कुछ तो शर्म करो, ढपोरशंखी ओपिनियन पोल वाले बेशर्मों

चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि 2014 में सपा, बसपा, लोकदल को जितने वोट मिले थे उन वोटों को जोड़ने पर नतीजा यह निकलता है कि भाजपा को 39 सीटें मिलती और महागठबंधन को 41 सीटें मिलतीं।

एक आंकड़ा और है कि यदि उस महागठबंधन में कांग्रेस भी शामिल होती और मुकाबला एक बनाम एक होता तो महागठबंधन को 57 और भाजपा को 23 सीटें मिलतीं।

लेकिन दो दिन पूर्व ‘INDIA TODAY आजतक’ ने अपने ओपिनियन पोल का जो ढपोरशंख बजाया उसके अनुसार महागठबंधन को 41 के बजाय 58, कांग्रेस को 2 के बजाय 4 और भाजपा को 39 के बजाय 18 सीटें मिलने जा रही हैं।

अपने इसी ओपिनियन पोल में ‘INDIA TODAY आजतक’ ने यह भी एलान कर दिया कि यदि कांग्रेस भी इस महागठबंधन में आ गयी तो भाजपा को मात्र 5 सीटें मिलेंगी और महागठबंधन 75 सीटें पाएगा।

‘INDIA TODAY आजतक’ का उपरोक्त ओपिनियन पोल क्या उत्तरप्रदेश की राजनीतिक वास्तविकता का ज़मीनी सच है? या फिर दलाल पत्रकारिता के बिकाऊ चरित्र और चेहरे का घृणित निर्लज्ज प्रदर्शन है?

केवल कुछ तथ्य ही आपको इस सच से परिचित करा देंगे। 2014 में जब लोकसभा चुनाव हुए थे उस समय अखिलेश यादव का ‘काम बोलता है’ का नारा बुलंदी पर था। सत्ता की पूरी ताकत समाजवादी पार्टी के पास और साथ थी।

शिवपाल यादव और अखिलेश यादव की अंतर्कलह का तबतक कोई नामोनिशान नहीं था। मुलायम सिंह यादव को दिल्ली दरबार तक पहुंचाने के लिए सपा की सांगठनिक एकता पूरी तरह से कटिबद्ध थी। इस सपाई लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अखिलेश यादव के साथ कंधे से कंधा मिलाकर शिवपाल यादव ने भी अपनी पूरी शक्ति झोंक दी थी।

इसबार दोनों एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खुलकर जमकर ताल ठोक रहे हैं। महागठबंधन में बसपा कोटे की 38 सीटों पर चाचा भतीजे की चुनावी महाभारत बहुत भीषण और निर्णायक सिद्ध होने वाली है।

इसका परिणाम क्या होगा यह इसी से समझ लीजिये कि सपा सरकार में कैबिनेट मंत्री रही एक मजबूत राजनीतिक शख्सियतयत जो अब अखिलेश के साथ हैं, उनसे उनके एक शुभचिंतक ने जब लोकसभा चुनाव लड़ने का सुझाव दिया तो उस शख्सियत ने तत्काल जवाब दिया कि “भइय्या चुनाव ज़मीन पर होते हैं। नारों और न्यूज़ चैनलों के सहारे चुनाव नहीं होते, और भइय्या आज का सच यह है कि संगठन की ताक़त शिवपाल अपने साथ ले गए हैं, अखिलेश के साथ कुछ छात्रनेता, जमीन से कटे रिटायर्ड अधिकारी सलाहकार और मीडिया मात्र बचा है।”

यह कहते हुए उस शख्सियत ने अपने शुभचिंतक द्वारा दी गयी सलाह को तत्काल खारिज कर दिया। लोकसभा चुनाव लड़ने के अखिलेश यादव के प्रस्ताव को भी वह शख्सियत शालीनता के साथ नकार चुकी है।

दूसरा तथ्य यह जान लीजिए कि उत्तरप्रदेश की एक भी सीट ऐसी नहीं है जहां केवल बसपा के नाम पर चुनाव जीता जा सके। करोड़ों रूपये में बसपा का चुनावी टिकट बेचने की बसपा की रणनीति का बहुत बड़ा कारण यह भी है। क्योंकि जो व्यक्ति करोड़ों में टिकट खरीदता है उससे कई गुना ज्यादा बड़ी रकम वो चुनाव में झोंकता है।

बसपा का परंपरागत वोटबैंक उसको एक मज़बूत आधार तो देता है लेकिन निर्णायक विजय के लिए वह उम्मीदवार अपने जातीय, सामाजिक, राजनीतिक सम्बन्धों सम्पर्कों के दोहन के लिए पानी की तरह पैसा बहाकर बसपा के उस आधार वोटबैंक में कम से कम 25 से 30 प्रतिशत मतों की बढ़ोत्तरी करता है।

अर्थात इस बार महागठबंधन की बसपा रहित 42 सीटों पर बसपा का आधार वोटबैंक तो उपस्थित रहेगा लेकिन उस आधार वोटबैंक में 25 से 30 प्रतिशत की बढोत्तरी करनेवाले अरबपति/ करोड़पति/ बाहुबली/ दबंग उम्मीदवार नहीं होंगे।

इस तथ्य को और स्पष्टता से समझना हो तो इसे इस तरह समझिए कि 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा का मत प्रतिशत लोकसभा में उसे मिले 19.6 प्रतिशत मतों से 2.6 प्रतिशत बढ़कर 22.2 प्रतिशत हो गया था। ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि लोकसभा के 80 के बजाय विधानसभा के 403 प्रत्याशी अपने लिए वोट जुटा रहे थे। बसपा का परम्परागत वोट बैंक तो उतना ही था।

इसके अलावा मतपत्र पर से गायब हाथी का चिन्ह भी बसपा के 2-3 प्रतिशत परंपरागत वोटबैंक को उदासीन करेगा। अर्थात पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा को मिले 19.6 प्रतिशत मतों का स्थानांतरण सपा को होने का सपना देख रहे शेखचिल्ली चुनावी विशेषज्ञों के अफलातूनी आकलनों के बजाय महागठबंधन की बसपा रहित 42 सीटों पर 2014 में बसपा को मिले 19.6 प्रतिशत मतों के बजाय अधिकतम 14-15 प्रतिशत मतों का स्थानांतरण ही सम्भव होगा।

यह स्थिति भी तब होगी जब महागठबंधन की अंदरूनी राजनीतिक स्थितियां शतप्रतिशत अनुकूल रहेंगी। जिसकी संभावनाएं फिलहाल न्यूनतम हैं।

शेष कल…

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