बाबा आए, पैसे लाए

अहा… इंदिरा का स्वर्णिम समाजवाद अब जाकर धरती पर उतर रहा है, दादी ने आपातकाल के अँगारे दिखाकर जिस संविधान को ‘समाजवादी’ बनवा दिया था अब जाकर उसी संविधान से शासित जनता को न्यूनतम आय की गारण्टी अर्थात यूनिवर्सल बेसिक इनकम का शिगूफा मिलने जा रहा है।

लुटियंस के सहाफियों की लहालोट और परिवार दासों का उत्साह दसों दिशाओं में गूँजने लगा है। आह समाजवाद! वाह समाजवाद! जय जय!

समाजवाद भी ऐसा जिसमें दिया सबकुछ जाता है पर मिलना कुछ भी नहीं है… पिछली सरकार राइट टू एडुकेशन को मौलिक अधिकार बना गई। देश में इससे इतनी शिक्षा बढ़ी की रद्दी वालों ने भी डिग्रियों के भाव लगाना बंद कर दिए… सब पढ़ें – सब बढ़ें… वैसे मंशा यह थी कि सब पढ़ें सब लड़ें (चपरासी की नौकरी के लिए)।

आँकड़े कह रहे हैं कि इंदिरा की बहू की मंशा सफल ही रही… साल की चार लाख नौकरियों के लिए तीस करोड़ युवा जाति/ धर्म के पत्थर उठाकर एक दूसरे के विरुद्ध खड़े दिखे ताकि इनमें से कुछेक चपरासी बन जायें… और बाकी कलेक्टर हो जायें।

समाजवाद बिल्कुल BSNL जैसा है देता (DATA) सबको है पर मिलता किसी को भी नहीं है। सामाजिक न्याय की पार्टियाँ नाहक़ बदनाम हैं… समाजवाद पर बाबा की पार्टी का ही एकाधिकार है।

बाबा के पापा जी बताते थे कि हम 1 रुपया देते हैं तो लोगों को 15 पैसा मिल जाता है। कहना न होगा कि वह ईमानदार थे, अपने ही लोगों की पोल खोल रहे थे।

इससे बाबा की पार्टी के लोग नाराज़ हुए… पापा जी को तो ऐसे लोगों की नाराज़गी की कीमत जान देकर चुकानी ही पड़ी… रेनकोट पहनकर नहाने वाले डॉ साहब समझदार थे… चुप रहे जान बची रही…

बाबा की पार्टी सबको भोजन का अधिकार दे चुकी है।

बाबा की पार्टी सबको शिक्षा का अधिकार दे चुकी है।

बाबा की पार्टी ने सबको सूचना का अधिकार भी दिया है।

इन अधिकारों को भोगने के लिए बाबा की पार्टी ने क़रीब सात करोड़ लाभार्थी बनाये (कागज़ों पर)… यह लोग भोजन-शिक्षा-सूचना के सारे अधिकारों को भोग रहे थे क्योंकि यह लोग ग़रीब थे। यही लोग मनरेगा के असल लाभार्थी भी थे और कर्ज़माफी का बड़ा हिस्सा इनके लिए ही खर्च हुआ।

बाकी जनता इन संवैधानिक अधिकारों की बत्ती बनाकर 32 रुपये प्रतिदिन पर गुज़ार रही थी। सब तरफ़ रामराज्य था।

अब फ़िर से बाबा सबको इनकम का अधिकार देने जा रहे हैं। समाजवाद के बोझ से दबा संविधान फिर से थरथरा रहा है। 7 करोड़ मुर्दों (मोदी सरकार के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर ने इन्हें दफ़न किया था) के जिस्मों में हरक़त देखी जा सकती है।

लुटियंस के दलालों की बाँछे खिली हुई हैं। इसका अंजाम क्या होगा सबको पता है।

आपको भी पता है क्या?

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक वरुण जायसवाल के अन्य लेख पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें – Varun Jaiswal

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