…और जिन्हें सबूत चाहिए वे भी सिनेमा घर में उरी देखने जाएं

फ़िल्म रिलीज़ होने के 10 दिनों के बाद, आज मैंने उरी देखी। बिना हाइपर नेशनलिस्ट बने, बिना विक्की कौशल का फैन बने, मैंने समीक्षाएं पढ़ी, इंतज़ार किया और फ़िल्म देखते वक़्त और देखने के बाद जो विचार मन में आये, वो शब्दशः लिखता हूँ।

4 दिसंबर 2018 को उरी (उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक) फ़िल्म का ट्रेलर आया। इसके प्रत्योत्तर में द वायर नाम के एक वेब पोर्टल पे इसे ‘हाइपर नेशनलिज्म’ यानि अति राष्ट्रवाद का सूचक बताया गया।

11 जनवरी 2019 को यह फ़िल्म रिलीज़ हो गयी। इस फ़िल्म को देखने की आतुरता जिन लोगों में थी, उन्हें देखकर मैं यह कह सकता था कि सामान्य भाजपाई, कॉलेज में भाजपा समर्थक, समाज में भाजपा समर्थक इत्यादि लोगों के लायक ही ये फ़िल्म होगी। मैं नहीं जानता था कि किस स्तर की फ़िल्म यह बनाई गयी होगी, समर्थकों से अधिक बड़े तबके को यह फ़िल्म प्रभावित करेगी, इस पर मुझे संदेह था।

जिन्हें विश्लेषण तक रुकना है, वे आगे तक पढ़ें अन्यथा जो इस फ़िल्म को केवल मोदी भक्ति के नज़रिये से देखते हैं वे केवल समीक्षा पढ़ें।

कहानी

फ़िल्म शुरू होती है म्यांमार में भारतीय सेना द्वारा किये गए सर्जिकल स्ट्राइक से। जो भारतीय सेना ने सन् 2015 में किया था, उसके बाद कई मिलिटेंट संगठन ने आत्मसमर्पण करना शुरू किया था पूर्वोत्तर राज्यों में।

उस सर्जिकल स्ट्राइक में बड़ी बात यह रही कि हमारे सभी जवान जीवित सही सलामत आ गए।
मेजर विहान शेरगिल (विक्की कौशल) उस टीम के हेड हैं जो इस सर्जिकल स्ट्राइक को असली रूप देकर आयी।

विहान की पोस्टिंग दिल्ली में सूचना केंद्र में करा दी जाती है ताकि वह अपनी माँ (स्वरूप संपत) की देखभाल कर सकें। विहान के दोस्त और बहनोई करण (मोहित रैना) की पोस्टिंग उरी में है।

माँ की सेवा के लिए रॉ से एक एजेंट को नर्स जास्मिन (यामी गौतम) बनाकर भारत सरकार विहान के घर भेजती है।

माँ की बिगड़ती हालत, और बॉर्डर से दूरी की वजह से विहान का मन सूचना केंद्र में नहीं लगता। इस बीच देश में उरी में हमला होता है, जहां करण की मौत हो जाती है। सैनिकों का हौसला बढ़ाने के लिए अजीत डोभाल का किरदार निभाते हुए परेश रावल सर्जिकल स्ट्राइक का सुझाव देते हैं सरकार को। इसके बाद कहानी पूरी सर्जिकल स्ट्राइक के इर्द गिर्द दौड़ती है।

पटकथा

बहुत ही सुंदर तरीके से फ़िल्म की कहानी लिखी गयी है। एक भी ऐसा दृश्य नहीं है फ़िल्म में जिसे देखकर आपको यह कहना पड़े कि इसकी ज़रूरत क्या थी?

लॉजिक के नाम पर आम हिंदी फिल्मों से ये बहुत अलग है और 5 में 5 स्टार ले जाएगी ये फ़िल्म। सभी दृश्य एक सूत्र की तरह पिछले दृश्यों से जोड़े गए हैं। फ़ालतू का कोई दृश्य नहीं है।

किरदार

किरदार के अनुरूप अभिनेताओं और अभिनेत्रियों को जो पर्दे पर समय मिला है, उसे उन्होंने बहुत अच्छे से निभाया है। विक्की कौशल निश्चित तौर पर थोड़ा अधिक स्पेस ले जाते हैं, मगर उन्हें फ़िल्म का इकलौता नायक कहना ग़लत होगा। पहले हाफ में फ़िल्म विक्की कौशल के इर्द गिर्द घूमती है, मगर असल में फ़िल्म का हीरो, सर्जिकल स्ट्राइक ही है, इसलिए फ़िल्म के दूसरे हाफ में केवल सर्जिकल स्ट्राइक ही केंद्र में है।

परेश रावल व यामी गौतम ने अपना अपना क़िरदार बखूबी निभाया है। मंत्रिमंडल का नाटकीय रूप भी ज़बरदस्त है। प्रधानमंत्री मोदी का किरदार निभाने वाले शिशिर कपूर ने हूबहू प्रधानमंत्री का स्वभाव सीखा है।

