क्या हम जानते हैं अपने पतन का कारण?

सुनते पढ़ते हैं कि काशी ने अनेक नामी हिंदी लेखक दिए हैं।

इन तथाकथित महान लेखकों में से क्या किसी ने काशी के हृदय बाबा विश्वनाथ मंदिर के उन घावों पर कलम चलाई है जो उसे मुग़ल काल में मिले थे? नहीं।

पास में ही लेखकों की नगरी प्रयागराज है, जिसे अपना यह पौरणिक नाम अभी अभी पुनः प्राप्त हुआ है, क्या इस बौद्धिक नगर के किसी बुद्धिजीवी ने इतिहास के इस काले अध्याय पर कागज़ काले किये हैं? नहीं।

यही नहीं, पूरे उत्तर भारत के लेखक इस विषय पर मौन नजर आते हैं।

मगर सुदूर दक्षिण के भैरप्पा ने इस का विस्तृत वर्णन अपने ऐतिहासिक उपन्यास ‘आवरण’ में किया है, जिसे कल रात मैंने पढ़कर जब समाप्त किया तो फिर सो नहीं पाया।

ऐसे कटु सत्य लिखे नहीं जाते शायद इसीलिए हिन्दुस्तान का बहुसंख्यक समाज सोया हुआ है।

या यूं कहा जाए कि इसे लिखने नहीं दिया जाता जिससे हिन्दुस्तान सोया रहे और दूसरे अपना चाहा-अनचाहा काम आसानी से करते रहें।

सो तो उपन्यास की नायिका भी नहीं पाई थी जब उसने इन कटु सत्य को देखा पढ़ा।

जबकि यह वही नायिका है जो लवजिहाद की शिकार है।

मैं पहले भी लिख चुका हूँ कि यह उपन्यास हर उस को पढ़ाया जाना चाहिए जो लवजिहाद की अभी शिकार तो हुई है मगर निकाह से बची हुई है। शायद पढ़कर हमेशा के लिए बच जाए।

इस उपन्यास में कोई नायक नहीं है। और जो हैं भी, वे महाराणा प्रताप, शिवाजी और छत्रसाल ही हैं।

ठीक भी तो है उसके बाद भारत में नायक हुए भी कहाँ।

हाँ, उपन्यास में खलनायक दो दो हैं। एक तो वही है जो लवजिहाद करता है, मगर असली खलनायक है एक हिन्दू प्रोफ़ेसर (काल्पनिक)।

यह कोई सामान्य खलनायक प्रोफ़ेसर नहीं बल्कि डॉन है।

यह असल में सेक्युलर वामपंथी बुद्धिजीवियों का प्रमुख है।

यह कितना घातक हो सकता है इसका अनुमान आम जन सहजता से नहीं लगा सकता, वो कितना घृणित हो सकता है इसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता, बस इतना मान लीजिये कि ये क्रूर मुग़ल शासकों से अधिक हानिकारक है हिन्दू और हिंदुस्तान के लिए।

उपन्यास को पढ़ने के बाद यह समझने में आसानी होती है कि इस गिरोह को कौन लोग पालते हैं और क्यों पोषित करते हैं।

इसमें उन प्रश्नों का जवाब भी है, जो मैंने ऊपर पूछे हैं कि लेखकों ने मंदिरों के तोड़े जाने पर कलम क्यों नहीं चलाई।

मेरी बात समाप्त नहीं हुई है…

हाँ, भैरप्पा का उपन्यास ‘आवरण’ ज़रूर समाप्त हुआ है।

मगर आगे कतार में वीर सावरकर का ‘मोपला’ है और फिर उसके बाद गोडसे की दृष्टि से गांधी को देखूंगा।

मेरे अध्ययन-लेखन की यह कैसी विडंबना है कि मैं आजकल अपने लेखन के लिए वैदिक ग्रंथों का जब अध्ययन कर रहा हूँ तब बीच के खाली समय में उपरोक्त साहित्य पढ़ रहा हूँ।

एक तरफ तो मैं आर्य होने के अभिमान में डूबकर लिखता हूँ लेकिन जब दूसरी तरफ वर्तमान में आकर उपरोक्त उपन्यासों में हिन्दुओं का पतन देखता हूँ तो इस विरोधाभास में अंदर से टूट जाता हूँ।

क्या हम अपने पतन का कारण जानते हैं?

नहीं।

सत्य तो यह भी है कि हमें इतिहास के सच को जानने नहीं दिया जा रहा।

कहा जाता है कि इन वीभत्स सच से समाज की शांति भंग होगी।

लेकिन क्या झूठ से कभी शांति स्थापित होती है?

कभी नहीं, बल्कि एक झूठ कई झूठ को और फिर अंत में भ्रम पैदा करता है।

मगर हमें भ्रम में रखकर शांति का पाठ पढ़ाकर सोते रहने के लिए मजबूर ही तो किया जा रहा है।

अगर हम जागते होते और इतिहास के सच को जानते होते तो शायद फिर कश्मीर के अनेक मंदिर पिछली सदी में नहीं टूटते।

यह टूटने की सिलसिला अभी रुका नहीं है।

सबरीमाला की परम्परा तोड़ने का षड्यंत्र उसी लम्बी कड़ी का एक हिस्सा है।

ईश्वर करे कि अब और मंदिर ना टूटें।

लेकिन अगर हम सोते रहे तो यह टूटते रहेंगे।

और एक दिन ऐसा आएगा जब कोई भैरप्पा नहीं बचा होगा, सबरीमला की व्यथा को लिखने वाला।

और फिर मेरे जैसे सनातनी लेखकों का लेखन, कोई खिलजी या फिर कोई तैमूर जो आजकल घर घर पैदा हो रहा है, किसी नालंदा में उसे जला चुका होगा।

तब तक हिन्दू, शांति की चाशनी में लिपटा सेक्युलरिज़्म का ज़हर, चाटते चाटते हुए सोया नहीं होगा, बल्कि सोते सोते मर चुका होगा।

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