सेक्युलर हिन्दू और सूरह अल काफ़िरून

सूरह नंबर 109, जिसे सूरह अल काफ़िरून के नाम से भी जाना जाता है, केवल 6 आयतों का है। लेकिन साइज़ पर ना जाएँ, यह बड़ा ही महत्वपूर्ण है ।

कभी इस सूरह की आखिरी आयत को ले कर गैर मुस्लिमों को एक बड़ा झूठ परोसा जाता था – कौन सी नई बात है – कि यह आयात इस्लाम के सहिष्णुता का प्रमाण है।

देखिये यहाँ कहा है कि तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म, मेरे लिए मेरा । यह तब की बात हुआ करती थी जब आम तौर पर गैर मुस्लिम कुरान नहीं पढ़ते थे और इंटरनेट भी इतना सार्वत्रिक नहीं था।

फिर बढ़ती मुस्लिम आक्रामकता ने लोगों को इस्लाम के बारे में जानने को जगाया । इंटरनेट भी सार्वत्रिक होने से ज्ञान भी मिलने लगा। कहाँ तक मुसलमान झूठ परोस सकते थे?

जब कुरआन की तफ़सीरें नेट पर आई तो मान्यवर मौलानाओं के खुलासे भी सार्वत्रिक हुए कि लोगों में यह गलतफहमी है कि यह आयत सहिष्णुता की है। ऐसा कुछ नहीं, इस सूरह के द्वारा अल्लाह ने मुसलमानों को संदेश दिया है कि किसी भी तरह गैर मुस्लिम के धर्म को स्वीकार्यता नहीं देनी है, ज़रा भी नहीं।

यह तब हुआ था जब मक्का के लोग ह. मुहम्मद से विनती कर रहे थे कि साल का कुछ समय हम आप के नए धर्म का पालन करेंगे लेकिन कुछ समय आप भी हमारे याने अपने ही पूर्वजों के धर्म का पालन आप भी कीजिये। इसके लिए हम आप को शहर के हर बिज़नेस में पार्टनर बनाते हैं, शहर की जो चाहे खूबसूरत लड़की से आप की शादी कर देंगे…

फिर अवधि भी घटाते बढ़ाते गए, मतलब उनके पूर्वजों के धर्म पालन की अवधि घटाते गए, इस्लाम के पालन की अवधि बढ़ाते गए।

फिर भी ह. मुहम्मद ने इस तुष्टीकरण को नकार कर अपनी ही बात पर ज़ोर दिया। Win-win समझौते में उनको रस नहीं था उनको अपने ही हुक्म से सब चलाने में रस था। तब ताकतवर नहीं थे इसलिए इतना ही कहकर रह गए लेकिन जब मदीना से वापस आ कर मक्का फतह की तब पूर्व धर्म का नामोनिशान मिटा दिया और मक्का में एक भी उस धर्म के अनुयायी को नहीं रहने दिया।

मौदूदी साहब की तफ़सीर में यह मिल जाएगा।

यह इस्लाम का असली इतिहास भी है जिसे कोई मुसलमान नकार नहीं सकता। असली चेहरा भी है जिसे वे आप से तब तक छुपाने की कोशिश करते हैं, जब तक उनका पलड़ा भारी न हो जाये। वे बिलकुल अपने रसूल का चरित्र follow करते हैं।

मतलब जिस आयत को लेकर इस्लाम की सहिष्णुता की दुहाई दी जा रही थी वह आयत तो असहिष्णुता का भरतवाक्य थी। लेकिन इस्लाम के झूठों की बात करने बैठे तो लेख भटक जाएगा, इसलिए मुद्दे पर आते हैं।

सूरह ए काफिरून का मैंने सेक्युलरायटिस के शिकार हिंदुओं के लिए पुनर्लेखन किया है। मूल सूरह आप गूगल कर सकते हैं, भावार्थ कुछ अलग नहीं है। लीजिये –

कह दीजिये :
ऐ सेक्युलर हिंदुओं! (1)
हम उसको नहीं मानते जिसको तुम पूजते हो (2)
और न तुम्हारे मतदाता पूजेंगे उसको जिसको हम पूजते हैं (3)
और न हम पूजनेवाले हैं उसको जिसको तुमने पूजा है (4)
और न तुम्हारे मतदाता पूजनेवाले हैं उसको जिसको हमने पूजा है (5)
इसलिए तुम्हारे लिए तुम्हारे मतदाता, हमारे लिए हमारे नेता! (6)

यहाँ मतदाता इसलिए लिखा है क्योंकि सेक्युलर राजनेता तो अपने स्वार्थ के लिए वो भी पूजेंगे जिसे मुसलमान पूजते हैं।

बाकी इस्लाम की नीति यही रही है, आप की सदाशयता वे नहीं मानते, और उनकी ये नीति आप नहीं समझना चाहते। इस्लाम बदलने में नहीं मानता, उल्टा अपनी अपरिवर्तनीयता पर गर्व करता है!

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