भारत माता की जय और वन्दे मातरम का विरोध निश्चित तौर पर है राष्ट्र का विरोध


ख़बर है कि गणतंत्र दिवस पर देवबंदी उलेमा ने ये फ़ैसला किया है कि वह वंदे मातरम और भारत माता की जय के नारे नहीं लगाएंगे। नारे न लगाने के पीछे उन्होंने तर्क दिया है कि भारत माता की जय में एक मूर्ति का रूप आता है, और भारत माता की जय बोलने का अर्थ है कि मूर्ति की जय बोलना, जबकि इस्लाम के अनुसार केवल अल्लाह की इबादत की जा सकती है।

ये बात बहुत ही हास्यस्पद लगती है कि कैसे हिंदुस्तान ज़िदाबाद यानि हिंदुस्तान की ज़िन्दगी आबाद करने की बात करना और भारत माता का गुणगान करना अलग हो सकता है और इनमें से किसी एक काम को इस्लाम की अनुमति भी नहीं मिलती। मदरसा जामिया हुसैनिया के वरिष्ठ उस्ताद मुफ्ती तारिक कासमी ने कहा कि इस्लाम में अल्लाह के सिवा किसी और की इबादत नहीं की जाती है, जबकि भारत माता की जय में एक मूर्ति का रूप आता है इस कारण भारत माता की जय नहीं बोल सकते और यह मुसलमान के लिए जायज़ भी नहीं है।

अब ज़रा गौर फरमाइए , इस्लाम में अल्लाह के अलावा और किसी की इबादत की मनाही है, यानि और किसी की पूजा करना मना है, मगर भारत माता जो पुरे भारत देश का प्रतीक हैं, उनकी जय जयकार करने को मना किया गया है। यह सामान्य समझ से परे है कि क्या कोई धर्म या पंथ किसी देश की जय जयकार करने से मना कैसे कर सकता है? अल्लाह की इबादत करने का मतलब है अल्लाह की स्तुति करना, अल्लाह के लिए ध्यान लगाना, मगर भारत माता की जयकार करने का मतलब माँ भारती का स्मरण, जिसका मतलब किसी देवी का स्मरण तो नहीं है, बल्कि देश के उन योद्धाओं का स्मरण है जो देश के लिए शहीद हो गए, जो देश की आज़ादी के लिए, देश के निर्माण के लिए अनेकों वेदियां चढ़ गए।

गौर फरमाने वाली बात यह भी है कि मुफ्ती तारिक कासमी ने कहा कि माता की जय में एक मूर्ति का रूप आता है इस कारण भारत माता की जय नहीं बोल सकते और यह मुसलमान के लिए जायज भी नहीं है, यानि वे भारत माता की कल्पना एक मूर्ति के रूप में करते हैं, मगर यदि मूर्ति की स्तुति करना भी इस्लाम के अनुसार जायज़ नहीं है, तो क्यों गाँधी,आंबेडकर की मूर्ति पर अनेकों मुस्लिम भी पुष्प चढ़ाते हैं, क्यों नहीं दारूल उलूम उस पर भी फ़तवे जारी करता? यह बात सही है कि केवल नारे लगा देने से देशभक्ति नहीं साबित होती, मगर क्या नारे न लगाने से धर्म की भक्ति हो सकती है?
क्यों हम यह फैसला जनता पर नहीं छोड़ देते कि वह कौन से लगाएगी और कौन से नहीं ? क्यों हम विशेषतः नारों के ख़िलाफ़ फ़तवे जारी कर रहे हैं ? क्यों हमारे मदरसों में अच्छी शिक्षा प्रणाली पर हम प्रयास नहीं कर सकते ?

ये अच्छी बात है कि मदरसों में हिंदुस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाए जायेंगे, देश के लिए शहीद होने वालों की वीरगाथाएं सुनाई जाएँगी, मगर ऐसे समय में उस नारे पर प्रतिबन्ध लगाना जो उन वीरों ने लगाए थे, जो उन वीरों की ज़ुबानी थी, एक पूरी पीढ़ी को ग़लत शिक्षा देना है। ‘भारत माता की जय’ नारे को या वन्दे मातरम पर प्रतिबन्ध लगाने का अर्थ है हिंदुस्तान ज़िंदाबाद और इन नारों में फर्क बताना। जबकि ये सब एक ही भाव को प्रसारित कर रहे थे।

जहाँ एक ओर ‘भारत माता की जय’ नारे को प्रतिबंधित किया गया है, वहीं वन्दे मातरम पर भी प्रतिबन्ध लगाया गया है। वन्दे मातरम किसी भगवान् की स्तुति नहीं बल्कि इस धरती का वंदन है, और किसी संप्रदाय मात्र से बढ़कर यह पूरे राष्ट्र का गीत है, फिर भी राष्ट्रगीत पर प्रतिबन्ध लगाना यानि देश के संविधान के विरूद्ध जाना। हमारे उन संविधान बनाने वालों के विरूद्ध जाना जिन्होंने एक स्वर में वन्दे मातरम को राष्ट्र गीत के रूप में स्वीकारा था।

वन्दे मातरम पर प्रतिबन्ध लगाना, भारत माता की जय जैसे नारों पर प्रतिबन्ध लगाकर, अंग्रेज़ों के सामान नीति अपनाने का प्रदर्शन होगा। एक पूरी पीढ़ी को वन्दे मातरम के विरुद्ध तैयार कराना, राष्ट्र गीत के विरूद्ध तैयार कराना, संविधान के विरूद्ध तैयार कराना है। राष्ट्रगीत न गाना, भारत माता की जय स्वयं न गाना राष्ट्रद्रोह नहीं होगा, मगर सामूहिक तौर पर इन्हें गाने या नारे लगाने से रोकना, एक पीढ़ी को संविधान के नियम से द्रोह करने के लिए प्रोत्साहित करना है, और ऐसे में यह किसी राष्ट्रद्रोह से कम होगा।
सन्दर्भ

https://www.amarujala.com/uttar-pradesh/meerut/saharanpur-deobandi-ulama-says-on-republic-day-vande-mataram-and-bharat-mata-jai-will-not-say-hail?pageId=1

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