3 Idiots के बहाने : शिक्षा पर चर्चा, कुछ खरी, कुछ खोटी


कल एक मशहूर हिन्दी दैनिक में अपने पसंदीदा स्तंम्भकार जयप्रकाश चौकसे के नियमित स्तंभ में फ़िल्म थ्री ईडियट को वर्तमान शिक्षा प्रणाली को कमियों को दर्शाने वाली बेहतरीन फ़िल्म का तमगा देना दिल को कचोट गया।

वह फ़िल्म जिसका भारतीय परंपरा में वर्णित गुरुओं की ईश्वर तुल्य सत्ता को एक हास्यास्पद स्थिति में डालने की सोची समझी रणनीति के अतिरिक्त शिक्षा से कुछ लेना देना नहीं  हो, उसे भारतीय शिक्षा व्यवस्था का एक रहस्योद्‍घाटक सिनेमा मानना इस जैसे कीर्तिमान लेखक को कितना शोभा देता है, यह सुधी पाठकगण खुद  निर्णय करें।

भारतीय शिक्षा पद्धत्ति वास्तव में भारतीय जन मानस के उस जीवट का प्रतिबिम्ब है जो भौतिक उपादानों की अनुपलब्धता के बाद भी ज्ञान अर्जन की अदम्य मुमुक्षा को सँजोये रहता है और अभावों को चुनौती मान कर ज्ञानार्जन के अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिये अपनी दैविक,  दैहिक, आध्यात्मिक व आत्मिक शक्ति का प्रयोग करने से नहीं चूकता है।

भारत में  अगर अर्जुन के लिये भी विद्या स्रोत उपलब्ध है तो एकलव्य और कर्ण के लिये भी। ब्रह्मास्त्र का ज्ञान यदि लक्ष्मण को था तो मेघनाद को भी। निराकार परब्रह्म का साकार आविर्भाव सिद्ध होने पर भी राम और कृष्ण को सामान्य मनुष्य आचार्यों से शिक्षा लेनी पड़ी है तो  आर्य चाणक्य ने गली मुहल्ले के खेलते बच्चों में से भारत का भावी सम्राट भी ढूँढा है।

संसाधनों के अभाव ने ही बिहार औए यूपी के गुदड़ी के लालों को आइएएस, आइ आइ टी और आइ आइ एम में चयनित होने का हौसला दिया है  जबकि संसाधन पूर्ण अमरीका का छात्र अपने विद्यालय के सहपाठियों के साथ गुरु को भी  गोलियों से छलनी कर रहा है। पर राजू हीरानी की यह फ़िल्म शिक्षा, शिक्षक और शिक्षण संस्थाओं का मज़ाक उड़ाने के अलावा कुछ नहीं करती। यह पूरी फ़िल्म पढ़ाई के नतीजों का मजाक उड़ाती हुई दरअसल पढ़ाने के तरीकों की तलाश में भटकाव की कहानी है।

कहानी में एक अद्वितीय अभियान्त्रिकी महाविद्यालय का डीन परिन्दे का अंडा फोड़ कर प्रतिस्पर्धा में जीत के लिये प्रतिस्पर्धी को मारने का मार्ग दिखा कर सत्र की शुरुआत करता है तो वहाँ का सबसे चर्चित और विद्वान छात्र रैगिंग के नाम पर जूनियर छात्र के कमरे के गेट पर मूत्र विसर्जन करने वाले सीनियर को वैज्ञानिक विधि से बिजली का झटका तो महसूस करवाता है पर खुद नशे में धुत दो मित्रों के साथ डीन के दरवाजे पर पेशाब करने पर थोड़ी भी शर्म महसूस नहीं करता है।

इस कालेज के छात्र किताब पलटते या क्लास में पढ़ते तो दिखते नहीं पर बियर की बोतल जरूर खरीद कर ले आते हैं। परिभाषाओं के मुद्दे पर शिक्षकों का मजाक उड़ाता हुआ छात्र अपने मित्रों के नाम में अंग्रेज़ी भाषा के कुछ उपसर्ग और प्रत्यय लगा कर कक्षा में अधिगमजन्य उत्तेजना तो पैदा कर देता है पर पढ़ाया क्या जाये ये दायित्व उसी शिक्षक पर छोड़ देता है जिसका मज़ाक पूरी फ़िल्म में वह बनाता रहता है।

अपने लफ़्जों के जाल में फँसा कर छात्रों को कुछ अन्तराल के लिये सम्मोहित तो किया जा सकता हैं पर 4-5 साल तक पढ़ाने के लिये सिलेबस में क्या हो, ये बात यह फ़िल्म नहीं बताती है। रटने की बुराई बताने के लिये सम्माननीय अतिथि मन्त्री के सामने अपने डीन की सॉलिड बेइज्जती और अतिथि का 2000% अपमान दिखा कर निर्देशक कौन सा शैक्षणिक बदलाव की चाहत रखता है ये तो वही बता सकता है या चौकसे साहिब।

पर मैं ये बात बड़े दावे के साथ यहाँ रखना चाहता हूँ कि आज तक कोई ऐसा प्रश्नपत्र डिजाइन नहीं किया जा सका है जहाँ रटी गई सूचनाएँ बेकार साबित हुई हों।  अगर स्मरण शक्ति के ऊपर समझ को सर्वोपरि मान लिया जाये तो शायद परीक्षा शब्द को शब्दकोश में से निकालना होगा। आज तक की सारी विद्यालयीय और विश्वविद्यालयीय परीक्षायें स्मरण शक्ति की कसौटी ही साबित हुई हैं जबकि प्रतियोगिता परीक्षाओं में समझ को जाँचने के लिये विषयातीत और संदर्भहीन  तार्किक प्रश्न पूछे जाते हैं जिसका नाम प्रतियोगिता की भाषा में शाब्दिक और अशाब्दिक तार्किक अभिरुचि नाम दिया गया है।

चौकसे साहब के अनुसार जो नायक शिक्षा पद्धति की बुराइयों का ह्विसिल ब्लोअर बना हुआ है वह पूरी फ़िल्म  में दोस्तों के साथ मस्ती करता, बियर पीता, डीन के आफ़िस की नकली चाभी जुगाड़ता, अपने डीन का हास्यास्पद और अपमानजनक नामकरण करता हुआ, तरह तरह के इलेक्ट्रिक उपकरणों को बनाता हुआ, बारातों में खाने के लिये  गेट क्रैश करता हुआ और डीन की बेटी को लेपेटे में लेता हुआ दिखाई तो देता है तो है पर न तो कभी पढ़ता हुआ दीखता है और न ही ये पता चल पाता है कि ये बन्दा इंजीनियरिंग के किस ट्रेड का छात्र है।

रैंचो के बिन्दास चरित्र के पीछे उसका अपने मालिक के बेटे के लिये सार्टिफ़िकेट अर्जन की अदृश्य उत्तरदायित्वहीन प्रक्रिया भी है जो उसे निष्काम दिखाता है वरना उसे अगर अपनी फ़ीस जुगाड़ने का जिम्मा भी मिल गया होता तो उसके चेहरे पर भी राजू रस्तोगी और फ़रहान  के माँ बाप की मायूसी ही चस्पा होती।

दरअसल  ये कहानियाँ गुरु शिष्य संबंधी भारतीय मान्यताओं पर साम्यवाद की छाया है। गुरु का उपहास वास्तव में शिष्यों का साम्यवाद है जो परम्पराओं का नाश कर भारत की असीमित ज्ञान शक्ति के ह्रास का मार्ग प्रशस्त करता है। ज्ञान ही भारत की शक्ति रहा है और उस पर सुनियोजित कुठाराघात धीरे धीरे उसे निर्बल बनाने की कोशिश है।

कुछ काम तो मैकाले ने कर दिया बाकी काम बुद्धिजीवी लोग कर देंगे। आचार्य चाणक्य ने एक स्थान पर लिखा है कि –

” लालयेत् पंच वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत् प्राप्ते तु षोडषे वर्षे पुत्र मित्रवदाचरेत् ॥” पर  आज कल पीटने की बात तो दूर,  डाँटने तक पर छात्र शिक्षक पर मानसिक प्रताड़ना का अभियोग लगा कर उसे सज़ायाफ़्ता बना सकता है।

दरअसल ये फ़िल्म अगर उपदेश ग्रहण करने की दृष्टि से न देखी जाये तो मनोरंजक है पर जैसे ही आपने इसमें से शिक्षा के सूत्र ढूँढने की कोशिश की ये फ़िल्म आपको बेपटरी करने का कोई मौका नहीं छोड़ेगी।

इसलिये मेरा तो यही मानना है कि चौकसे साहब इसे शिक्षा जगत का पोल खोलू आर-टी-आइ मानने के बदले उस महाविद्यालय में वीरू सहस्रबुद्धे के अलावा २०-३० प्रोफ़ेसरों का जुगाड़ कर देते या दो चार कालांश में कुछ पढ़ाने का सीन और विषयवस्तु डाल देते और नहीं तो रैंचो का इंजीनियरिंग ट्रेड या डिपार्टमेण्ट फ़ाइनल करवा देते तो उन्हें भी ये गलतफ़हमी नहीं होती।

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