सर्वानन्द कौल ‘प्रेमी’: सेकुलरिज्म को माथे लगाया उसी पर विधर्मियों ने ठोक दी कील

धर्म व्यक्ति को कर्तव्यपरायण होने का मार्ग दिखाता है उसका किसी फेथ, रिलिजन, समुदाय, पन्थ अथवा सम्प्रदाय से कोई सम्बंध नहीं होता. वहीं दूसरी तरफ सेक्युलर होने का प्रचलित अर्थ है किसी रिलिजन के प्रति पक्षपाती न होना. सर्वानन्द कौल उनमें से थे जिन्होंने सेकुलरिज्म को अपना धर्म समझा था. सर्वानन्द कौल के ऊपर माता रूप भवानी की कृपा थी जिसने उन्हें कश्मीरी संतों की जीवनी लिखने को प्रेरित किया था.

एक कवि, अनुवादक और लेखक के रूप में उनकी ख्याति ऐसी थी कि मशहूर कश्मीरी शायर महजूर ने उन्हें ‘प्रेमी’ उपनाम दिया था. सर्वानन्द ने टैगोर की गीतांजली और गीता का तीन भाषाओँ में अनुवाद किया था: हिंदी, उर्दू और कश्मीरी. हिंदी में एम् ए की डिग्री रखने वाले सर्वानन्द कौल कुल छः भाषाओँ के ज्ञाता थे- संस्कृत, फ़ारसी, हिंदी, अंग्रेजी, कश्मीरी और उर्दू तथा वे अपने पूजा घर में गीता के साथ क़ुरान की एक प्राचीन पाण्डुलिपि भी रखते थे.

घाटी से कश्मीरी पण्डितों के पलायन के बाद आज जहाँ कश्मीरी भाषा में प्रकाशित होने वाला साहित्य लगभग नगण्य है वहीं सर्वानन्द कौल ने प्रकाशित और अप्रकाशित कुल मिलाकर 32 पुस्तकें लिखीं थीं जिनमें अधिकांश कश्मीरी भाषा में थीं.

सर्वानन्द कौल का जन्म जम्मू कश्मीर के अनंतनाग जिले के एक गाँव में सन 1924 में हुआ था. वे सत्रह बरस की आयु में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े थे और बाद में आल इंडिया स्पिनर्स एसोसिएशन के सदस्य बन गये थे. यहीं से उनके अंदर गांधीवाद का बीज पड़ा था.

भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् 1948 में उन्होंने कश्मीर छोड़ दिया और पंजाब सरकार में नौकरी कर ली थी. छह वर्ष बाद 1954 में सर्वानन्द कश्मीर घाटी लौटे और जम्मू कश्मीर सरकार के शिक्षा विभाग में अध्यापक बन गये जहाँ उन्होंने तेईस वर्षों तक नौकरी की. सेवानिवृत्ति के पश्चात भी सर्वानन्द कौल साल में तीन महीने दो स्कूलों में बिना वेतन लिए पढ़ाते थे- एक हिन्दू समाजसेवी संगठन द्वारा संचालित विद्यालय था और दूसरा इस्लामी तालीम देने वाला.

कश्मीर घाटी में जब पंडितों का नरसंहार प्रारम्भ हुआ तो यह एक चरणबद्ध प्रक्रिया थी कोई आकस्मिक दुर्घटना नहीं. सन 1984 में जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के संस्थापकों में से एक मकबूल बट को फांसी दी जा चुकी थी और 1986 में अनंतनाग में दंगे हो चुके थे. उसके पश्चात धीरे-धीरे स्थिति बिगड़ती गयी.

सन 1989 में पूरे विश्व में सलमान रुश्दी की पुस्तक ‘सैटेनिक वर्सेज़’ का विरोध चरम पर था जिसकी आग कश्मीर तक भी पहुँची; हालाँकि इस चिंगारी का स्रोत ईरान में था. आज कुछ लोगों के लिए यह विश्वास करना कठिन है कि ईरान में लगी चिंगारी की आग कश्मीर तक पहुँची थी जिसमें कश्मीरी पंडित झुलसे थे.

परिणामस्वरूप 13 फरवरी को श्रीनगर में दंगे हुए जिसमें कश्मीरी पंडितों को बेरहमी से मारा गया. वे कराहते रहे और पूछते रहे कि रुश्दी के अल्फाजों का बदला उनकी आवाज खत्म कर क्यों लिया जा रहा है लेकिन पंडितों की सुनने वाला वहाँ कोई नहीं था. पंडितों के संहार और दंगों के समय सरकार और उनके सहयोगी दल अलगाववादियों के सम्मुख भीगी बिल्ली बन जाते थे.

