मोदी हमारे काम के नहीं, ना हो सकते हैं, क्योंकि हम हैं आत्मिक भ्रष्टाचारी

आज अगर यक्ष, धर्मराज से प्रश्न पूछते कि बताओ धर्मराज ! जीवन का एक मात्र ध्येय क्या है ? तो धर्मराज ! बाबा मार्क्स और उनके सौतेले भाई जहरू को मानस प्रणाम करते हुए कहते कि हे यक्ष ! “मोदी से घृणा करना ही इस सृष्टि में मानव का एक मात्र ध्येय है” संभवतः इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि जो व्यक्ति सबकी घृणा का पात्र है उससे आकंठ घृणा करने वाले लोग भी यह बताने में असमर्थ हैं कि वो आखिर उस व्यक्ति से घृणा करते हैं तो क्यों करते हैं?

उसने ऐसा क्या किया है जिसके कारण उससे घृणा करने को न्यायोचित ठहराया जा सकता है। वो किसी राजनैतिक राजवंश का हिस्सा नहीं, किसी का राजनैतिक कृपा पात्र नहीं, काहिल और कामचोर नहीं, मूर्खता का पर्याय नहीं, परिवारजनों का हितकर्ता नहीं, भ्रष्ट और बेईमान नहीं और कोई रीढ़विहीन राजनेता भी नहीं….

तो आखिर इस घृणा का कारण क्या है? जो जनतंत्र की असीम शक्ति के माध्यम से, अंतिम व्यक्ति के सत्ता के शीर्ष पर पहुँच जाने से कुंठित लोग उसकी 90 वर्षीय माँ को भी राजनितिक गलियारों में घसीट रहे हैं।

क्यों आज लोग स्कूल मॉनिटर के चुनाव में मिली हार को भी मोदी कि हार ठहराने में चरमसुख का अनुभव करने लगे हैं। उसकी जीत को तुक्का और हार को लोकतंत्र की जीत बताने वाले लोग कौन हैं? वो कौन लोग हैं जिन्हें मोदी को सत्ता से बेदखल करने के लिए देश के दुश्मनों से भी हाथ मिलाने में परहेज़ नहीं? वो कौन लोग हैं जो अपने राजनैतिक पतन को भी पावन बताने में संकोच नहीं करते….

सच तो ये है कि ये और कोई नहीं हम ही हैं, जो मौका पड़ने पर या किसी लाभ की आशा में गधे को भी बाप बनाने को तैयार हो जाते हैं। और ये सब सिर्फ इसलिए क्योंकि हम उस आदमी को जितनी जल्दी हो सके कुर्सी से उतार फेंकना चाहते हैं, ताकि दुनिया तक ये सन्देश पहुँचाया जा सके कि भारत का लोकतंत्र भी राजशाही का ही परिष्कृत स्वरूप है।

वैसे भी जिस देश में पिछले 70 सालों से आरक्षण बदस्तूर लागू है वहां देश का प्रधानमंत्री नामक पद भी एक परिवार विशेष के लोगों के लिए आरक्षित कर दिया जाए तो क्या बुरा है… हम भी वोट के झंझट से मुक्त हों और “कोउ नृप होए हमै का हानि” वाली उक्ति का तावीज़ गले में टांग कर आराम से सो रहें।

बहरहाल अभी तीन राज्यों के चुनावों में हुई हार भी कुछ ऐसी ही है, फेसबुक के महारथियों में कोई इसे किसानों का श्राप कह रहा है, तो कोई हिन्दू समाज की हो रही उपेक्षा का प्रस्फुटिकरण, तो कोई नोटे के लोटे से निकला श्रापित जल… तो कुछ लोग इसे मंद-शोर की मुखर अभिव्यक्ति भी बता रहे हैं, पर इन सभी संभावनाओं का एक मात्र सार यही है कि यह जो कुछ भी है वह मोदी से मिली निराशा का प्रतिफल है।

आज भारत में कोई भी चीज़ शरू भले कहीं से हो, पर ख़त्म मोदी पर ही होती है। अगर गलती से भी कुछ सही हो रहा है तो उसके दावेदार बहुत हैं पर जो भी गलत हो रहा है तो उसके ज़िम्मेदार मोदी हैं। हम आखिर इतना दोगलापन लाते कहाँ से हैं?

आज फेसबुक के राजनैतिक विश्लेषक इस हार को राम मंदिर और हिन्दुओं की उपेक्षा का फलित बता रहे हैं। कुछ महारथियों ने तो मोदी को नेक सलाह भी दी है कि जल्द से जल्द अयोध्या जाकर रामलला के आगे नाक रगडें नहीं तो 2019 में उन्हें कैलाश का रास्ता दिखा दिया जाएगा।

मोदी को अयोध्या जाने की सलाह देने वाले उन तथाकथित हिन्दुओं से मेरा एक ही सवाल है कि वो खुद अपने जीवन काल में कितनी बार अयोध्या गए हैं? ईसाईं मतावलंबी अपने जीवन में कम-अज़-कम एक बार वेटिकन जाने की इच्छा रखता है, हर मुसलमान का एक मात्र सपना हज की यात्रा है, पर ज़रा दिल पर हाथ रख कर बताएं कि हम में से कितने हिन्दुओं ने अपने जीवन में एक बार अयोध्या जाकर रामलला के दर्शनों का स्वप्न देखा है?

