देश का तिरस्कार और उच्चतम शिक्षा

क्या आप मान सकते हैं कि 70 वर्षों से उच्चतम शिक्षा द्वारा आप को अपने देश का तिरस्कार करना सिखाया गया?

सुबह यह प्रश्न किया था। एक दो मित्र असहमत हुए, बहुतांश सहमत हुए लेकिन अब जो लिखने जा रहा हूँ वह शायद उनकी अपेक्षा से अलग हो सकता है।

असल बात यह है कि भारत में मिलती हुई कोई भी डिग्री आप को भारत का तिरस्कार करने नहीं सिखाती। और यहाँ तो मैं उच्चतम शिक्षा की बात कर रहा हूँ, शालेय इतिहास आदि की नहीं। IIT की बात कर रहा हूँ।

तो क्या IIT में देश से तिरस्कार करना सिखाया जाता है? जी नहीं। फिर?

यहाँ पर बात को एक अलग दृष्टिकोण से देखना होगा। IIT देश में इंजीनियरिंग की सर्वोच्च शिक्षा देनेवाला संस्थान माना जाता है। क्या आपको पता है इसकी स्थापना कब हुई थी?

1946 के अंत में इस पर सोचना शुरू हुआ। 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ। 1951 में IIT की खड़गपुर में नींव डाली गयी, 1956 में पहला कोन्वोकेशन भाषण नेहरू का है।

यह इंस्टीट्यूट भारत के सभी इंजीनियरिंग कॉलेजेस के ऊपर था, ज़ाहिर सी बात है कि इसमें दाखिला पाना हमेशा उच्च बौद्धिक क्षमता का प्रमाण रहा है। इसलिए इससे निकले हुए लोगों में भारत के अन्य सभी इंजीनियरिंग कॉलेजेस से श्रेष्ठ होने की भावना होना अपेक्षित है।

साफ है कि IIT का B Tech विद्यार्थी, वो कोई नौकरी नहीं करता जो अन्य B E को मिलती। अगर करनी पड़ती तो खुद का अपमान समझता तो भी कोई भारतीय उसे गलत नहीं मानेगा।

परिणाम वही हुआ, IIT का इंजीनियर होना पश्चिम का, उसमें भी अमेरिका का पासपोर्ट पाना समझा गया। वहाँ जाकर उन्होने झंडे भी गाड़े लेकिन अपने करतब के, भारत के नहीं।

In fact, उनसे कोई भारत की बात करे तो उसे ऐसी हिकारत और उपहास से देखा जाता था कि यह नमूना कहाँ से आया है जो भारत की बात करता है। उसे ‘मनोज कुमार’ भी कहा जाता।

लगभग 1990 से पहले लोग या तो जाते रहे या जाने की जी तोड़ कोशिश करते रहे। टॉपर्स के लिए जाना आसान होता ही, बचे खुचे भी जैसे तैसे निकल ही जाते। उसके तुरंत बाद IIM आई, उनका भी यही हाल था। ब्रेन ड्रेन शब्द बहुत चर्चा में आया, चर्चा ही होती रही, यहाँ ब्रेन ड्रेन लगातार चलता रहा।

उदारीकरण के साथ इसमें बड़ा फर्क हुआ, उसके पहले भारत में गिनती की कंपनियों में ये लोग समाने लगे। उसमें भी कुछ देसी कंपनियों को छोड़ अधिकतर लोग विदेशी कॉर्पोरेट को वरीयता देते क्योंकि वहाँ विदेश जाने का अवसर मिलने की आशा थी। वहाँ से कोई छुट्टियों में आता तो स्वर्ग से भूमि पर आया हो ऐसे ठाठ होते और घरवाले पूरे मोहल्ले में इतरा कर फिरते। उदारीकरण के बाद लोग यहाँ भी नौकरियाँ स्वीकार करने लगे लेकिन MNC में जहां फिर उनकी नज़र पश्चिम की ओर रहती।

इन सब में आपत्तिजनक बात यही है कि देश में योग्य अवसर या वातावरण पैदा किए बिना ही ये इंस्टीट्यूट्स क्या केवल भारतीयों की टॉप लेवल बुद्धि अमेरिका की सेवा में लगाने के लिए बनाए गए?

उनके मानक तो अमेरिकी ही थे। इनकी भारत के लिए जो भावना थी उसमें सकारात्मक या प्रेम की भावना केवल अपने परिजनों तक सीमित थी। बाकी देश के लिए जो भावना होती थी, वह लिखने की इच्छा नहीं है।

फ़िल्म हरे राम हरे कृष्ण का गीत था “दम मारो दम” उसकी दो पंक्तियाँ थी – दुनिया ने हमको दिया क्या / दुनिया से हमने लिया क्या / हम सब की परवाह करे क्यों / सब ने हमारा किया क्या ?

दुनिया की जगह इंडिया लिखें, सब की जगह देश। इनकी भावनाएँ तुरंत समझ आती थी। कभी ऐसे लोगों से बात करें तो न सिर्फ ये बल्कि इनके यहाँ रहने वाले परिजन भी तुनककर यही attitude दिखाते थे। आज कम हुआ है, फिर भी देश के कई भागों में NRI को IIM के MBA से अधिक भाव दिया जाता है।

देश के लिए यह तुच्छता का भाव केवल इन लोगों तक सीमित नहीं होता था, बल्कि ये लोग कई लोगों के लिए सामाजिक लेवल पर रोल मॉडल बन जाते थे उनमें भी संक्रमित होता था। अगर किसी देशभक्त व्यक्ति से बात हो भी जाये जिसका ये उपहास नहीं कर सकते थे तो फिर ये अपनी इस घृणा को जस्टिफ़ाई करने के लिए कई कारण देते जो अपने आप में सही भी लगते।

जैसे यहाँ इनके लायक नौकरी या सुविधाओं का अभाव यह पहला कारण होता था। डॉ खुराना को quote करना इनके लिए बहुत आसान था कि देखिये एक नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक कह रहे हैं कि ‘आप के इंडिया में’ क्या रखा है।

फिर बात आती कि इंडिया तो प्रोग्रैस कर सकता है लेकिन पॉलिटिशियन लोग इसके रास्ते में रोड़ा बने हैं इसलिए यह कंट्री ऐसे ही रॉट करेगा, आप को इससे निकलने का अरेंजमेंट तुरंत करना चाहिए। आप के लिए नहीं तो आप के बच्चों के लिए ज़रूर।

इन तर्कों में कितने लोग आ गए और कितनों के महंगे और सजे धजे घर और बंगले खाली पड़े हैं जिनको हड़पने के लिए हरे गिद्ध इंतज़ार कर रहे हैं। लेकिन वह विषय अलग है, उसपर अलग से बात करेंगे।

बात शिक्षा की थी। शिक्षा में कोई ऐसी बात नहीं जो देश का तिरस्कार सिखाये। लेकिन जो तिरस्कार की भावना भरी है जो आज तक पूरी तरह मिटी नहीं, क्योंकि आज भी अमेरिकन कॉन्सुलेट के बाहर हमारे लोग ऐसे ही लाइन लगाते हैं जैसे लगाते आए हैं।

गत चार सालों में कोई सुधार हुआ तो सिर्फ कॉन्सुलेट के कर्मचारियों के पेश आने में थोड़ा सा हुआ है। ये जो तिरस्कार की भावना है इसका मूल उस शिक्षा में है जिससे देश का विकास करने की आप के पास कोई योजना नहीं थी। और जिन्हें आप उनकी योग्यता के अनुसार काम और दाम नहीं दे सकते वे अन्यों को उपलब्ध होते हैं। शत्रुओं को भी।

शिक्षा से देश का तिरस्कार जोड़ने का मेरा नज़रिया यह है। सरकार का यह दायित्व बनता था कि उसको काम में लेने के सही अवसर भी साथ साथ विकसित हों। नहीं किए तो जनता में देश के लिए एक disaffection (अप्रीति) भर आई। ये भाव नहीं रहा कि कितने भी दूर भागें, कितना भी दूसरा देश हमारी कदर करे, धन सम्मान दे, उनके लिए हम भारतीय ही रहेंगे।

वैसे यहाँ इस्राइल, जर्मनी और जापान के उदाहरण दिये जा सकते हैं कि वे देश भी हमारे साथ ही खड़े हुए थे। जर्मनी जापान विश्व युद्ध के बाद खड़े हुए, इस्राइल अस्तित्व में आया। तीनों को ध्वस्त प्रदेश मिले, उनके बनिस्बत तो हमारा कुछ भी डैमेज नहीं हुआ था, सब कुछ ‘टकाटक’ था। लेकिन इतनी निर्ममता से सवाल लोगों को अच्छे नहीं लगते और यहाँ वहाँ आरोप लगाकर वातावरण विषाक्त कर देते हैं, इसलिए केवल शिक्षा की ही बात रखते हैं।

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