बातों तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत करता लोकतंत्र का खोखला चौथा स्तंभ


संघ प्रमुख मोहन भागवत जी ने हाल ही में एक बयान दिया है। आरएसएस प्रमुख ने नागपुर में प्रहार समाज जागृति संस्था के रजत जयंती कार्यक्रम के अवसर पर कहा कि ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि ‘‘हम अपना काम ठीक से नहीं कर रहे हैं.”

उन्होंने कहा,‘‘भारत को आजादी मिलने से पहले देश के लिए जान कुर्बान करने का वक्त था. आजादी के बाद युद्ध के दौरान किसी को सीमा पर जान कुर्बान करनी होती है. (लेकिन) हमारे देश में (इस वक्त) कोई युद्ध नहीं है फिर भी लोग (सैनिक) शहीद हो रहे हैं… क्योंकि हम अपना काम ठीक ढंग से नहीं कर रहे हैं.”

उन्होंने कहा  ‘‘अगर कोई युद्ध नहीं है तो कोई कारण नहीं है कि कोई सैनिक सीमा पर अपनी जान गंवाए. लेकिन ऐसा हो रहा है.” उन्होंने कहा कि इसे रोकने और देश को महान बनाने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए.   

उन्होंने कहा, “और इसलिए अपने देश के लिए मरने का एक समय था, जब स्वतंत्रता नहीं थी. अब आज़ादी के बाद अपने देश के लिए मरने का समय सीमाओं पर रहता है, जब युद्ध होता है तो.”

सेना में होने वाली शहादत बहुत ही गंभीर विषय है। जिस पर देश का हर नागरिक चिंतित ही होता है।  मोहन भगवत जी ने सरकार का इस ओर ध्यान कराया कि इसमें हमारा ही कुछ दोष है। 

मगर मीडिया घरों ने इस विषय को जिस तरह से  पेश किया है, उसे देख कर एक आम इंसान को लगेगा कि संघ भाजपा से नाराज़ है; संघ सरकार से नाराज़ है; मोहन भागवत जी ने सरकार को लगाई फटकार इत्यादि। 

आखिर इन विषयों को इस प्रकार से फ़ैलाने से मीडिया को मिलेगा क्या? इन विषयों में भेद पैदा करके, मीडिया इस विषय पर लोगों की रुचि लाना चाहती है, जिससे लोग उनके विषयों को देखें, उनकी घटती टीआरपी को बढ़ावा मिले; और अपने प्रायोजकों के लिए ज़बरदस्त डिबेट वाले कार्यक्रम बना सकें।  आख़िर देश के किसी संगठन के प्रमुख ने देश के सरकार को किसी विषय पर ध्यान कराया है, तो इसमें नाराज़गी जैसा क्या है? 

ऐसे विषयों पर विवाद करा के मीडिया केवल और केवल चुनाव का माहौल पैदा करना चाहती है, जनता के मन में यह भरना चाहती है, कि संघ और भाजपा के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है।  एक बार मीडिया रिपोर्ट्स को देखेंगे तो समझ आएगा कि विषय बनाने वाली मीडिया अन्य सकारात्मक विषयों को छोड़ कर संघ और सरकार के बीच भेद को प्रसारित कर रही है।  

मगर मामला यहीं समाप्त नहीं हो जाता। स्वयं को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने वाले मीडिया की क्या यह ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि वह स्वयं इस विषय की गंभीरता को समझे और सरकार के साथ सलाह मशविरा करे?

क्या मीडिया का काम केवल अन्य संस्थाओं की ज़िम्मेदारियाँ गिनाना और ग़लतियों या कमियों पर सवाल पूछने का रह गया है ?

2015 में विपक्ष के किसान आंदोलन के समय भी जब एक किसान ने सरेआम आत्महत्या कर ली थी तो संवेदनहीन मीडिया उस व्यक्ति को बचाने के बजाय लाइव मौत आत्महत्या चला रहा था और शाम को प्राइम टाइम पे अपनी ग़लती बताने के बजाय दोषियों की ग़लती गिना रहा था। सवाल पूछने के अलावा और कोई सकारात्मक आंदोलन और उसका सकारात्मक परिणाम मीडिया ने निकाल कर दिखाया है क्या लोगों को?

क्या विपक्ष का काम भी केवल मसाला ख़बरें जानना व चर्चा करना है? क्या विपक्ष जो अंततः जनता द्वारा चयनित ही है, जनता के इस विषय पर चर्चा नहीं कर सकता? संसद से वाकआउट करना सरकार पर दबाव बनाने का तरीका हो सकता है मगर बिना उन विषयों को उठाये, जिनके लिए जनता ने आपको संसद में भेजा है, अगर आप वॉकआउट कर जाते हैं तो आप ये साबित कर रहे हैं कि आप अपनी जनता को बेवकूफ बना रहे हैं। उनकी जान के बारे में सरकार के साथ चर्चा करने के बजाय आप अगर केवल वॉकआउट या विरोध कर रहे हैं तो जनता को धोखा दे रहे हैं।

जब बॉलीवुड की एक टोली प्रधानमंत्री के साथ जाकर चर्चा कर सकती है, जब पत्रकार प्रधानमंत्री के साथ जाकर सेल्फी खींचा सकते हैं, जब सर्वदलीय बैठक हो सकती हैं, तो क्यों नहीं मीडिया और विपक्ष सरकार के साथ बैठ कर इस विषय पर चर्चा करते?

क्या नोएडा की शीशे वाले दफ़्तरों में बैठकर टीवी डिबेट कराना ही मीडिया का काम रह गया है? अगर हाँ तो क्यों चिल्ला चिल्ला कर खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ साबित करने में लगे रहते हैं?

क्या केवल वॉकआउट करना, प्रेस कॉन्फ्रेंस करना, रैलियां व सभाएं करना विपक्ष का काम रह गया है? यदि हाँ तो क्यों जनता को उनकी आवाज़ बताकर, उन्हें धोखा दे रहा है हमारा विपक्ष?

और यदि नहीं, तो क्यों नहीं मोहन भागवत जी की इस बात पे सारा विपक्ष, मीडिया एकजुट होकर सरकार के साथ इस विषय पर चर्चा करके हल निकालता?

यकीन मानिए, यदि हम इस देश में केवल सरकार को काम की ज़िम्मेदारी दे रहे हैं, उन्हें काम न होने पर कोस रहे हैं, और काम हो जाने पर ख़ुद की पीठ थपथपा रहे हैं, तो हम निस्संदेह एक भटके हुए लोकतंत्र बन रहे हैं।

सन्दर्भ : 

https://khabar.ndtv.com/news/india/no-war-yet-jawans-are-being-martyred-on-the-border-mohan-bhagwat-1979413

http://www.catchnews.com/national-news/rss-chief-mohan-bhagwat-targets-pm-modi-s-approach-towards-army-says-if-no-war-at-border-then-why-are-soldiers-getting-martyred-146005.html

https://aajtak.intoday.in/story/mohan-bhagwat-bhaiyaji-joshi-rss-bjp-ayodhya-dispute-1-1055271.html

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