सरहदों पे खड़ा होगा

सरहदों पे जमा पैर
कौन आज खड़ा होगा
एक शव है लौट आया
तिरंगे में लिपट आया

मातृ भू से लिपट के वो
माँ से आज लिपटा होगा
देख कंधे पे सितारे
विदा उसको किया होगा
छोड़ करके मोह घर का
आज सबसे लड़ा होगा
सरहदों पे खड़ा होगा।

वो महावर फिर सजाये
माथे पे बिंदी लगाए
रूप पी का देख आयी
आंखों में उतार लायी
माथे पर कुमकुम लगाए
द्वार पर दुल्हन है आयी

रात आज छोड़ करके
पिया से मुँह मोड़ करके
जवानी को ओढ़ करके
सारा प्यार छोड़ करके
पिया से भी लड़ा होगा
सरहदों पे खड़ा होगा।

सफेदी कभी है धरा में
कभी रेत रहा होगा
कहीं पे जंगल है कोई
समुंदर भी मिला होगा
बढ़ा दाढ़ी बदल पानी
कैसे कैसे जिया होगा
धूप कभी छांव कभी
प्यास से वो तपा होगा

किसी डाली किसी पेड़ पर
किसी पर्वत पर चढ़ा होगा
चीर करती कभी वायु
दूर कहीं पड़ा होगा
मार करके मोह सैनिक
सरहदों पे खड़ा होगा।

जिसके बचपन में किताबें
शब्द छोटे मोटी आंखें
और कुछ क्या कर सकूंगा
सोच करके गया होगा।
वो मिलेटरी की टिरेनिंग
सीख करके जुड़ा होगा।
कंधों से वो ज़िम्मेदारी
हटा करके आज निकला
ताज सिर पर पहन कर
कफन चादर ओढ़ करके
बटालियन में बंटा होगा
सरहदों पे खड़ा होगा।

हम ये तुच्छ से कवि क्या
लिख सकेंगे दर्द उनका?
क्या लिखेंगे भाव उनके?
क्या लिखेंगे जबर कविता?
चिट्ठियां गाँव से आई
स्नेह मन में जगा होगा
मार करके मोह सैनिक
सरहदों पे खड़ा होगा।

कौन आंखों से हाँ अपने
सपनों पे फिर मरा होगा
प्रश्नचिन्ह क्या लगे किसी पे?
ज़िन्दगी क्या जिया होगा?
क्या महावर, क्या वो कुमकुम
याद किसको किया होगा?
कौन माता कौन बेटा?
देश को सब दिया होगा।
जन सभी को भूलकर के
देश पे वो खड़ा होगा
और! टुकड़े जिसके हम करेंगे
उसकी खातिर खड़ा होगा
सरहदों पे खड़ा होगा।

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