कभी सोचा है, असद उद दीन ओवैसी बैरिस्टर ही क्यों बने होंगे?

शीर्षक में पूछे गए प्रश्न को समझने से पहले वरुण जायसवाल का यह सटीक विश्लेषण अवश्य पढ़िये और उसके बाद उपरोक्त विषय पर मेरा लेख।

दलितों की राजनीति करने वाले तो ‘जिन्ना’ के भारतीय पैरोकार

उपरोक्त लेख पर मेरी टिप्पणी है कि ‘कभी सोचा है, असद उद दीन ओवैसी बैरिस्टर ही क्यों बने होंगे?

क्या आप को पता है कि आज स्वतंत्र भारत में बैरिस्टर होना महत्व नहीं रखता, वह ब्रिटिश राज में ही महत्व का था?

भारत स्वतंत्र हुए 70 साल हुए, और असदउद्दीन ओवैसी केवल 49 साल के हैं (13 मई 1969 यह जन्म दिन मिलता है), जब बैरिस्टर हुए तब की तारीख दी नहीं है लेकिन यह मानना गलत नहीं होगा कि पचीस वर्ष के तो होंगे ही।

यह साल आता है 1994, याने स्वतन्त्रता के बाद 47 साल। तब क्यों हुए बैरिस्टर लंदन जा कर जब बैरिस्टर होना महत्व का नहीं रहा था? और भारत लौटकर कर कौन सी वकालत कर रहे हैं? वो पढ़ाई सस्ती नहीं होती, भले ही ये अमीर घर से हैं।

यहाँ याद करना चाहिए कि उन्हें जो पक्ष विरासत में मिला है, उस पक्ष MIM (All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen – ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मस्लिमीन) की स्थापना करनेवाले थे कासिम रिज़वी, जिनके गुर्गे रज़ाकार कहलाते थे।

हैदराबाद स्टेट को भारत में विलीन न होने देने के निर्णय पीछे उनका ही ज़ोर था, और भारत के स्वतंत्र होते ही सरदार पटेल ने रियासतों का विलीनीकरण जो शुरु किया तो MIM ने लड़ लेने के तेवर दिखाये। MIM के रज़ाकारों ने हिंदुओं पर जो अत्याचार किए वो ताज़ा इतिहास है, भले ही कॉंग्रेस ने इसे सिलेबस में न आने दिया हो।

इन सब बातों का असद उद दीन ओवैसी से क्या संबंध, यह आप के मन में प्रश्न आ रहा है तो इसका उत्तर यह है कि जब सरदार पटेल ने सेना भेजकर हैदराबाद विलीन करवा लिया तो कासिम रिज़वी पाकिस्तान चले गए लेकिन पार्टी अब्दुल वहीद ओवैसी को सौंप गए, जो असद उद दीन ओवैसी के दादाजी थे। उनके बाद उनके बेटे सुल्तान उद दीन ओवैसी और उनके बाद असद उद दीन और अकबर उद दीन ओवैसी।

भारत के बँटवारे में अलगाववादी मुसलमानों के आइकन (icon) रहे थे जिन्नाह। या ये कहिए, ‘बैरिस्टर’ मोहम्मद अली जिन्नाह (क्या बात है, सुन्नी शिया दोनों आ जाते हैं मोहम्मद और अली में)।

ओवैसी के अरमान छुपे नहीं है, उनका एक इंटरव्यू देखा था कभी, तब सोचा नहीं कि सेव कर रखूँ, अब इतने हैं कि थकान होती है – उस इंटरव्यू में उन्होंने कहा था “इन्शाल्लाह, मैं इस मुल्क की तारीख (इतिहास) बदल दूँगा।”

जिन्नाह ने मुसलमानों के लिए हिंदुस्तान को तोड़कर उसके दोनों बाजू में पाकिस्तान बनवाया, एक ही बाजू नहीं। यह दोनों बाजुओं का भी अर्थ समझ लीजिये। गज़वा ए हिंद में हिंदुस्तान के मुसलमानों को भी खड़े होना अपेक्षित है हथियार उठाकर।

जिन्नाह बैरिस्टर थे। यह बात यहाँ के मुसलमानों में सांकेतिक महत्व रखती है। अब सोचिए ओवैसी बैरिस्टर क्यों बने। उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा तो छुपाई नहीं है – “इन्शाल्लाह, मैं इस मुल्क की तारीख बदल दूँगा।” जिन्ना- 2 बनना चाहते हैं।

पाकिस्तान बनाने में बाबा साहेब के विचार स्पष्ट थे, और वे जब हिन्दू धर्म छोड़ने को थे तब उनको मुसलमान होने के ऑफर तो थे ही। लेकिन आज बाबा साहेब का बस नाम लेनेवाले SC नेताओं ने उनकी ‘Thoughts On Pakistan’ पढ़ी है या नहीं, यह शंका है। वैसे उनका पूरा साहित्य कई भाषाओं में अनुवादित भी हैं और मुसलमान को लेकर उन्होने कभी अपने विचारों को sugar coat नहीं किया।

जोगेन्द्र नाथ मण्डल का क्या हुआ यह इंटरनेट पर आसानी से मिल जाएगा। आज पाकिस्तान और बंगला देश में SC की स्थिति वरुण जी ने अपने लेख में लिखी ही है।

हिंदुओं को समझदारी से काम लेना आवश्यक है, क्षणिक निजी स्वार्थ के ऊपर उठकर। आज क्षणिक स्वार्थ से ऊपर उठेंगे तो कल आप का श्राद्ध करने वाले मौजूद होंगे, वरना जीते जी आत्मश्राद्ध कर सकते हैं या नहीं, यह पूछिए ‘नोटा नोटा’ की गर्जना करनेवालों से।

और उनसे भी कहिएगा कि वे भी अपना श्राद्ध कर लें क्योंकि बचेंगे तो वे भी नहीं।

नरेंद्र मोदी का SC से संवाद जिन्हें खटक रहा है वे इस बात को गौर से पढ़ें। वो आदमी आप की आनेवाली पीढ़ियों के लिए यह सब कर रहा है, उसका है कौन जिसके लिए वो करे? वे जानते हैं कि बकासुर से भीम ही लड़ सकता है, वरना जिनके घर पांडव उतरे थे वह ब्राह्मण तो अपने वंश के दिये को बकासुर का आहार बनने भेज ही रहा था रो रो कर।

काँग्रेस मोदी को समझती है, उसके साथ जुड़ी सभी देश विघातक ताक़तें (breaking India forces) मोदी को समझती हैं और इसीलिए वे मोदी को हिन्दू ही कहते हैं। दु:ख की बात है कि हिन्दू ही मोदी को हिन्दू मानने से इंकार कर रहे हैं।

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