कुम्भ का महात्मय

साल 2019 शुरू होते ही शुरू हो गया हिन्दू धर्म का सबसे बड़ा, सबसे भव्य समागम, सबसे भव्य एकत्रीकरण- कुम्भ मेला। एक स्थान पर 12 वर्षों में एक बार लगने वाला कुम्भ मेला इस बार त्रिवेणी संगम के तट पर बसे प्रयागराज में लगा है।

कुम्भ मेले में अब तक माननीय राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, राज्य स्तरीय मंत्री इत्यादि आ चुके हैं। जहां भी सुनें अभी तो केवल कुम्भ की ही चर्चा है, मगर आख़िर में ऐसा है क्या कुम्भ मेला कि इसकी चर्चा सर्वत्र हो रही है?

कुम्भ के महात्मय को समझने के लिए, इसकी विशालता को जानने के लिए इसकी कहानी समझनी ज़रूरी है।

आइए जानते हैं कुम्भ को।

कुम्भ का शाब्दिक अर्थ है कलश, और कुम्भ की कहानी शुरू होती है समुद्र मंथन से। समुद्र मंथन में कुल 14 रत्न निकल कर आये और देव दानवों ने दोनों बराबर बराबर बांट लिए मगर, अंत में जब धन्वन्तरि अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए तो इस पर विवाद छिड़ गया और युद्ध की स्थिति उत्पन्न हुई।

तब ऐसे में भगवान विष्णु मोहिनी रूप लेकर आये, दानवों से कलश लिया और देवताओं को अमृत पान कराने की तैयारी शुरू की। अमृत पिलाने का जिम्मा इंद्र पुत्र जयंत ने लिया। दानवों से अमृत की रक्षा करके जब जयंत कलश लेकर जा रहे थे तो कलश से अमृत की चार बूंदें पृथ्वी पर गिरी। जहां ये बूंदें गिरी वे स्थान हैं हरिद्वार, नासिक, उज्जैन और प्रयागराज। इन्हीं स्थानों पर कुम्भ मेला लगता है।

भगवान विष्णु के आदेश से कलश की रक्षा सूर्य, चंद्र, बृहस्पति एवं शनि भी कर रहे थे और विभिन्न राशियों में इनके विचरण के कारण कुम्भ पर्व का समय भी तय हुआ। जयंत को अमृत कलश स्वर्ग ले जाने में 12 दिनों का समय लग गया, और देवताओं के एक दिन को एक वर्ष के समान मानते हैं, तो ऐसे में कुम्भ मेला एक स्थान पर 12 वर्ष में लगता है।

क्यूंकि कुम्भ मेले के लगने का समय ज्योतिष के हिसाब से तय होता है तो एक बार उसे भी जान लें कि किस स्थान पर कब कुम्भ लगता है।

बृहस्पति के कुम्भ राशि में तथा सूर्य के मेष राशि में प्रविष्ट होने पर हरिद्वार में गंगा-तट पर कुम्भ पर्व का आयोजन होता है।

बृहस्पति के मेष राशि चक्र में प्रविष्ट होने तथा सूर्य और चन्द्र के मकर राशि में आने पर अमावस्या के दिन प्रयागराज में त्रिवेणी संगम तट पर कुम्भ पर्व का आयोजन होता है।

बृहस्पति एवं सूर्य के सिंह राशि में प्रविष्ट होने पर नासिक में गोदावरी तट पर कुम्भ पर्व का आयोजन होता है।

बृहस्पति के सिंह राशि में तथा सूर्य के मेष राशि में प्रविष्ट होने पर उज्जैन में शिप्रा तट पर कुम्भ पर्व का आयोजन होता है।

कुम्भ मेले में आप भारत की प्राचीनतम संस्कृतियां, धरोहरें, रीति रिवाज़ व उनमें विविधताएं देख सकते हैं। अगर यह कहें कि कुम्भ मेला भारत की विशालतम संस्कृतियों को एक सूत्र में जोड़ने वाला है, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

अगर इतिहास में जाएं तो सबसे पहले चीनी यात्री ह्वेनसांग ने कुम्भ का वर्णन किया है, जिसे राजा हर्षवर्धन (सन् 664) के साथ जोड़ा है। राजा हर्षवर्धन रेत पर एक महान पंचवर्षीय सम्मेलन का आयोजन करते थे, जहां पवित्र नदियों का संगम होता है और अपनी सम्पत्ति कोष को सभी वर्गो के गरीब एवं धार्मिक लोगों में बाँट देते थे। इस व्यवहार का अनुसरण उनके पूर्वजों के द्वारा किया जाता था।

वहीं कुछ कहानियां यह भी कहती हैं कि 8वीं शताब्दी के महान दार्शनिक आदि गुरु शंकराचार्य ने वाद विवाद एवं विवेचना हेतु विद्वान संन्यासीगण की नियमित सभा संस्थित की।

