दलितों की राजनीति करने वाले तो ‘जिन्ना’ के भारतीय पैरोकार

भारत में संसदीय आरक्षण के अंतर्गत लोकसभा की 85 सीटें अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हैं। ध्यान रहे कि अनुसूचित जातियों में सिर्फ हिंदुओं, बौद्धों एवं सिखों को स्थान मिला हुआ है।

भारतीय जनता पार्टी एवं उसके कुछ सहयोगियों को छोड़कर अन्य सभी दल मुस्लिमों और ईसाइयों को अनुसूचित जातियों में हिस्सा दिलाने की मुहिम छेड़े हुए हैं।

एक अनुमान के मुताबिक़ अनुसूचित जातियों के लिए अभी आरक्षित सीटों में से 34 सीटें मुस्लिम वोटों के प्रभाव क्षेत्र में हैं, अर्थात मुस्लिम यहाँ सबसे प्रभावी संख्याबल का निर्माण करते हैं।

सनद रहे कि एक बार अगर आरक्षित सीटों में इस्लामवादियों को एंट्री मिल गई तो यह सीटें हिंदुओं/ बौद्धों/ सिखों के अनुसूचित जाति से सम्बंधित उम्मीदवारों के लिए जीत पाना लगभग असंभव हो जायेगा।

कह सकते हैं कि भविष्य में अनेक ‘जिन्ना’ इन सीटों पर जीतेंगे और भारत की संसदीय व्यवस्था को शरिया के आधार पर निर्देशित करेंगे।

भारत विभाजन के समय ऐसी ही चूकों से हम सिलहट, खुलना और चटगाँव गवाँ चुके हैं. आज उन क्षेत्रों में कोई भी अनुसूचित जाति के हिंदुओं का नामलेवा भी नहीं बचा है।

अनुसूचित जातियों की राजनीति करने वाले दलों के नेता इस संभावित आत्मघात के सबसे बड़े सूत्रधार रहे हैं और भविष्य के ‘जिन्नाओं’ के हाथ में हिन्दू/ बौद्ध/ सिख दलितों के भविष्य को सौंपने की राजनीति में लिप्त हैं।

वहीं भारतीय जनता पार्टी इस विषय पर कठोर निर्णय लेने में सक्षम है जिसकी बानगी हम असम में देख सकते हैं।

नागरिकता संशोधन विधेयक की सहायता से भाजपा ने असम में 18 विधानसभा क्षेत्रों में स्थानीय नागरिकों को अनुसूचित जनजाति समूहों में विस्तार देकर इन सीटों को ‘जिन्नाओं’ के हाथ में न जाने देने की अपनी प्रतिबद्धता को स्पष्ट किया है।

जो असम में भाजपा कर रही है वही आगामी दशकों में भारत के अन्य राज्यों में करने की ज़रूरत पड़ने वाली है।

दलितों की राजनीति करने वाले तो ‘जिन्ना’ के भारतीय पैरोकार मात्र हैं।

जरा सोचिए !

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक वरुण जायसवाल के अन्य लेख पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें – Varun Jaiswal

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