अक्ल पर इतना पर्दा क्यों पड़ जाता है इन लड़कियों के?

छत्तीसगढ़ की ये हकीकत है। दैनिक भास्कर की खबर है इसलिए विरोधियों को कुछ कहने की गुंजाइश नहीं कि क्योंकि यह अखबार का भाजपा और खास कर मोदी विरोधी सुर सब देख चुके हैं।

यह खबर (https://bit.ly/2T3OTq9) अपने आप में साफ कहानी कहती है। लगता है मीडियावालों के अंदर कहीं तो किसी बाप के दिल को यह घटना छू गयी जो लड़के का नाम दे दिया है।

ये प्रश्न पूछना है, जो हिन्दू माँ बाप को हिचक या शर्म छोड़कर अपनी बेटियों के साथ डिस्कस करने की आवश्यकता है – तुम्हारे पिता ने कभी भी तुम्हारी माँ की ऐसी फोटो नहीं खींची जब कि अविश्वास का कोई सवाल ही नहीं था, प्रेम पर भी कोई प्रश्नचिह्न नहीं था। और ये लड़कियां प्यार में इतनी अंधी कैसे हो जाती हैं जो ऐसी फोटो भी खींचने देती हैं?

अफेयर्स तो मियों के स्वधर्मियों के साथ भी चलते हैं लेकिन कभी उनके फोटो खींचते नहीं क्योंकि उनको पता है कि वहाँ ऐसी हरकत की तो इनकी ही खाल खींची जाएगी और पुलिस में गायब होने की तक रिपोर्ट नहीं होगी।

अजमेर का कांड जानते ही होंगे। पीड़िताओं का आंकड़ा तो ढाई सौ के ऊपर माना जाता है, असल में पता नहीं कितने थे। सभी रसूखदार काफिर घरों से थीं, काफिर इसलिए कहा है कि सब केवल हिन्दू ही नहीं थीं। लेकिन कोई रसूखदार मुसलमान की बेटी नहीं थी।

आरोपी सालोंसाल फरार हो पाया। बाकी मुसलमान आरोपियों को भी समाज ने बहिष्कृत नहीं किया, लड़कियां तो काफिरों की थीं ना। बहते नाले में स्नान करने कुछ हिदुओं को भी शामिल किया गया था ताकि अकेले मुसलमानों पर दोष न आए। उसमें से एक ने बेल पर बाहर आते ही आत्महत्या कर ली। अपराध बोध था या परिवार का तिरस्कार, कह नहीं सकते।

ऐसे ही, मुंबई के शक्ति मिल रेप कांड में पकड़े गए एक लड़के की माँ उसके नाबालिग होने का सबूत – वह भी संदेहास्पद – ले कर कोर्ट पहुँच गयी ताकि उसकी सज़ा कम हो। बेटे ने जो किया था उसपर उसे कोई मलाल नहीं था। खुद एक स्त्री थी। हो सकता है उसे कोई बेटियाँ भी होंगी। लेकिन दूसरे स्त्री के साथ उसके बेटे ने जो किया था उसपर उसे कोई शर्म नहीं थी, वो बेटे की सज़ा कम करवाने के लिए नाबालिग होने का सर्टिफिकेट लेकर पहुंची।

कोई हिन्दू महिला अपने सामूहिक बलात्कार में रंगे हाथ पकड़े गए बेटे की सज़ा कम करवाने यह करेगी? सर्व धर्म समान होते हैं इस अंधविश्वास को यह भी एक चुनौती है।

अस्तु, बेटियाँ जवान होती हैं तब उनके साथ जो मुद्दे चर्चा करने के होते हैं इसमें यह भी एक जुड़ गया है। बाकी अपने अस्तित्व से दूसरों को सदा समस्या उपस्थित कराते रहना ताकि वे प्रतिक्रिया दें, यह विक्टिम कार्ड खेलने का एक पारंपरिक हथकंडा है। सीख है।

माँ बहनों के साथ लेख अवश्य साझा करें, अपनी बेटियों का प्रश्न है। ‘बेटी बचाएं’ का नारा अधूरा है, पूरा नारा दे नहीं सकते, इन्दिरा ने संविधान में जो ‘सेक्युलरिज़्म’ घुसेड़ दिया है वह पूरा नारा देने के आड़े आता है, लेकिन समझदार लोग समझ सकते हैं कि बेटी बचाएं तो किनसे बचाएं।

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