गीत

छल्ला और जग जितेया जैसे गीत जहां रोमांच पैदा करते हैं, वहीं बह चला गीत भावुक करता है। ‘मंज़र है ये नया’ क्लाइमेक्स पर अच्छा गीत है।

निर्देशन

आदित्य धर के निर्देशन में बनी उरी द सर्जिकल स्ट्राइक, आपको पूरी तरह फ़िल्म से बांधे रखती है। सस्पेंस, जोश, एक्शन, बेहतरीन कहानी, ज़बरदस्त संवाद, अदाकारी से भरपूर है। आदित्य ने अच्छा किया जो फ़िल्म को 3डी में नहीं रिलीज किया। किसी भी आम इंसान के रोंगटे खड़े करने वाली फ़िल्म है उरी।

हाँ तो यह तो थी समीक्षा, अब ज़रा विश्लेषण करें फ़िल्म का।

आदित्य धर की फ़िल्म उरी, केवल एक वास्तविक घटना पर आधारित फ़िल्म नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा के इतिहास में बदलाव की क्रांति है। यह नए भारत के नए सिनेमा का द्वार है। मिशन आधारित फिल्मों का चलन हॉलीवुड में रहा है, और प्रेम और भावनाएं आधारित फिल्मों का चलन बॉलीवुड में, मगर उरी फ़िल्म के बाद बॉलीवुड को प्रोत्साहन मिलेगा अपना दायर बढ़ाने का। भारतीय दर्शक को उसके कई प्रश्नों के जवाब देती है उरी।

रमेश सिप्पी की शोले के दौरान एक ही प्रकार की कहानियां चलनी शुरू हुई, कमाल अमरोही की पाकीज़ा के बाद वही मेलोड्रामा, बड़जात्या व परिवार की फिल्में केवल पारिवारिक रह गयीं, यश चोपड़ा की फिल्में प्रेम व भावनाएं आधारित रहीं, महेश भट्ट की फिल्में जिस्म का प्रचार करती रहीं, पहलाज निहलानी की फिल्में फूहड़ता का सबूत रही और इन सबसे ऊपर उठकर जब हिंदी सिनेमा में अनुराग कश्यप युग आया तो व्यवहारिकता और गाली गलौच फिल्मों की प्रतिष्ठा बन गयी।

मगर उरी एक ऐसी फ़िल्म आयी है जो डॉक्यूमेंट्री बनाने वाले किसी भी निर्देशक को केवल श्याम बेनेगल तक सीमित नहीं रहने देगी। भावनाओं से जुड़ी डॉक्यूमेंट्री दिखाने का वक़्त ख़त्म हो गया है। अब इन्हें फ़िल्म बनाकर प्रसारित करने का वक़्त आदित्य धर लेकर आये हैं।

देशभक्ति का जोश पूरी फ़िल्म में कहीं कम नहीं होता। जो देशभक्त हैं, फ़िल्म का एक्शन देख कर एक बार वो भी सिहर जाएं। दिल के मरीज़ ऐसी फिल्मों से दूर रहें। धड़कनों की रफ्तार केवल बढ़ने के आसार होते हैं ऐसी फिल्मों में। ग्रेविटी, जी आई जो, एवेंजर्स जैसी फिल्मों को टक्कर देकर पटखनी देती है उरी। अनुराग कश्यप व उनकी पीढ़ी के अन्य निर्देशकों को धैर्य और नम्रता सिखाती है उरी। बिना गाली गलौच के एक्शन दिखाती है उरी।

भारत सरकार और भारतीय सेना का शौर्य दिखाती है उरी। सरकारी संस्थाओं के काम काज के तरीके (कम से कम मोदी सरकार के तरीके) को दिखाती है उरी।

भारत के इतिहास की सबसे दमदार फ़िल्म है उरी।

जो लोग सिनेमा में लॉजिक खोजते हैं उन्हें उरी फ़िल्म में जवाब मिलेगा।
जो हिंदी सिनेमा को हॉलीवुड सिनेमा के करीब लाना चाहते हैं, उन्हें यकीन होगा।
जो राष्ट्रवाद को सिनेमा स्क्रीन पर चाहते हैं, उन्हें ये मिलेगा।

सरकारी कामकाज के स्तर को देखने के लिए नज़दीकी सिनेमा घरों में उरी देखने जाइये।

परिवार के साथ जाइये। बिना गाली गलौच, अश्लीलता और बिना फूहड़पने के बॉलीवुड ने नगण्य फिल्में बनाई हैं, और आपकी खुशकिस्मती से उरी आपके ही ज़माने में बनी है।

खुद को निष्ठा सिखानी है तो उरी देखने जाइए।
चाहते हैं सेना के पराक्रम की कहानी देखना तो उरी देखने जाइये।

शानदार पटकथा, बेहतरीन डायलॉग, ज़बरदस्त संवाद और स्टारकास्ट और बिना मेलोड्रामिक लगे सच्ची घटना पर आधारित फ़िल्म देखने जाइये।

और जिन्हें सबूत चाहिए वे भी सिनेमा घर में उरी देखने जाएं।

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