विपक्ष का चोला ओढ़े, झूठ, छल और कपट का सहारा ले रहा है अभिजात्य वर्ग

अधपकी, बेमेल खिचड़ी विपक्ष की रणनीति अब स्पष्ट हो चुकी है। चूंकि इन्हें पता है कि प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा बनायी हुई नीतियां और किये जाए कार्यो से उनका रचनात्मक विनाश (creative destruction) हो जायेगा।

स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस के शासकों ने एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण किया जिसमें जनता की भलाई और सेकुलरिज़्म के नाम पर अपने आप को, अपने नाते रिश्तेदारों और मित्रों को समृद्ध बना सकें।

अपनी समृद्धि को इन्होंने विकास और सम्पन्नता फैलाकर नहीं किया, बल्कि जनता के पैसे को धोखे और भ्रष्टाचार से अपनी ओर लूट कर किया। यह समझ कई देशों की राजनैतिक और आर्थिक व्यवस्था के अध्ययन और भ्रमण से समझ में आयी।

मैं ज़ोर देना चाहता हूँ कि ऐसी भ्रष्ट व्यवस्था की संरचना जानबूझकर कर की गयी थी, ना कि नासमझी में। उनका पूरा ध्यान अपने आप को और अपने मित्रों को समृद्ध करना था और उन्हें धनी बनाना था। जनता को जानबूझकर गरीब रखना था, क्योंकि गरीब जनता को वह बहला-फुसलाकर, लॉलीपॉप देकर वोट पा सकते थे।

शक्तिशाली अभिजात्य वर्ग अक्सर आर्थिक प्रगति के खिलाफ खड़े हो जाते हैं, क्योंकि वह अपने हित को – अपनी constituency – जैसे कि अपनी सीट, अपना उद्योग, अपना NGO – सुरक्षित रखना चाहते हैं।

उन्हें डर है कि आम जनता अगर सशक्त हो गयी तो उनका रचनात्मक विनाश हो जायेगा। उनकी आर्थिक स्थिति खो जाएगी। उन्हें अपने विशेषाधिकार खोने का डर है। और इसीलिए ‘वे’ ग्रोथ या विकास में बाधा डाल देते है, और हमारी आँखों पर पट्टी।

अतः बेमेल विपक्ष प्रधानमंत्री मोदी से निपटने के लिए चार रणनीतियों का सहारा ले रहा है।

प्रथम, सफ़ेद झूठ बोलकर मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार का ठप्पा लगाना या फिर उनकी विश्वसनीयता को चोट पहुंचना। इस रणनीति के तहत रफाल लड़ाकू विमानों की खरीद पर जान-बूझकर झूठ का सहारा लेना और बेबुनियाद आरोप लगाना कि इस डील में भ्रष्टाचार हुआ है।

इसी प्रकार, जस्टिस लोया की हृदयगति से निधन को षड्यंत्र बताना, जबकि हार्ट अटैक के समय उनके साथ दो सहयोगी जज उपस्थित थे। इसी श्रेणी में अमित शाह के पुत्र, अजित डोवाल के पुत्र, अरुण जेटली पर दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन में भ्रष्टाचार के झूठे आरोप भी आते हैं।

द्वितीय, भारत के लोकतान्त्रिक संस्थानों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाना और यह कहना कि इन संस्थानों की मिलीभगत से ही एक गरीब, अति सामान्य परिवार का पुत्र सत्ता में आया। इस श्रेणी में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की प्रेस कांफ्रेंस, EVM को हैक करने का असत्य आरोप, सीबीआई निदेशक की नियुक्ति और फिर हटाने पर प्रश्नचिह्न जबकि इस प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश भी सम्मिलित है, RBI पर फ़ालतू का बखेड़ा खड़ा करना, GST की मीटिंग में कर प्रस्तावों पर सहमति देना, लेकिन बाहर आकर मोदी सरकार को बदनाम करना इत्यादि आते हैं।

एक तरह से विपक्ष चाहता है कि संवैधानिक संस्थाए घबरा कर समर्पण कर दें और उन्हें कागज़ी बैलट पेपर के द्वारा वोटों की लूट या फिर सुप्रीम कोर्ट में किसी फर्जी केस में सरकार को शर्मिंदा या कमज़ोर करने का अवसर मिले। नोट करिये कि राम मंदिर, EVM की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह, रफाल, आधार कार्ड, सीबीआई निदेशक, क्रिस्चियन मिशेल, लोया इत्यादि केसों में कांग्रेस के वकील ही सामने क्यों है?

तृतीय, बेमेल, पारस्परिक विरोधी और अनैतिक गठबंधन बनाना और यह आशा करना कि गठबंधन वाली पार्टियों का कुल वोट भाजपा के वोट से अधिक होगा।

चतुर्थ, भाजपा के कोर समर्थकों को विभाजित करना या उनके मन में हृदय से प्रिय मुद्दों के बारे में मोदी सरकार की प्रतिबद्धता के बारे में संदेह उत्पन्न करना। इस श्रेणी में राम मंदिर निर्माण की कोर्ट द्वारा सुनवाई में जानबूझकर अड़चन पैदा करना, तीस वर्ष पुराने SC एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट की मदद से कटुता फैलाना, सर्जिकल स्ट्राइक के बारे में सबूत मांगना, सबरीमाला में विशेष आयु की महिलाओं का प्रवेश करवाना (जिससे कोर समर्थको के आत्मसम्मान पर चोट लगे जिसके लिए वे मोदी सरकार को दोषी ठहराएंगे), JNU में भारत के टुकड़े की मांग करने वालो का समर्थन करना (जिससे कोर समर्थको को तुरंत कार्रवाई ना होने पर निराश होना पड़े) जैसी करतूतें शामिल हैं।

यह चुनाव विपक्ष का चोला ओढ़े अभिजात्य वर्ग के अस्तित्व का सवाल है। तभी वे झूठ, छल, कपट का सहारा ले रहे हैं, न कि चुनाव जीतने के लिए वे यह बतला रहें हैं कि उनकी नीतियां क्या होंगी।

इनसे सतर्क रहिये और प्रधानमंत्री मोदी पर विश्वास बनाये रखिये… क्योंकि विश्वास की कोई काट नहीं है।

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