ढपोरशंखी ओपिनियन पोल वाले ढपोरशंखियों को उत्तरप्रदेश में चौंकाएगी भाजपा

उत्तरप्रदेश में बने सपा-बसपा-रालोद के गठबंधन का राजनीतिक भविष्यफल वर्ष भर पूर्व लिखा जा चुका है।

अप्रैल-मई 2019 में होने जा रहे लोकसभा चुनाव से ठीक एक वर्ष पूर्व उत्तरप्रदेश में कैराना, गोरखपुर, फूलपुर में हुए लोकसभा के तीन उपचुनावों के परिणाम वह भविष्यफल लिख चुके हैं।

लेकिन पिछले एक वर्ष से पेशेवर पूर्वाग्रही राजनीतिक विश्लेषक उस राजनीतिक भविष्यफल के राजनीतिक निहितार्थ से मुंह चुराने का शातिर प्रयास करते रहे हैं। लेकिन उनकी ऐसी शुतुरमुर्गी कोशिशों से सच को झुठलाया नहीं जा सकता। आइये जानते हैं कि सच क्या है।

ध्यान रहे कि उत्तरप्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 16 सीटें ऐसी हैं जिनमें मुस्लिम मतदाता 20 से 50 प्रतिशत तक हैं। उत्तरप्रदेश में महागठबंधन का मुख्य राजनीतिक उद्देश्य इसी मुस्लिम वोटबैंक के बिखराव को रोकना है। लेकिन कैराना उपचुनाव ने यह बता दिया है कि उसकी यह रणनीति कितनी सफल होगी।

उल्लेखनीय है कि 35 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं के आंकड़े के साथ कैराना उन्हीं 16 लोकसभा सीटों की सूची में शामिल है।

[कुछ तो शर्म करो, ढपोरशंखी ओपिनियन पोल वाले बेशर्मों]

कैराना लोकसभा सीट पर मतदाताओं की कुल संख्या लगभग 16,90,000 मतदाता हैं। इसमें मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 35%, अर्थात कैराना में लगभग 5 लाख 65 हज़ार मुस्लिम मतदाता हैं। उपचुनाव में कैराना में लगभग 55% मतदान हुआ था। अर्थात लगभग 9 लाख 43 हज़ार मत पड़े थे।

यह जग जाहिर तथ्य है कि कैराना लोकसभा सीट पर मुस्लिम मतदाताओं का मतदान प्रतिशत सामान्य मतदान से अधिक प्रतिशत में हुआ था। अतः बहुत कंजूसी से यदि यह मान लीजिए कि मुस्लिम मतदाताओं का मतदान कुल मतदान से केवल 5% अधिक हुआ तो कैराना में कुल मुस्लिम वोट लगभग 3,40,000 पड़ा। जबकि वास्तविक संख्या इससे अधिक ही होगी।

दिल्ली से लेकर देवबंद तक जारी हुए मोदी-योगी हराओ वाले फतवों और भाजपा बनाम सब की चुनावी स्थिति के बाद यह 3,40,000 मुस्लिम वोट भाजपा के पक्ष में गए होंगे, ऐसा मूर्खतापूर्ण निष्कर्ष राजनीतिक धरातल की कठोर और कटु सच्चाई से पूरी तरह अनभिज्ञ कोई राजनीतिक अनपढ़/गंवार ही निकाल सकता है।

मेरा अपना मानना है कि इनमें से ज्यादा से ज्यादा 5 से 10 हज़ार मत ही भाजपा को मिले होंगे। सम्भव यह भी है कि वो भी नहीं मिले होंगे।

2014 में कैराना में 15,31,642 मतदाता थे। उस समय सपा बसपा और RLD-कांग्रेस गठबन्धन अलग अलग चुनाव लड़े थे। उनके तीनों प्रत्याशियों को कुल मिलाकर 5,32,201 मत मिले थे।

इस बार इन सारे दलों के गठबन्धन की संयुक्त प्रत्याशी तबस्सुम हसन को 4,81,182 मत मिले थे। अर्थात गठबन्धन प्रत्याशी को 2014 की तुलना में लगभग 51 हज़ार मत कम मिले थे।

यहां यह ध्यान रखिये कि 2014 में 73.08% मतदान हुआ था। जबकि उपचुनाव में 55% मतदान हुआ था। अर्थात 2014 की तुलना में लगभग 2 लाख मत कम पड़े थे।

यहां यह भी ध्यान रखिये कि 2014 में तीनों दलों के प्रत्याशी अलग अलग थे। उन तीनों दलों के प्रत्याशियों और उनकी कोर टीम के सदस्यों के व्यक्तिगत प्रभाव वाले मत भी 5,32,201 मतों में शामिल थे।

राजनीति के रसायन को समझने वाले यह भलीभांति जानते हैं कि किसी भी दल के प्रत्याशी के व्यक्तिगत सम्बन्धों/ सम्पर्कों वाले मतों का दलीय राजनीति से कोई लेनादेना नहीं होता।

उस समय तीनों दलों को मिले वोटों में कम से कम 5-6% वोट उन प्रत्याशियों का व्यक्तिगत वोट था।

अतः आंकड़ों की उपरोक्त सच्चाई यह तो बता ही रही है कि 2014 में गठबन्धन को जितने मत मिले थे उससे मात्र 20-25 हज़ार कम मत उसे इसबार कम मिले थे। यानी कि मोदी विरोधी राजनीतिक ताकतों का प्रदर्शन जितना सम्भव हो सकता था उतना ही हुआ। इसके बावजूद भाजपा प्रत्याशी मृगांका सिंह मात्र 44,618 मतों से हारी हैं। उन्हें 4,36,564 मत मिले थे।

भाजपा को 2014 की तुलना में लगभग 1,30,000 मत कम मिले थे, क्योंकि 2014 में भाजपा को 5,65,909 मत मिले थे। लेकिन यह 1,30,000 मत विपक्षी गठबन्धन के खाते में नहीं गए। इसके बजाय भाजपा का यह वोटर मतदान के लिए नहीं निकला।

इसके कई कारण हैं। पहला तो यही है कि इस उपचुनाव का देश या प्रदेश की सरकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना था। उपचुनाव में भाजपा का मतदाता उदासीन रहता ही है।

अनुमान लगाइए कि 2019 में जिस समय 2019 में देश का प्रधानमंत्री, सरकार चुनने के लिए जब वोट डाले जाएंगे तब मृगांका सिंह की 44 हज़ार मतों से हार का अन्तर किस तरह निष्प्रभावी होगा।

अतः 35% मुस्लिम मतदाता वाले कैराना लोकसभा क्षेत्र में गठबन्धन की पूरी ताकत झोंकने के बाद केवल 44 हज़ार मतों की हार भाजपा के लिए एक सुखद सन्देश थी। ध्यान रहे कि 2019 में कांग्रेस इस गठबंधन में शामिल नहीं है।

इसी प्रकार 2014 में गोरखपुर में जब 54% वोटिंग हुई थी तब सपा और बसपा अलग अलग लड़े थे, अर्थात अपनी पूरी ताकत से। तब दोनों के प्रत्याशियों को मिलाकर कुल 4,02,756 वोट ही मिले थे। जबकि उपचुनाव के परिणामों में दोनों के गठबंधन को 4,56,437 वोट मिले हैं। अर्थात उनके गठबन्धन में कोई कमी नहीं रही। उसे पिछली बार से 54 हज़ार वोट ज्यादा ही मिले हैं।

पिछली बार कांग्रेस के 45 हज़ार और AAP के 11 हज़ार वोट को मिलाकर लगभग 56 हज़ार वोट अलग पड़े थे। इसबार AAP मैदान में ही नहीं थी और कांग्रेस को वोट मिले हैं लगभग 18 हज़ार अर्थात इस बार गठबन्धन को मिले 54 हज़ार वोटों में भाजपा विरोधी वो 38 हज़ार वोट भी शामिल हैं।