सच्चाई यह है कि हमारे लिए हिंदुत्व कभी कोई प्राथमिकता रहा ही नहीं… आज मोदी पर आरोप है कि उन्होंने अपने साढ़े चार साल के शासन में हिन्दुओं और भगवान् राम की कोई सुध नहीं ली… पर कभी सोचा है कि इन साढ़े चार साल में हम क्या कर रहे थे? हम व्यस्त थे नई सड़कों पर कार दौड़ाने में, मुफ्त की बिजली जलाने में, टॉयलेट के सेप्टिक टेंक भरने में, झोपड़ों से निकलकर नए मकान में गृहस्थी बसाने में, मुफ्त का गैस चूल्हा जलाने में, 400 रूपये का टिकिट खरीदकर “एक्सिडेन्टल प्राइम मिनिस्टर” देखने में और बचे समय में मोदी को गरियाने में… अब ये सब करने में साढ़े चार साल कैसे बीत गए हमें पता ही ना चला, और जब मोदी को दिए जाने वाले हमारे उलाहने भी खत्म होने लगे… तब हमें राम याद आए, तो सोचा चलो चलते-चलते थोड़ा राम जी पर भी हो हल्ला हो जाए।

हमने मोदी को गरियाना शुरू किया कि हमने तो तुम्हें राम मंदिर, कॉमन सिविल कोड, और हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए चुना था तुम कहाँ ये सड़क, बिजली, पानी, के चक्कर में फंस गए।

सच तो ये है कि अगर मोदी को धोखा दिया है तो इन तथाकथित और पार्ट टाइम हिन्दुओं ने, जिन्हें हिंदुत्व और राम भी अपनी सुविधा के हिसाब से याद आते हैं। यह वो हिन्दू हैं जो आरक्षण पाने के लिए पूरे देश में आग लगाने निकल पड़ते हैं और महज़ एक दिन में ही सरकार को घुटनों पर ले आते हैं पर यही लोग कभी रामलला के लिए इसी तरह घरों से निकलते, यह वही लोग हैं जो राम के नाम पर अपनी सरकार न्योछावर कर देने वाले कल्याण सिंह को हटाकर कारसेवकों के हत्यारे मुलायम को चुन लेते हैं।

ये वही लोग हैं जो राम जन्मभूमि आन्दोलन के ज्वार में भी भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं दे पाते, ये वही लोग हैं जो राजनैतिक शुचिता के प्रतीक और विकास पुरुष अटल जी को 6 सालों में ही घर बिठा देते हैं और आकंठ भ्रष्टाचार में लिप्त सरकार के मौनी सरदार को दुबारा चुन लेते हैं। आज इन्हें लगता है कि मोदी अब वो मोदी नहीं रहे… पर मोदी में क्या बदला है वो आज भी वही हैं जो आज से बीस साल पहले थे जब भूकंप से बदहाल गुजरात और दिग्गज नेताओं की बगावत से हार की कगार पर खड़ी भाजपा में बलि के बकरे रूप में उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया, पर अपने अदम्य साहस और विकासोन्मुख नीतियों से वो गुजरात को उबार लाए और हारा हुआ अगला चुनाव जीत लिया, उसके बाद अगले 15 साल गुजरात की प्रगति के वो 15 साल रहे जिसने देश की ऑंखें चौंधिया दीं, इसी विकास पुरुष की छवि को उन्होंने अपना परिचय बनाया ना कि अपनी हिंदुत्व वादी छवि को… गुजरात दंगों के समय उन्होंने जो किया वो वही था जो किसी भी भाजपाई मुख्यमंत्री से अपेक्षित होता, पर उनमें वो माद्दा था कि राजधर्म को भुला राष्ट्रधर्म निभा सके, उनकी मुखर आलोचना हुई, 2002 को कलंक की तरह उनके माथे पर चिपका दिया गया, मुख्यमंत्री रहते हुए 10-10 घंटों का इंट्रोगेशन झेला, पर कभी माफ़ी नहीं मांगी (और इसी बीच जो हिंदुत्व के धर्मध्वज वाहक थे वो जिन्ना की कब्र पर नाक रगड़ आए)…

मोदी! ऊर्जा और प्रगति का पर्याय बनकर उभरे हमें लगा कि बस यही वो व्यक्ति है जो कुछ बदल सकता है…. हमने अपने स्वार्थों के लिए उसे प्रधानमंत्री चुन लिया… उसके आते ही बदलाव दिखने भी लगा पर धीरे-धीरे जब उस बदलाव की आंच हमारे दामन पर पहुँचने लगी तो वही आदमी हमें अखरने लगा, हमने कहा ये आदमी पागल है आखिर नोट भी कोई बदलने की चीज़ हैं, आखिर इतने सालों से स्टीमेट और डिलेवरी चालन पर हम ग्राहक को बिल दे ही रहे थे, अब ये क्या जिद है कि पक्का बिल ही देना होगा, ये भारत है यहाँ जबान की ही कीमत है। यहाँ विजय माल्या की दाढ़ी का बाल ही उसकी जमानत है जिस पर सरकार करोड़ों का लोन दे सकती है। ये आदमी हमारी विश्वास की डोर को तोड़ना चाहता है इसे बाहर करो…. मोदी हमारे काम के नहीं है ना हो सकते हैं क्योंकि हम आत्मिक भ्रष्टाचारी हैं। हमें इमानदारी का पाठ पढ़ने वाले का हश्र वही होगा जो मोदी का होने वाला है। ऐसा आदमी हमें नहीं चाहिए जो हमें ही ज्ञान देने लगे…

ये दुर्वासा की धरती है और यहाँ के लोग नोटा का लोटा हाथ में लेकर जल को अंजुरी में भर कर प्रतिज्ञा करे कि मोदी को भस्म करके रहेंगे…. तब भी अचम्भा नहीं होगा…

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY