विराथु वाकई शांतिप्रिय संन्यासी थे पहले, जैसे मैं हुआ करता था सेक्युलर

कई अन्य महिलाओं की तरह मेरी माताजी को भी चूहों से बहुत डर लगता है। हमारे बचपन की बात है, घर में चूहा दिखा तो घर सर पर उठा लेना आम बात थी।

फिर चूहे को मारना यह पिताजी (घर में हों तो) या फिर मैं और मेरी छोटी बहन का काम रहता था। बहन को चूहों से कोई डर नहीं था बल्कि चूहों को मारने में उसे महारत हासिल थी। एक छोटी सी 2 नंबर की लकड़े की पुरानी क्रिकेट बैट उसका पसंदीदा शस्त्र था इस काम के लिए।

चूहे यहाँ से वहाँ दौड़ने की कोशिश करते, दौड़ते भी। लेकिन हम कमरा बंद कर देते थे ताकि वे बाहर भाग न जाये। फिर अलमारी या शेल्फ के नीचे लुकाछिपी चलती लेकिन बांस घुमाकर वहाँ से भी उनको भागने पर मजबूर किया ही जाता। जैसे ही वे खुले में आ कर रूम के दरवाज़े की तरफ दीवार से सिमटकर दौड़ते, उनका सामना बहन की बैट से होता । कलाई की एक ही फ्लिक से वो अपना काम पूरा कर देती।

एक बार हुआ यूं कि माँ किचन में ही थी और एक चूहे का नसीब खराब हुआ। माँ को हमेशा हम बाहर भगाते थे, उनकी खामखा की चिल्लाहट व्यवधान ही पैदा करती थी। लेकिन इस समय यह संभव नहीं था, वे अंदर ही रही।

चूहा जल्द ही बाहर निकला लेकिन दीवार के कोने में सिमटकर टुकुर टुकुर देखता रहा। और उसको देखकर माँ को दया आ गयी।

देखो न कैसा बेचारा लग रहा है!

बहन का ध्यान विचलित नहीं हुआ था, उसने रूखे सुर में तंज़ फेंका – देखो माँ, तुम्हारी खातिर हम इन्हें मारते हैं, वरना मुझे कोई समस्या नहीं, खेल भी लूँगी उनके साथ, तुम्हें चलेगा?

कल्पना से ही माँ चीख उठी। चीख से चूहे ने अपनी जगह से छलांग लगाने की कोशिश की लेकिन बहन की बैट के उस फ्लिक ने अपना काम कर दिया।

चूहे, जिन्हें मूषक भी कहा जाता है, विध्वंस ही करते हैं। अनाज, फसल खा जाते हैं, बिल्डिंग की नींव दीवारें खोदकर खोखली कर देते हैं । जहां आसरा पाते हैं, नुकसान के सिवा कुछ नहीं। बेहिसाब पैदावार ही उनका लक्षण है और पेट भरने के लिए यह सब करते हैं। उनको खाने के लिए खेतों में साँप आते हैं उनका भी स्वागत इसलिए होता है कि भले ही वे ज़हरीले ही, पर वे चूहों को खाते हैं, इतनी चूहों की महिमा है।

आजकल रोहिंग्याओं को प्रत्यर्पित किया जा रहा है। यहाँ से बंगलादेश भेजा जा रहा है। उनके जो भी फोटो आ रहे हैं उनमें सभी के चेहरों पर बेचारगी के भाव हैं। ये फोटो यूं ही नहीं प्रसिद्ध किए जाते, इनका उद्देश्य एक ही है कि जनता के मन में सरकार के लिए क्रोध निर्माण हो कि कितनी असंवेदनशील सरकार है। विदेशों में भी सरकार की बदनामी हो।

अभी उनके समर्थन में प्लेकार्ड गैंग कब आती है वहीं देख रहा हूँ, हो सकता है किसी नए फिल्म के लॉन्चिंग का मौका उठाया जाएगा, डूडनियां अपने अपने डूडों को अपनी डीपी बदलने की धमकियाँ देंगी इत्यादि।

लेकिन पसीजने के पहले जरा यह भी सोचिए कि उनको म्यांमार से किस लिए भगाया गया और बंगला देश ने उन्हें भारत में पास-ऑन क्यों किया, अपने ही पास क्यों नहीं रखा और बाकी 56 देशों ने भी क्यों नहीं बुलाया… गूगल पर विराथु के बारे में पढ़िये, वाकई शांतिप्रिय संन्यासी हुआ करते थे पहले तो।

जैसे मैं भी सेक्युलर हुआ करता था।

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