इस लेख को संभाल कर रखिए, न जाने कब पड़ जाए इसकी आवश्यकता

हिन्दू वकील को सनातन धर्म पर होते हुए हमलों तथा हिंदुओं पर होते विधर्मियों के खिलाफ लड़ने की क्या कीमत पड़ती होगी, कभी सोचा है आप ने?

ज़रा हिसाब देखिये।

पहला… उस वकील की प्रैक्टिस बर्बाद की जाएगी, बड़ी आसानी से। उसके दो तीन केसेस में अपेक्षा के विपरीत निर्णय पर्याप्त है। कानून के दायरे में है, वो अपील कर सकता है, लेकिन उसका क्लायंट कहाँ तक साथ देगा अगर उसे कोई ‘अनाम हितैषी’ फोन कर के कह दे कि उसका नुकसान वकील के कारण हुआ है?

अत: आप को उनकी आर्थिक ज़रूरतों का खयाल रखना होगा।

दूसरा… अगर इससे आदमी नहीं टूटा तो हिंसा से कब परहेज़ किया है विरोधियों ने? याने उसे सुरक्षा देनी होगी जिसकी कीमत भी जोड़ लीजिएगा।

तीसरा… नीति अनीति की ‘उनकी’ व्याख्या हमारी व्याख्याओं से मेल नहीं खाती। सुरक्षा पूरे परिवार को देनी होगी, कीमत उसकी भी जोड़ ली जाये।

ये असुरक्षा केवल हमारे वकीलों को ही अनुभव होगी, ‘उनके’ वकीलों को हम से असुरक्षा का अनुभव कभी नहीं हुआ। यही कारण है कि हिन्दू वकील भी ‘उनके’ केस लड़ते हैं, अपने फायदे और कमाई के लिए पूरे हिन्दू समाज का दीर्घकालीन नुकसान करते हैं लेकिन फिर भी हिन्दू समाज में इज्जत पाते हैं, इनके रिश्ते बड़े हिन्दू घरों में आसानी से होते हैं, कोई बहिष्कार नहीं होता। इसलिए उनके लिए यह कीमत जोड़ने का सवाल ही नहीं आता। हमारे लिए अनिवार्य है।

चौथा… कोर्टबाज़ी सस्ती नहीं होती, खास कर जब आप मीडिया संस्थानों से टकराते हैं। वे ऐसे बड़े बड़े वकील खड़े कर देंगे कि हवा यूं ही निकल जाएगी। और यहाँ बात केवल तर्कों और तथ्यों की नहीं होती, भ्रम न पालें, किसी अनुभवी अधिवक्ता से बात कर लीजिये, भ्रम टूट जाएँगे।

नोटा का समर्थन करनेवाले एक वकील साहब कहने को तो भाजपाई हैं, पक्ष के लिए योगदान भी बड़े हैं लेकिन मोदी मुक्त भाजपा चाहते हैं। उनके शहर में कुछ मंदिर तोड़े गए थे तो भाजपा को कोसा बहुत सोशल मीडिया में बुलडोज़र के फोटो लगाकर लेकिन जब मैंने पूछा कि अगर किसी मस्जिद या मजार के लिए रास्ते को मोड़ दिया है तो सबूतों के साथ लिखें और स्वयं अधिवक्ता हैं तो निगम या राज्य सरकार पर मुकदमा करें पक्षपात तथा भावनाओं को ठेस पहुंचाने का।

मुझे उत्तर भी नहीं दिया। बाकी ठीक है, मेरी पढ़ाई बहुत कम है, ज्ञान उससे भी कम है और उनकी फाइलों का भी वज़न मुझसे अधिक है ।

वास्तविकता अपनी जगह होती है।

इसकी कीमत हमें ही देनी होगी और यह मामला पाँच साल का नहीं है।

एक मान्यताप्राप्त पक्ष यह काम को कर नहीं सकता, काफी बाधाएँ आती हैं। इसके लिए अलग संगठन की आवश्यकता है ।

जिन संगठनों से बवाली हिन्दू ये अपेक्षा रखते हैं उनके लिए न धन और न समय देते हैं, बस उनकी निंदा करने का अवसर नहीं छोड़ते। वैसे इन संगठनों के दाताओं की अपेक्षाएँ अलग होती हैं और आप किसी दाता को बाध्य नहीं कर सकते कि वो अपने धन का विनियोग कैसे करे।

बदलाव कराने का अर्थ क्या है यह मप्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में समझ आ रहा है। इसलिए विकल्प का निर्माण ही आवश्यक बनता है, तब तक वर्तमान व्यवस्था का साथ देना मजबूरी ही सही क्योंकि काँग्रेस अपना रंग दिखा रही है। बिना सबूत लिखना नहीं चाहिए इसलिए खुलकर लिखने से परहेज़ कर रहा हूँ।

इसलिए 2019 में फिर से मोदी आवश्यक है। 2024 तक का समय चाहिए। 14 से 19 तक का समय कोसते ही चला गया लेकिन कई नए संस्थान पल्लवित हुए हैं जिनसे आशा की जा सकती है। अभी प्राथमिक अवस्था में हैं। ये पाँच साल मिलेंगे तो वे कुछ अवश्य कर सकेंगे।

एकलव्य का हम क्या सिर्फ नाम ही जानेंगे या उससे कुछ बोध भी लेंगे कि विद्या नकारी जाने पर भी वो डटा रहा और अच्छा धनुर्धर भी हुआ। बोध लेने के लिए इतना ही योग्य है, बाकी कथा चांडालजी के लिए डर्टी पॉलिटिक्स खेलने छोड़ दीजिये। एकलव्य मेरे लिए बहुत सकारात्मकता का प्रतीक है, समय ने साथ दिया तो प्रमाणित भी कर दूँगा।

गलतफहमियां कई हैं ये “कहाँ गए हिन्दू वकील” वाले मुद्दे पर। ऊपर से जान बूझकर इस मुद्दे को तूल भी दिया जा रहा है। इसलिए इस मुद्दे पर लिखने की आवश्यकता है, और भी लिखना होगा।

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