इन सबके अलावा पीस पार्टी, निषाद पार्टी, भारतीय लोकदल, फलाने ढिकाने, ना जाने कौन कौन से मोदी विरोधी छोटे मोटे अनेक दल भी इस गठबन्धन के लिए अपनी पूरी ताकत झोंके थे। तब भी विजय मिली कुल 21,881 वोटों से। वह भी तब जबकि गोरखपुर में भी भाजपा समर्थक शहरी क्षेत्रों में मतदान 30% से अधिक कहीं नहीं हुआ और पिछली बार से लगभग 1,07,000 वोट कम पड़े।

अतः अप्रैल 2019 में देश का प्रधानमंत्री चुनने के लिए वोट डालते समय स्थिति क्या होगी तथा उपचुनाव में महागठबंधन को मिली 21 हज़ार मतों की लीड का क्या हश्र होगा यह निष्कर्ष आसानी से निकाला जा सकता है।

अब अन्त में बात फूलपुर की…

2014 तक फूलपुर में हुए 16 लोकसभा चुनावों में से 15 में भाजपा की जमानत जब्त हुई थी। प्रचण्ड रामलहर और अटल लहर में भी इस सीट पर सपा का ही सिक्का चलता रहा था।

2014 में जब 51% वोटिंग हुई थी तब सपा और बसपा अलग अलग लड़े थे, अर्थात अपनी पूरी ताकत से। तब दोनों के प्रत्याशियों को मिलाकर कुल 3,58,966 वोट ही मिले थे। आये परिणामों में दोनों के गठबंधन को 3,42,756 वोट मिले हैं। अर्थात उनके गठबन्धन में कोई कमी नहीं रही। उसे पिछली बार से केवल 16 हज़ार वोट कम मिले हैं। उपचुनाव में अतीक और कांग्रेस को मिले वोटों को भी जोड़ दिया जाए तो गठबन्धन की लीड लगभग 1,20,000 की हो जाती।

जबकि 2014 की तुलना में उपचुनाव में लगभग सवा 2 लाख वोट कम पड़ा था। भाजपा समर्थक कहे जाने वाले शहरी इलाकों में मतदान 20 से 25% ही रहा था। सबसे बड़ा अन्तर यह था कि लोकसभा चुनाव में भाजपा के सबसे बड़े ब्रह्मास्त्र नरेन्द्र मोदी का इन चुनावों से तथा अमित शाह का इन चुनावों के प्रबंधन से कोई लेना देना नहीं था।

अतः उपरोक्त तीनों उपचुनावों के परिणाम 2019 में लोकसभा में भाजपा की सुनिश्चित विजय का ही सन्देश दे रहे हैं।

क्योंकि चाहे फूलपुर हो या गोरखपुर, नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी जब मैदान में उतरेगी तब नज़ारा कुछ और ही होगा।

गठबन्धन की मुट्ठी और सारे पत्ते उपचुनावों में खुल गए हैं। लेकिन ना तो भाजपा ने अपना तुरुप का पत्ता नरेन्द्र मोदी फेंका था, ना ही अमित शाह ने अपनी रणनीतिक/ सांगठनिक मुट्ठी खोली थी।

अतः 2019 में उत्तरप्रदेश में महागठबंधन को 41 के बजाय 58, कांग्रेस को 2 के बजाय 4 और भाजपा को 39 के बजाय 18 सीटें तथा इस गठबंधन में कांग्रेस के भी मिल जाने पर महागठबंधन को 75 तथा भाजपा को केवल 5 सीटें मिलने का ढपोरशंख बजा रहे ढपोरशंखी ओपिनियन पोल वाले ढपोरशंखियों को उत्तरप्रदेश में चौंकाएगी भाजपा।

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