दुनिया को बहुत महंगी पड़ती है, मुफ्त में मिल रही उनकी पवित्र पुस्तक

इस बार भी पुस्तक मेले में वे अपनी किताब मुफ्त बाँट रहे थे।इसमें उनका अपने रिलिजन का प्रचार-प्रसार कम बल्कि दूसरे के धर्म परिवर्तन का उद्देश्य साफ़ नजर आता है।

वो इसके लिए अपनी पवित्र पुस्तक का संबंध अमूमन वेदों से जोड़ते हैं। और यह करने के लिए वही एकमात्र घिसापिटा तर्क कि वेद भी एक निराकार ईश्वर की बात करते हैं।

अब इन्हे ज्यादा ज्ञान देने का कोई फायदा तो है नहीं कि जिस वेद का आप संदर्भ ले रहे हो उसकी इतनी अनंत व्याख्या है कि हर श्रुति पर एक ग्रंथ रचा जा सकता है। ब्राह्मण उपनिषद आरण्यक और इसी तरह के भाष्य की एक लम्बी श्रृंखला यूं ही नहीं है।

फिर भी ना जाने क्यों इस बार ऐसा कुछ हुआ कि एक व्यक्ति जब किताब देने के लिए अचानक एकदम सामने पड़ गया तो मैं भी एक मिनट के लिए रुका था।

और मैंने उससे अनायास ही कुछ बेहद सामान्य बातें पूछ ली थीं,

-यह पुस्तक आप के लिए पूज्य है?

जी।

-यह आपके मतानुसार पवित्र पुस्तक है?

जी।

-इस पवित्र पुस्तक को नमन करते हुए क्या मैं जान सकता हूँ कि इसका अपना एक आकार और अस्तित्व है या नहीं?

जी बिलकुल है।

-क्या इसमें लिखे शब्दों का अपना आकार रूप स्वरुप है या नहीं?

जी है।

-तो फिर क्या मैं पूछ सकता हूँ कि उस निराकार ईश्वर की व्याख्या के लिए इस साकार माध्यम की आवश्यकता क्यों पड़ी?

वो निरुत्तर था और अब बातचीत से बचकर निकलना चाह रहा था। मैंने भी उसे जाने देने से पहले बड़े प्यार से एक बात कह दी थी,

-कोई बात नहीं, अपने धर्मगुरु से इस सवाल का जवाब जरूर पूछना। और हाँ, साथ ही मैं तुम्हें एक बात और बताना चाहता हूँ कि हमारी मूर्ति पूजा भी उसी निराकार ईश्वर का साकार रूप ही है। चूँकि मूर्तियां मानव रूप में हैं तो भक्त को उनसे संबंध स्थापित करने समझने में आसानी होती है, बिना कुछ पढ़े ही सिर्फ देवता के दर्शन किये और ईश्वर की वंदना हो गयी। अब बताओ कि कौन सा मार्ग सरल है?

वो बिना जवाब दिए आगे बढ़ चुका था।

पास में ही आर्य समाज का स्टॉल था। वहाँ भी तो सत्यार्थप्रकाश मात्र दस रूपये में बांटी जा रही थी।

अन्य रिलिजन (मैं धर्म नहीं कहता क्योंकि धर्म सिर्फ सनातन है) वाले, हिंदुत्व पर प्रहार करने के लिए इसी सत्यार्थप्रकाश का संदर्भ लेते हैं।

मगर इससे विचलित होने की आवश्यकता मैं महसूस नहीं करता, क्योंकि सत्यार्थप्रकाश में जहां हिंदुत्व का विश्लेषण मात्र है वहीं अन्य रिलिजन की भरपूर आलोचना है।

सच कहें तो सनातन से निकले हर मार्ग की अपनी विशेषता है और अपना महत्व।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि स्वामी दयानन्द सरस्वती की विद्वता उस युग की आवश्यकता थी।

लेकिन आज के आर्य समाज के गुरुओं को यह तो मानना होगा कि सत्यार्थप्रकाश वैदिक सनातन की अंतिम व्याख्या नहीं हो सकती। क्योंकि अंतिम मानते ही आप वेद के उस भाव से दूर हो जाते हैं जिसके मूल में नेति नेति का दर्शन है।

और आर्य समाज के मेरे भाइयों से मूर्ति पूजा के विरोध पर यह तो पूछा ही जा सकता है कि उनके यज्ञ और अग्नि का भी अपना एक रूप स्वरुप और आकार है या नहीं?

और फिर सिर्फ अग्नि ही क्यों, सूर्य भी तो अपने साकार रूप में हमारे-उनके हर स्तुतिगान में है। क्या यह भी एक तरह की मूर्तिपूजा नहीं है?

और हाँ, जिस वेद की वे बात करते हैं उसमे इंद्र देव ईश्वर के मानवीकरण का सर्वोत्तम उदाहरण है।

काश, स्वामी दयानन्द होते तो उनसे इस पर उनके विचार जान पाता।

संक्षिप्त में कहना हो तो कह सकते हैं कि वेद के हर देवता ईश्वर के भिन्न भिन्न विशेष गुण शक्ति आदि का नामकरण है। एक अद्वितीय परमात्मा को हम उपासक गण उनके नाना गुणानुसार विभिन्न नामों से पुकारते हैं।

वेदों के किसी भी श्रुति में किसी भी देवता का स्तुतिगान करना उस निराकार ईश्वर की वंदना ही है। और फिर यह प्रकृति उस निराकार का साकार रूप ही तो है। हम स्वयं उस ईश्वर की एक रचना है, जिसका अपना एक आकार रूप स्वरुप है, तो फिर ईश्वर के साकार रूप की इतनी आलोचना क्यों?

जवाब तो उन्हें देना है, जो सवाल पूछने की इजाज़त नहीं देते।

वे तो जबरन मुफ्त में पुस्तक बांटने के चक्कर में रहते हैं।

क्या वे यह नहीं जानते कि दुनिया में कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता?

सच कहें तो मुफ्त में मिल रही उनकी पवित्र पुस्तक दुनिया को बहुत महंगी पड़ती है।

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