बहरहाल, आध्यात्मिक और ज्योतिषी विषय आज के समाज में लोगों को कम प्रासंगिक लगते हैं, इसलिए इसके ऐतिहासिक महत्व को जानने के बाद अब हम जानते हैं कि इसका सामाजिक महत्व क्या है, और किस प्रकार से कुम्भ मेला समाज की अवधारणा को अपने अंदर संजोये हुए है।

किसी उत्सव के आयोजन में भारी जनसम्पर्क अभियान, प्रोन्नयन गतिविधियां और अतिथियों को आमंत्रण प्रेषित किये जाने की आवश्यकता होती है, जबकि कुंभ विश्व में एक ऐसा पर्व है जहाँ कोई आमंत्रण अपेक्षित नहीं होता है तथापि करोड़ों तीर्थयात्री इस पवित्र पर्व को मनाने के लिये एकत्र होते हैं।

कुम्भ मेले में संख्या बल के अतिरिक्त कोई और बात अगर ध्यान देने वाली है तो वो है अखाड़ा। कहा जाता है कि  आदि गुरु शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा हेतु साधुओं के संघों को मिलाने का प्रयास किया था, उसी प्रयास के फलस्वरूप सनातन धर्म की रक्षा एवं मजबूती बनाये रखने एवं विभिन्न परम्पराओं व विश्वासों का अभ्यास करने वालों को एकजुट करने तथा धार्मिक परम्पराओं को अक्षुण्ण रखने के लिए विभिन्न अखाड़ों की स्थापना हुई।

अखाड़ों से सम्बन्धित साधु-सन्तों की विशेषता यह होती है कि इनके सदस्य शास्त्र और शस्त्र दोनों में पारंगत होते हैं। अखाड़ा शब्द को सुनते ही जो दृश्य मानस पटल पर उतरता है वह मल्लयुद्ध का है। किन्तु यहाँ भाव शब्द की अन्वति और वास्तविक अर्थ से संबोधित है। “अखाड़ा” शब्द “अखण्ड” शब्द का अपभ्रंश है जिसका अर्थ न विभाजित होने वाला है।

अखाड़ा सामाजिक व्यवस्था, एकता और संस्कृति तथा नैतिकता का प्रतीक है। समाज में आध्यात्मिक महत्व मूल्यों की स्थापना करना ही अखाड़ों का मुख्य उद्देश्य है। अखाड़ा मठों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सामाजिक जीवन में नैतिक मूल्यों की स्थापना करना है, इसीलिए धर्म गुरुओं के चयन के समय यह ध्यान रखा जाता था कि उनका जीवन सदाचार, संयम, परोपकार, कर्मठता, दूरदर्शिता तथा धर्ममय हो। भारतीय संस्कृति एवं एकता इन्हीं अखाड़ों के बल पर जीवित है। अलग-अलग संगठनों में विभक्त होते हुए भी अखाड़े एकता के प्रतीक हैं। अखाड़ा मठों का एक विशिष्ट प्रकार नागा संन्यासियों का एक विशेष संगठन है। प्रत्येक नागा संन्यासी किसी न किसी अखाड़े से सम्बन्धित रहते हैं। ये संन्यासी जहाँ एक ओर शास्त्र पारांगत थे वहीं दूसरी ओर शस्त्र चलाने का भी इन्हें अनुभव था।

इन अखाड़ों ने कुम्भ का महत्व और भी अधिक बढ़ाया जब विदेशी आक्रांताओं ने हमारे देश की संस्कृति पर हमले शुरू किए। अखाड़ों ने अपना अभ्यास कुम्भ मेले में शुरू किया, और समाज में संस्कार, संस्कृति, शास्त्र व शास्त्र का प्रवाह शुरू किया।

कहा जाता है कि कुंभ मेले में स्नान से मोक्ष की प्राप्ति होती है, इसलिए बहुत से साधु, व्यक्ति विभिन्न तिथियों पर स्नान करते हैं। इन स्नानों में कोई भगदड़ न मचे, और व्यवस्थाएं बनी रहें इसलिए, राजा महाराज इसकी देखरेख करते थे। और इसलिए इन स्नानों को शाही स्नान कहा जाता है। साधु संतों ने कभी किसी काल में कुम्भ को रुकने नहीं दिया, और अपने ही सामर्थ्य से कुम्भ के आयोजन को संभाला।

अनेक विपदाओं भरे काल से गुज़रते हुए, कुम्भ मेला 21वीं शताब्दी में भी समाज व संस्कृति का पुंज है। समाज का संगठन व सौहार्द का भाव स्थापित करता कुम्भ, करोड़ों की संख्या, अनेकों सम्प्रदाय व जात पात से रहित यह कुंभ निश्चित तौर पर लघु भारत का रूप है, जिसमें सभी केवल ईश्वर के भक्त बने नज़र आते हैं।

संदर्भ :

https://kumbh.gov.in/hi/research-on-kumbh

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