अब हलक से ज़ुबान खींच के जवाब लेने के तेवर में है देश

तारीख : 19 जनवरी, 1990 #ExodusDay

जगह : पूरी कश्मीर घाटी

विषय : आजादी

“यहां क्या चलेगा, निज़ाम-ए-मुस्तफा”… “आज़ादी का मतलब क्या, ला इलाह इलिल्लाह”… “कश्मीर में अगर रहना है, अल्लाह-ओ-अकबर कहना है”… “असि गच्ची पाकिस्तान, बताओ रोअस ते बतानेव सान” (हमें यहां अपना पाकिस्तान बनाना है, कश्मीरी पंडित महिलाओं के साथ लेकिन कश्मीरी पंडितों के बिना)।

14 सितंबर, 1989 को भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष टिक्कू लाल टपलू की हत्या से कश्मीर में शुरू हुआ आतंक का दौर समय के साथ और वीभत्स होता चला गया। टिक्कू की हत्या के महीने भर बाद ही जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता मकबूल बट को मौत की सज़ा सुनाने वाले सेवानिवृत्त सत्र न्यायाधीश नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गई। फिर 13 फरवरी 90 को श्रीनगर के टेलीविज़न केंद्र के निदेशक लासा कौल की निर्मम हत्या के साथ ही आतंक अपने चरम पर पहुंच गया था।

घाटी में शुरू हुए इस आतंक ने धर्म को अपना हथियार बनाया और इस के निशाने पर आ गए कश्मीरी पंडित। उस समय आतंकवादियों के निशाने पर सिर्फ कश्मीरी पंडित थे। वे किसी भी कीमत पर सभी पंडितों को मारना चाहते थे या फिर उन्हें घाटी से बाहर फेंकना चाहते थे, इसमें वे सफल हुए।

आतंक की आड़ में यह शरुआत बहुत पहले ही हो चुकी थी मगर 19 जनवरी 90 को जो हुआ वह ताबूत में अंतिम कील थी। पंडितों के घरों में कुछ दिन पहले से फोन आने लगे थे कि वे जल्द-से-जल्द घाटी खाली करके चले जाएं या फिर मरने के लिए तैयार रहें। घरों के बाहर ऐसे पोस्टर आम हो गए थे जिनमें पंडितों को घाटी छोड़कर जल्द से जल्द चले जाने या फिर अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहने की नसीहत दी गई थी।

लोगों से उनकी घड़ियों को पाकिस्तानी समय के साथ सेट करने का हुक्म दिया जा रहा था। सिंदूर लगाने पर प्रतिबंध लग गया था। भारतीय मुद्रा को छोड़कर पाकिस्तानी मुद्रा अपनाने की बात होने लगी थी।

जिन मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से कभी इबादत की आवाज़ सुनाई देती थी आज उनसे कश्मीरी पंडितों के लिए ज़हर उगला जा रहा था। ये लाउडस्पीकर लगातार तीन दिन तक इसी तरह उद्घोष करते रहे थे। ‘यहां क्या चलेगा, निजाम-ए-मुस्तफा’, ‘आजादी का मतलब क्या ला इलाह इल्लल्लाह’, ‘कश्मीर में अगर रहना है, अल्लाह-ओ-अकबर कहना है’ और ‘असि गच्ची पाकिस्तान, बताओ रोअस ते बतानेव सान’ जिसका मतलब था कि हमें यहां अपना पाकिस्तान बनाना है, कश्मीरी पंडित महिलाओं के साथ लेकिन कश्मीरी पंडितों के बिना।

उस दौरान कर्फ्यू लगा हुआ था फिर भी कर्फ्यू को धता बताते हुए कट्टरपंथी सड़कों पर आ गए। कश्मीरी पंडितों को मौत के घाट उतारने, उनकी बहन-बेटियों का बलात्कार करने और हमेशा के लिए उन्हें घाटी से बाहर खदेड़ने की शुरुआत हो चुकी थी।

आखिरकार 19 जनवरी, 1990 को बाकी बचे लगभग तीन लाख कश्मीरी पंडित अनिश्चितकाल के लिए अपना सब कुछ छोड़कर घाटी से बाहर जाने को विवश हो गए।

यह साल 1990 नहीं है इसलिए कुछ नंगे सवालों के जवाब तैयार कर आईने के सामने खड़े होने की हिम्मत जुटानी चाहिए… एक आतंकी के हलाक होने पर बेशर्म फातिहों पर… मानवाधिकार और आज़ादी की चड्डी पहना कर… एक दफा फिर आदती नारे बदलने वाले गिरोहों को। सवाल नोट करिये…

  • 26 जनवरी 1950 को जब पूरे देश ने बाबा साहेब के गढ़े संविधान को अंगीकार किया। 566 रियासतें और 11 ब्रिटिश प्रांत भारतीय गणराज्य में शामिल होकर इसके हिस्सेदार बन गए। तब “कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है” के जुमले गढ़ने वाले निज़ामों ने जम्मू-कश्मीर को अस्थायी खुराफ़ात 370 के बुर्के में मुँह छिपा कर क्यों देश से अलग कर दिया?
  • जब जम्मू-कश्मीर के महाराजा ने भारत के साथ कानूनी रिश्ता जोड़ दिया, विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए और इसका स्वागत… पंडित नेहरू की उपस्थिति में शेख अब्दुल्ला ने यह कहते हुए किया : मुझे इस बात पर गर्व है कि मेरे जम्मू-कश्मीर ने भारत के साथ विलय करके उसका दामन थाम लिया है, तो फिर 370 क्यों?
  • महाराजा हरी सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को विलय प्रारूप पर दस्तखत करने के बाद खुद राजा का पद छोड़ दिया। इसी तरह बाकी 577 रियासतों और राज्यों के राजाओं ने भी यही किया, इनमें से दो रियासतों ने तो हस्ताक्षर भी नही किये थे, फिर जम्मू-कश्मीर को अलग क्यों रखा?
  • अनिवार्य प्रश्न अर्थात कंपल्सरी क्वेश्चन : 1947 की खुराफ़ातों, 1950 के रहस्यमय इन्तेज़ामात और 1990 के इस्लामी नारों को आज़ादी की क्रांतिकारी पुकार कहने वाले आज़ादीखोरों को यह साफ़ करना होगा कि : इस आज़ादी का मतलब : निज़ामे मुस्तफा, इस्लामी राज्य की स्थापना है? या लोकतांत्रिक दायरों में किसी अभिव्यक्ति की आज़ादख्याली से जन्मे आज़ाद देश की तथाकथित माँग? क्योंकि इस सबके बीच उस आतंकी जुवेनाइल की माँ कहती है : उसका बच्चा इस्लाम और खुदा की राह में शहीद हुआ है !!

इस घालमेल को साफ़ करके जवाब तैयार रखिये, देश अब हलक से ज़ुबान खींच के जवाब लेने के तेवर में है। बस एक बात ज़ेहन में साफ़ रखियेगा : यह साल 1990 नहीं है।

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY