मर्डर प्रदेश (MP) का मैसेज

आज 25 जनवरी 2019 तक मध्यप्रदेश में हत्या के पांच मामले तो मीडिया में दर्ज हुए ही हैं, लोग और भी संख्या बता रहे हैं। सभी भाजपा या संघ से संबन्धित बताए जा रहे हैं। कहीं यह जान बूझकर कानून के दायरे में खेला जानेवाला जानलेवा खेल तो नहीं?

आइये समझते हैं, यह कैसे हो सकता है।

किसी भी राज्य में दिन में पाँच-दस मर्डर तो यहाँ वहाँ होते ही हैं। इनके कई कारण होते हैं। कोई झगड़ा अचानक हिंसक हो जाता है और उसका अंत हत्या में हो जाता है। कभी बिज़नस के कुछ कारणों से बात बिगड़ती है…

कभी पुरानी रंजिश, कहीं प्रॉपर्टी का मामला, कहीं इश्क या अवैध संबंध, कारण ही गिनवाने जाएँ तो कारणों से ही लेख भर जाएगा, इच्छा है तो किसी पुलिस कर्मचारी से पूछ लें, वे बताएँगे कितने कारणों से मर्डर हो जाते हैं हर रोज़।

यहाँ बात आती है कि पुलिस हत्या का कारण क्या दर्ज करती है। मारे जाने वाले सभी व्यक्ति भाजपा या संघ के किसी आनुषंगिक संगठन से जुड़े थे यही बात इन सभी हत्याओं में कॉमन है। लेकिन कोर्ट में पुलिस रेकॉर्ड की ही बात आएगी।

राजनैतिक हत्या का आरोप कोर्ट में एक सेकंड भी नहीं टिकेगा। सभी लोग अपने अपने फील्ड में एक हैसियत रखते थे और इसी से, हत्या के लिए कारण कुछ भी बताया जा सकता है, हत्यारों की पहचान न हुई तो केस भी पेंडिंग रहेगा, किसी नेता पर भी कोई आरोप नहीं लग सकेगा, किसी मंत्री की बात ही दूर।

कई जगह पढ़ने को मिल रहा है कि वहाँ सरकारी तंत्र से जुड़े लोगों को पंद्रह साल तक उपवास सा महसूस हो रहा था, अब वे पार्टी करने के मूड में हैं। इससे अलावा बिना सबूत कुछ कहा नहीं जाना चाहिए, इसलिए उकसाने वाले कमेन्ट करने से बचें, उत्तर देने की आश्वस्ति नहीं, डिलीट भी हो सकते हैं। कानून के दायरे में रहना सेफ है सब के लिए।

लेकिन ऐसी हत्याओं से, संबन्धित विपक्ष में अलग मैसेज चला जाता है। यह साल के शुरुआत में ही मास्टर जी ने किसी की पैंट गीली होने तक पिटाई करनेवाला संदेश चला जाता है। मास्टर के लिए क्लास में शांति रहती थी, यहाँ संबन्धित विपक्ष दहशत में जीता है।

राजनीति में है तो उन्हें उतनी तो जानकारी होती ही है कि जब तक पुलिस के रेकॉर्ड पर इन्हें राजनैतिक हत्या माना नहीं जाता और अन्य कारणों में दर्ज किया जाता है; हत्याओं की संख्या इतनी भी बिलकुल नहीं है कि कानून और सुव्यवस्था खतरे में होने की बात कर के राज्यपाल राष्ट्रपति से बात करे।

केवल मर्डर्स की संख्या की बात करें तो इतने मर्डर्स बिलकुल नॉर्मल होते हैं। केंद्र कुछ करे भी तो कोर्ट से घुड़की मिलेगी, अत: केंद्र सरकार भी मजबूरन शांत है।

इसमें सोशल मीडिया में ऐसे लोग सक्रिय हो जाएँगे जो जान बूझकर भाजपा के समर्थकों को चिढ़ाएंगे कि भाजपा नपुंसक पक्ष है जो अपने समर्थकों को मरने दे रहा है। रोज़ आप के लोग मारे जा रहे हैं और ये हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं, सरकार बर्खास्त भी नहीं करते।

ये लोग कथित तौर पर किसी पार्टी से संलग्न नहीं दिखाई देते लेकिन सहानुभूति का नाटक करते या फिर खुद को निष्पक्ष बताकर ताने देते रहते हैं। इनका काम केवल नकारात्मक भावना फैलाना होता है, किसी बात के लिए उनके पास कोई समाधान नहीं होता।

धीरे धीरे इनकी चलायी यही बात पार्टी समर्थकों में भी फैलने लगती है, उन्हें भी लगने लगता है कि ऐसे संगठन से जुड़े रहने का क्या लाभ जो अपने लोगों को बचाने के लिए सरकार बर्खास्त नहीं करता।

ये ‘ताना ब्रिगेड’ जैसे ही नकारात्मकता को सूँघती है, और भी रंग में आ जाती है। कुछ भी ऊलजलूल बोल देते हैं, उनका हेतु ही उकसाना होता है। किसी का नाम लेने की आवश्यकता नहीं, ऐसों को पढ़ा सब ने हैं। कुछ बरगलाने वाले हैं, कुछ बरगलाए हुए हैं। यह फर्क भी करना चाहिए, अपनों को घर लौटने दें, संख्या की आवश्यकता है।

वैसे बहुत नहीं मारे जाएँगे लेकिन कुछ हत्याएँ और हो सकती हैं। वैसे भी किसी भी बड़े राज्य में रोज दस बारह मर्डर्स तो होते ही हैं।

हाँ, इन सभी जगहों से पोस्ट्स पर लाइक या सहमति के कमेन्ट बंद हो गए हैं लगभग। ऐसा नहीं कि देख नहीं रहे होंगे। लेकिन उपस्थिति दर्ज करने से बच रहे हैं। कई लोग फोन पर भी पहले जैसी बात नहीं कर रहे, जल्द समेट देते हैं। आवाज़ में भाव पहले जैसा नहीं रहता, जान सब को प्यारी होती है।

और लेख में सब कुछ क्या लिखें? मित्रों की सुरक्षा अपने कारण खतरे में न आए इतना तो है ही।

धैर्य रखें, विचलित न हों, भड़काऊ या उकसाने वाले कमेंट्स को जवाब देने से बचें। एक गुजराती कहावत है – न बोलने में नौ गुण होते हैं।

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