उत्तर प्रदेश में सपा बसपा गठबंधन : देश बदल रहा है

देश में चुनाव का माहौल है। कुछ गठबन्धन टूट रहे हैं, कुछ नये गठबन्धन बन रहे हैं और ये सिलसिला चुनाव तक या उसके बाद तक चलता रह सकता है।

सम्भावनाओं की इस तारतम्यता में उत्तर प्रदेश के दो दलों सपा, बसपा के राष्ट्रीय अध्यक्षों ने लखनऊ के एक पांच सितारा होटल में आपस में चुनावी गठबन्धन का ऐलान कर दिया है।

उप्र की 80 सीटों में से 38, 38 पर वे अपने अपने उम्मीदवार खड़ा करेंगे, 2 सीट काँग्रेस के सम्मान में और 2 सीट संभावित सहयोगियों के लिए छोड़ दी गयी हैं।

इस गठबंधन का उप्र के चुनावों पर क्या असर पड़ेगा यह तो भविष्य ही बताएगा लेकिन इस गठबंधन का समाज और राजनीति पर गहरा असर पड़ेगा। कुछ राजनीतिज्ञों की राजनीति और वो राजनीतिक संस्कृति, जिसमें वे पले बढ़े हैं, समाप्त होने के कगार पर है।

जिस तरह से इन दोनों दलों का वजूद निर्मित हुआ था अगर उस भाषा में कहा जाये तो दलितों और पिछड़ों के बीच की दीवार को इस गठबंधन ने गिरा दिया है। अब दोनों एक साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे।

जाहिर है दोनों ने अपने अपने वजूद के लिए दलितों और पिछड़ों के बीच दीवार बनाई थी और ‘सबका साथ सबका विकास’ की आवाज़ के प्रभाव में एक बार फिर अपने ही वजूद के लिए अपनी ही बनाई गई दीवार को गिरा दिया हैं।

सामाजिक दृष्टि से यह एक स्वागत योग्य कदम है। सकारात्मक कदम है। विद्वेष फैलाकर एक दूसरे का रहनुमा बनने के दिन अब नहीं रहे।

यकीनन हम लोग वैचारिक उपनिवेश से बाहर निकलते हुए दिख रहे हैं। वो वोट बैंक की स्थापनाएं, ग़ैरज़िम्मेदार किस्म की स्थापनाएं थी। दलों को जाति या जाति समूह से जोड़कर देखना और उसी रूप में उसकी पहचान करने के दिन अब नहीं रहे। यह एक थोपा गया सुविधावादी प्रबन्ध था, सामाजिक अपराध का हिस्सा था।

पहले भी थोड़े से लोग थे अपनी मानवीय सभ्यता का दामन पकड़े हुये और जाति धर्म के ऊपर उठकर मतदान किया करते थे। किसी को फक्र हो सकता है वो दलितों का नेता है, किसी को फक्र हो सकता है कि पिछड़ों का आधिपत्य कायम हो गया है। पर उप्र के लोगों ने अलग अलग सपा और बसपा को बहुमत देकर सरकार बनाने का अवसर दिया।

सपा बसपा के गठबन्धन को समाज की इसी सामाजिकता को स्वीकार किये जाने के रूप में हमें देखना चाहिए। इसी सामाजिक समरसता को स्वीकार किये जाने की कोशिश के रूप में देखा जाना चाहिये। समाज की सामाजिकता कभी राजनीतिमय नहीं होती, वो राजनीति का निर्माण करती है।

बहुत कुछ बदल रहा है। नज़रिये बदल रहे है। विचार बदल रहे हैं। पुरानी स्थापनाएं टूट रही है, नयी स्थापित हो रही हैं। सबसे सुंदर बात तो ये है कि सामाजिकता राजनीति को सकारात्मक दिशा में ढकेल रही है।

दलितों और पिछड़ों के बीच की दीवार को गिराकर बनाया गया यह सपा बसपा का गठबन्धन सामाजिक रूप से जितना सकारात्मक है, राजनीतिक रूप से उतना सकारात्मक होना अभी शेष है।

अगर भारत के पूरे राजनीतिक परिदृश्य पर नज़र डाली जाए तो भाजपा नीत गठबन्धन गैरकाँग्रेसवाद का प्रतिनिधित्व कर रहा है। काँग्रेस उसके विरोध में गठबन्धन बनाने की जुगत कर रही है और गैर भाजपा गैर काँग्रेस के गठबन्धन की अनुगूंज भी सुनी जा सकती है।

उप्र में हुआ सपा बसपा का गठबन्धन गैर भाजपा, गैर काँग्रेस दोनों गठबंधनों के बीच में एक अवसर की तरह है कि सुविधानुसार किसी गठबन्धन के करीब जाया जा सके।

दिलचस्प है जिस उप्र ने इन दोनों दलों को अलग अलग पूर्ण बहुमत देकर सरकार बनाने का अवसर दिया है वही दोनों वापस में मिलकर उप्र में भाजपा गठबंधन को रोकने के लिए ताल ठोंक रहे हैँ।

अब हम लोगों को ही यह निर्णय करना है कि इनका विश्वास कहाँ है, तब जब ये दोनों खुद पर और उत्तर प्रदेश की जनता को अविश्वास की नजर से देख रहे हैँ।

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