तो क्या नेताजी….?

स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक मात्र चीज़ जिसकी सर्वाधिक कीमत चुकाई गई वो है “आज़ादी” जिसे पाने के लिए असंख्य-असंख्य हुतात्माओं की आहुति देनी पड़ी, ना जाने कितने सीने गोलियों से छलनी हुए, कितने फांसी के फंदों पर झूले, कितनों का खून बर्फ़ की सिल्लियों पर पड़े-पड़े पानी हो गया, कुछ कालापानी में कोल्हू के बैल बने पिरते रहे और कुछ जलियाँ वाला बाग़ के कुँओं में दफ्न हो गए…

तब जाकर असंख्य बलिदानियों की चिता की राख, स्वेद और रक्त से सनी ये भारत भूमि वीर भोग्या वसुंधरा कहलाई, पर क्या वाकई में इस वसुंधरा को वीरों ने भोगा है? नहीं… वो तो काल-कवलित हो गए इसकी रक्षा करते-करते, इस वसुंधरा को तो वास्तव में भोगा उन्होंने, जो साबरमती के आश्रम में चरखा चलाकर सत्य के प्रयोग करते रहे और उन प्रयोगों की सफलता के बाद महात्मा की उपाधि से विभूषित हुए, या वो जो बिड़ला हाउस में बनी शानदार जेलों में मसनद लगाए “भारत एक खोज” लिखते रहे, और अपनी अचकन को बलिदानियों के खून से सींची हुई क्यारी के सुर्ख गुलाबों से सजाते रहे…. खैर…

माँ भारती के असंख्य पुत्रों में एक ऐसा भी हुआ जिसने भगवान् कृष्ण के गीता ज्ञान को आत्मसात करते हुए आज़ादी पाने के लिए हर जायज़ रास्ते को अपनाने का माद्दा दिखाया, जिसे हम नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के नाम से जानते हैं।

नेताजी.. एक ऐसा विराट व्यक्तित्व, जो अपने अदम्य साहस और जिजीविषा से हिटलर जैसे दुरूह शासक को भी भारत की आज़ादी के आन्दोलन से जोड़ लेता है। बाहरी लोगों की मदद से आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन करता है, पर अपने ही देश के नरमपंथी काले अंग्रेज़ों के षड्यंत्रों से लड़ नहीं पाता।

भारत भूमि के साथ एक दुर्भाग्य अनादिकाल से जुड़ा रहा, जहां भाग्य ने उसके हितचिंतकों से ज़्यादा उसके दुश्मनों का साथ दिया। नेताजी भी इसी दुर्भाग्य से आजीवन लड़ते रहे, Congress के अध्यक्ष बनने पर भी वो कभी अपनी मर्ज़ी का कोई निर्णय नहीं ले सके, ये वो समय था जब दुनिया पर द्वितीय विश्वयुद्ध के बादल मंडरा रहे थे।

सुभाष बाबू ने अंग्रेज़ों को 6 महीने के अन्दर भारत छोड़ देने का अल्टीमेटम दिया, पर अपने इस निर्णय के लिए उन्हें गांधी समेत अन्य सभी Congress नेताओं के विरोध का सामना करना पड़ा । Congress से मोहभंग हुआ तो नेताजी इस्तीफ़ा देकर Congress से हमेशा-हमेशा के लिए दूर हो गए और फ़ॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की…

उन्होंने द्वितीय विश्वयुध्द में अंग्रेज़ों द्वारा भारतीय संसाधनों के उपयोग के खिलाफ आन्दोलन खड़ा किया, जिसे व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हुआ और परिणाम स्वरूप उन्हें कलकत्ता में नज़र बंद कर लिया गया।

जनवरी 1941 में वो अपने घर से छुपकर भागने में सफल हुए और अफगानिस्तान के रास्ते जर्मनी पहुँच गए। जर्मनी और जापान की मदद से रेडियो बर्लिन का आगाज़ किया, 1943 में वो जर्मनी से सिंगापुर आ गए और आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना की और अंडमान-निकोबार को आज़ाद किया।

आज़ाद हिन्द फ़ौज बर्मा की सीमा को पार कर भारत भूमि पर पहुँच गई। नेताजी की कोशिशें रंग लाने लगी थीं, भारत में उनकी लोकप्रियता दिनों दिन बढ़ती जा रही थी। Congress की आज़ादी के लिए अपनाई गई ढुलमुल कोशिशें जनता से छुपी नहीं थीं, वहीं विदेशी भूमि से माँ भारती के सपूत के आज़ाद हिन्द फ़ौज के गठन की खबरें रेडियो के माध्यम से भारत की जनता तक लगातार पहुँच रही थी, भारत के जनमानस में अब एक बात स्पष्ट होने लगी थी अगर निकट भविष्य में भारत को आज़ादी मिलती है तो वो नेताजी की कोशिशों का नतीजा होगा, ना कि Congress के नेताओं की…

बस यहीं से Congress के लबरगट्टूओं के कान खड़े होने लगे, नेहरु को अपना स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बनने का स्वप्न ध्वस्त होता दिखाई देने लगा और फिर हुई रचना उस षड्यंत्र की जिससे नेताजी पार नहीं पा सके…

दरअसल आज़ाद हिन्द फ़ौज के भारत में प्रवेश के दो रास्ते थे एक अंडमान और निकोबार का रास्ता और दूसरा गिलगित बाल्टिस्तान का रास्ता….गिलगित बाल्टिस्तान का इलाका सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण था जिसकी सीमायें पश्चिम में खैबर-पख्तून, उत्तर में अफगानिस्तान के वाखन गलियारे, उत्तरपूर्व में चीन के सिन्जियांग प्रांत और दक्षिणपूर्व में भारत के जम्मू और कश्मीर राज्य से लगती थीं.

अंग्रेज़ों ने ये इलाका महराजा हरिसिंह से लीज़ पर हासिल कर लिया था इस कारण इस रास्ते से आज़ाद हिन्द फ़ौज के प्रवेश की सारी संभावनायें क्षीण थीं। नेहरु ने माउन्ट बैटन से मिलकर नेताजी को रोकने कि हर संभव कोशिश की, मजबूरन नेताजी अंडमान के रास्ते भारत पहुंच उसे कब्जा किया, अंतरिम सरकार का गठन हुआ, दुनिया के नौ देशों ने इस सरकार को मान्यता दी, आज़ाद भारत की पहली मुद्रा भी छापी गई, पर दुर्भाग्य ने भारत का पीछा नहीं छोड़ा और विश्व युद्ध में जापान और जर्मनी की हार के साथ ही भारत की आज़ादी का स्वप्न भी टूट गया…

और फिर सन ४1945 में ताइवान से नेताजी की प्लेन क्रेश में दुखद मृत्यु की खबर आई, इतिहासकार मानते हैं कि ये खबर संभव है नेताजी ने खुद ही फैलाई थी, जिससे अंग्रेजों को बेखबर किया जा सके, वो रूस जाना चाहते थे। नेताजी उस विमान में नहीं थे ये बात अंग्रेजों के माध्यम से नेहरु को भी पता चल चुकी थी, नेताजी रूस पहुंचे जहाँ नेहरु के कहने पर स्टालिन ने धोखे से उन्हें कैद कर लिया।

भारत में अंग्रेज़ों और नेहरू एंड कंपनी ने नेताजी की मृत्यु की खबर को खूब प्रचारित किया क्योंकि यही उनके हित में था। सन 1952 में भारतीय राजदूत सर्वपल्ली राधाकृष्णन द्वारा नेताजी को साइबेरिया की जेल में देखा जाना, भारत आकर नेहरु को ये बात बताना, और फिर चुप्पी साधने के बदले भारत का उपराष्ट्रपति बना दिया जाना, ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री रहस्यमयी मृत्यु का होना, वियतनाम यात्रा पर वियतनाम सरकार के द्वारा नेताजी के वियतनाम में जीवित होने से जुड़े प्रमाण सौंपने पर पी.व्ही.नरसिम्हा राव का स्थाई मौन साध लेना, ये सारी कड़ियाँ जुड़ने पर एक ही बात प्रमाणित करती हैं कि ना सिर्फ अंग्रेज़ बल्कि नेहरु समेत सारे कांग्रेसी नेताजी की प्रतिभा, अदम्य साहस, वैश्विक और भारतीय जनमानस में लोकप्रियता से इस कदर भयाक्रांत थे कि उनके जीवित होने के हर सबूत को ज़मींदोज़ करने के लिए उन्होंने अपनी सारी ऊर्जा और तंत्र का हर संभव दुरूपयोग करने में कोई संकोच नहीं किया और वो अपनी इस रणनीति में सफल भी रहे….

पर सत्य किसी से छुपा नहीं है कि भारत की जनता के हृदय में नेताजी जीवित थे, जीवित हैं और जीवित ही रहेंगे…. हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा जब नेताजी के सम्मान में अंडमान और निकोबार का नाम परिवर्तन किया गया, उक्त समारोह में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा नेताजी अमर रहे की जगह नेताजी ज़िंदाबाद के नारे लगवाना, अपने आप में बहुत कुछ कहता है. ध्यातव्य है कि ज़िंदाबाद के नारे जीवित व्यक्तियों के लिए लगाए जाते हैं और मृत व्यक्तियों के सम्मान में अमर रहें कहा जाता है।

यक़ीनन देश के प्रधानमंत्री के रूप में उनकी जानकारी हम सबसे अधिक ही होगी, तो क्या प्रधानमंत्री मोदी ने नेताजी जिंदाबाद के नारे लगवाकर भारत की जनता के साथ कोई छुपी हुई जानकारी साझा की है क्योंकि सरकारी नियम कहता है कि जब तक किसी व्यक्ति की मृत्यु की प्रामाणिक पुष्टि ना हो जाए उसे सरकारी दस्तावेजों में जीवित माना जाता है…

तो क्या नेताजी….?

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