अलगाववादी जानते थे कि पंडित घाटी से आसानी से नहीं जायेंगे. इसलिए सुनियोजित ढंग से पहले उन कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाया गया जिन्हें जनता सम्मान देती थी. ऐसे ही सम्मानित व्यक्तियों में भाजपा नेता टिका लाल टपलू भी थे जिन्हें सर्वानन्द कौल से पहले ही मार दिया गया था. समाज में सम्मानित कश्मीरी पंडितों में सर्वानन्द कौल सम्भवतः अंतिम थे जिनकी हत्या की गई थी.

सैटेनिक वर्सेज़ के विरोध के एक वर्ष पश्चात् 29 अप्रैल 1990 की शाम तीन आतंकी बंदूक लेकर सर्वानन्द कौल ‘प्रेमी’ के घर पहुँचे. उन्होंने कुछ बातचीत की और घर की महिलाओं से उनके गहने इत्यादि मूल्यवान वस्तुएं लाने को कहा. डरी सहमी महिलाओं ने सब कुछ निकाल कर दे दिया. सारे गहने जेवरात और कीमती सामान एक सूटकेस में भरा गया फिर उन आतंकियों ने सर्वानन्द से उनके साथ चलने को कहा.

सर्वानन्द ने सूटकेस उठाया तो वह भारी था. उनके सताईस वर्षीय पुत्र वीरेंदर ने हाथ बंटाना चाहा और सूटकेस उठा लिया. तीनों आतंकी पिता पुत्र को अपने साथ ले गये. सर्वानन्द को विश्वास था कि चूँकि वे अपने पूजा घर में कुरआन रखते थे इसलिए अलगाववादी आतंकी उनके साथ कुछ नहीं करेंगे; घरवालों को भी उन्होंने यही भरोसा दिलाया था.

लेकिन उनका भरोसा उसी प्रकार टूट गया जैसे कड़ाके की ठंड में चिनार के सूखे पत्ते टहनी से अलग हो जाते हैं. सर्वानन्द कौल ‘प्रेमी’ और उनके पुत्र को उनके परिवार ने फिर कभी जीवित नहीं देखा. अगले ही दिन पुलिस को उनकी लाशें पेड़ से लटकती हुई मिलीं. सर्वानंद कौल अपने माथे पर भौहों के मध्य जिस स्थान पर तिलक लगाते थे आतंकियों ने वहाँ कील ठोंक दी थी. पिता-पुत्र को गोलियों से छलनी तो किया ही गया था इसके अतिरिक्त शरीर की हड्डियाँ तोड़ दी गयी थीं और जगह-जगह उन्हें सिगरेट से दागा भी गया था.

सर्वानन्द कौल ने अपने जीवित रहते सेकुलरिज्म को धर्म मानकर काम किया था. कहने को तो सर्वानन्द कौल प्रेमी समाज सेवक के रूप में भी विख्यात थे जिन्होंने हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए बहुत काम किया था. उदाहरण के लिए 1963 में जब हजरत बल दरगाह से मोहम्मद साहब का बाल गायब हो गया था तब दंगे रोकने के लिए सर्वानन्द कौल ने अथक प्रयास किये थे. लेकिन वे जीते जी यह नहीं समझ पाए थे कि शैतान की आयतों को रटने वाले सेकुलरिज्म का मर्म नहीं समझते.

आज से 29 वर्ष पहले 19 जनवरी के दिन ही कश्मीर घाटी से पंडितों का सम्पूर्ण पलायन हुआ था. पलायन के बाद भी एकाध पंडित वहाँ रह गए थे. जब सब चले गए और सबके घर लुट गए तब एक विद्वान पंडित ने डल झील के किनारे एक शिकारे वाले को कश्मीरी पंडितों की थातियाँ तौलकर कबाड़ के भाव बेचते हुए देखा. वे असली पांडुलिपियाँ थीं जिन्हें हज़ारों वर्षों से पंडित परिवारों ने संभाल कर रखा था.

जब शिकारेवाले ने उस विद्वान पंडित को देखा तो पांडुलिपियों का ऊँचा भाव लगाया. पंडित ने जितनी हो सकी उतनी पुस्तकें खरीद लीं. कश्मीर के पंडित हाड़ मांस के इंसान ही नहीं थे वे भारत की अप्रतिम ज्ञान परम्परा के संरक्षक भी थे. कहते हैं कि आदि शंकराचार्य के समतुल्य कश्मीर के महान विद्वान अभिनवगुप्त ने देह नहीं त्यागी थी, वे एक गुफा में चले गए थे. प्रचलित मान्यताओं के अनुसार एक दिन उस गुफा पर मेले लगेंगे और कश्मीर का पुनरुत्थान होगा. जाने वह दिन कब आएगा…

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