत सदैव सनातनी सभ्यता से विकसित ग्राम्य स्वरोजगार की व्यवस्था से संचालित रहा, इस्लामिक सल्तनत में भी हजारों वर्ष की ग्रामीण संस्कृति अपनी गति से चल रही थी धार्मिक मोर्चे पर भले संघर्ष था लेकिन अर्थव्यवस्था तब भी गांव के भरोसे कायम थी।

यूरोपियन एजेंसियों ने संसाधनों को अमानवीय ढंग से लूटना प्रांरभ किया जिसकी परिणति हुई कि कभी विश्व की एक चौथाई अर्थव्यवस्था संभालनेवाला भारत कंगाली का पर्याय बन गया।

स्वरोजगार खत्म कर दिया गया, कृषि किसानों से लूट ली गई और कच्चे माल लूटकर उद्योगों को उजाड़ दिया गया।

कुल मिलाकर कहें तो यूरोपियन अराजकता को भारत में बसाया गया। कांग्रेस की अंतरिम सरकार जब बनी तो भारत के अधिकांश नेता भारतीय मानदंडों पर पूर्ण स्वायत्त सत्ता चाहते थे लेकिन नेहरू को दो ही भारत की ज्ञान था या तो इस्लामी सल्तनत का या अंग्रेजी दासता में घुटा इंडिया का।

उस पर ब्रिटेन की फेबियन व्यवस्था का असर ही नहीं था बल्कि वह उसका हिमायती भी था।

जब भारत स्वतंत्र हुआ तो एक मौका था, भारत की विरासत को पुनर्जीवित करने का जिसकी पैरवी गांधी कर रहे थे “ग्राम्य-स्वरोजगार” के जरिए क्योंकि भारत के बारे में गांधी का अध्ययन नेहरू से सौ गुणा अधिक था।

लेकिन नेहरू को यूरोपियन चकाचौंध के आगे कुछ दिख ही नहीं रहा था, इसलिए उसने गांधी के परामर्श को ठुकरा कर रूस से प्रशिक्षित कम्युनिस्टों की सलाह पर अमल करना शुरू कर दिया।

स्वरोजगार के बदले सरकारी नौकरियों को प्राथमिकता दी गई, जिससे रोजगार की संभावना निम्नतम हुई और भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच गया। देश की आर्थिक विकास की गति रेंग रेंग कर चलने लगी।

सरकार जब उद्योग लगाती है तो केवल नौकरियां सृजित होती है लेकिन निजी संस्थान जब उद्योग लगाते हैं तो तृआयामी रोजगार की संभावना बनती है।

राज्य (Governance Body) का काम है नीतियां बनाना न कि रोजगार करना। राज्य व्यापारी और मजदूर के हितों की सुरक्षा के लिए नियम बनाए ताकि वे एक दूसरे के पूरक हों शोषक नहीं, लेकिन फेबियन व्यवस्था ने दोनों को एक दूसरे का दुश्मन बना दिया।

कुछ महीने पहले गांव गया था, देखा किसान MSP से कम मूल्य पर अपना धान व्यापारियों को दे रहे हैं। मैंने किसानों से पूछा कि वे “पैक्स” में अपना धान क्यों नहीं देते? तब वे कहने लगे एक तो पैक्स में भुगतान समय पर नहीं होता ऊपर से कमीशनखोरी है।

आप लाख प्रयास कर लो सरकारी संस्थान व्यापार करेंगी तो भ्रष्टाचार को रोकना असंभव है बल्कि सरकार पब्लिक सैक्टर बनाने के बजाय बाजार पर नियंत्रण रखे तो कुछ अच्छे परिणाम निकल सकते हैं।

राज्य मूलभूत सुविधाएं, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि पर ही अपना फोकस रखे तो ही सही, ये व्यवस्था निजी हाथों में हानिकारक हैं।

झारखंड में एक छोटा सा शहर है सरायकेला, वहां एक वृद्धाश्रम देखा। भवन बिल्कुल नया और सुविधापूर्ण है लेकिन उसकी एक विडंबना है। वृद्धाश्रम शहर से करीब पांच किमी दूर सुनसान स्थान पर है, ऐसी सूरत में वह वृद्धाश्रम कम जेल अधिक लग रहा था।

इंसान समाजिक प्राणी है, उसे भोजन, कपड़े, सुख-सुविधाओं के अलावा समाज चाहिए जहां उसका भावनात्मक पोषण और संरक्षण होता है। वृद्धाश्रम यदि आबादी के बीच होता तो वहां रह रहे वृद्ध कैंपस से बाहर जाते पार्क में टहलते, टपरी पर चाय की चुस्किओं के संग देश-विदेश अपने-पराए पर गप्प हांकते, हंसी-मजाक करते और उनका दिन कट जाता।

लेकिन “फेबियन” संस्कृति ने भावशून्य लालफीताशाही का जन्म दिया जहां बस “ड्यूटी” पूरी करने की आपाधापी है। सबकुछ दिखाने के लिए किया जाता है।

सरकार, नौकरी बांटने का केंद्र न बने बल्कि रोजगार का अवसर उत्पन्न करे, रोजगार का विकेंद्रीकरण हो ताकि अधिक से अधिक मानव संसाधन का सदुपयोग हो सके।

इसके लिए वर्तमान भारत सरकार द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में प्रयास किया भी गया है, लेकिन हमें कांग्रेस द्वारा पोषित मुफ्तखोरी की लत छोड़नी होगी।

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY