बलरामायटिस क्या होता है?

बलराम, जैसा कि आप जानते ही होंगे, श्रीकृष्ण के बड़े भाई थे, बलदाऊ नाम से भी भी जाने जाते हैं। सर्वश्रेष्ठ गदाधर थे तथा भीम एवं दुर्योधन दोनों के ही इस विधा के गुरु भी थे। इसके बावजूद वे हमेशा हलधर ही कहे जाते हैं और उनका शस्त्र भी हल ही दिखाया जाता है, लेकिन यह हमारा विषय नहीं।

महाभारत का युद्ध उन्हें पसंद नहीं था। जब कृष्ण ने स्पष्ट रूप से पांडवों का पक्ष लिया तो फिर उन्होंने खुद को युद्ध से दूर रखना पसंद किया और रैवतक पर्वत की यात्रा पर चले गए। लौटे तब तक युद्ध समाप्त हो चुका था लेकिन भीम दुर्योधन का द्वंद्व चल रहा था।

बहुत देर तक नियमों से खेलते रहे पहले से थके भीम को सरोवर से तरोताजा निकले दुर्योधन के सामने हलका पड़ते देख कृष्ण ने इशारा किया और भीम ने दुर्योधन की जंघा पर वार किया।

नियमबाह्य कृत्य था जिससे बलराम क्रोधित हो उठे और हल उठाकर भीम को मारने दौड़े। कृष्ण ने रोका और कई प्रसंगों के उदाहरण से उनको समझाया तब मन मसोस कर बलराम शांत हुए फिर भी भीम की उन्होने निंदा की और दुर्योधन को स्वर्गप्राप्ति का आशीर्वाद दे कर वहाँ से चले गए।

बलराम बहुत सरल और निष्कपट व्यक्ति थे, जो आंखों के सामने हो रहा है उस पर निर्णय लेने वाले थे। पूरी कार्य-कारण श्रृंखला में उन्हें प्राय: रस नहीं था। कृष्ण ऐसे नहीं थे। किसका पक्ष क्यों लेना है और फिर उसके लिए क्या करना चाहिए इसपर उनका दृष्टिकोण पूर्णत: यथार्थवादी था।

आज हिंदुओं को बलराम बन जाने के लिए शकुनि उकसा रहे हैं। काफी हद तक सफल भी हो रहे हैं, ‘बलरामायटिस’ तूल पकड़ रहा है। दुर्योधन कुछ भी कर लें, उसको यह कहकर नज़रअंदाज़ किया जा रहा है कि वो तो है ही ऐसे स्वभाव का, लेकिन आप को तो अपने उसी मार्ग पर चलना चाहिए जिसपर आप के पूर्वज चले थे – यहाँ वे इस बात को नहीं कहते कि वे पूर्वज हरवा दिये गए थे।

आज आप को कई मिलते हैं जो या तो आप को यह झुनझुना पकड़ा देते हैं या उनको किसी ने यह झुनझुना पकड़ा दिया है कि ये भाजपा अटलजी की नहीं है। उन्हें बस यह एक ही वाक्य आता है और उसे ही रटते रहते हैं। उसका उत्तर भी इसी खेमे ने दिया हुआ है जो हिंदुओं के गले कुछ ऐसा उतरा है कि उन्हें लगता ही नहीं कि यह उत्तर भी उन्हें पढ़ाया गया है। ये उत्तर है कि अटलजी को भी हिंदुओं ने ही हरा दिया था।

अर्ध सत्य है यह उत्तर। आधा सत्य यह है कि नरसिंह राव की सरकार गांधी परिवार की सरकार नहीं थी और जब अटलजी की सरकार को विदा किया गया तो किसी को इसका कोई अंदाजा नहीं था कि सोनिया क्या करेगी। तुलना के लिए राव सरकार का कामकाज ही था जिसमें मौनी जी ने कई अच्छे काम किए थे। सोनिया unknown quantity थी जिसके तेवरों का जनता को पता नहीं था।

साथ साथ, अटलजी की मिली जुली सरकार दुबारा न आए इसलिए काँग्रेस ने क्या क्या किया था इसके बारे में कोई नहीं बोलता, बस यही कहता है कि हिंदुओं ने अटलजी को हरा दिया।

आज ये लोग अटलजी को इसलिए याद कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने अटलजी को हराया था। बाकी जनता की याददाश्त से उसकी सूझबूझ अधिक अच्छी होती है इसलिए जनता को भी यही पकड़ा दिया कि हाँ आप ने ही अटलजी को हराया था। वे अच्छे थे, मोदी उनके जैसे नहीं हैं। बात समझ में आ ही गयी होगी।

बदलते समय के अनुसार रणनीति बदलनी आवश्यक है ही, घोषित अग्रक्रम भी बदलने आवश्यक हो जाते हैं। War is politics by other means यह क्लोज्वीट्ज़ का उद्धरण भूलना नहीं चाहिए। जिस तरह से कामकाज में रोड़े अटकाए जा रहे हैं, रणनीति में बदलाव होंगे यह अनिवार्य है।

शकुनिओं को यही अवसर दिखता हैं जहां वे कुछ इन तरीकों से भ्रमित करने की कोशिश करते हैं –

  • क्या हुआ तेरा वादा –

कई वादे हैं जिनसे इनको कोई लेना देना नहीं है लेकिन परसेप्शन बनाने के काम आते हैं। मज़े की बात यह भी है कि ये लोग कई ऐसी बातें खुद की ओर से जोड़ देते हैं और फिर कहने लगते हैं कि यह वादा पूरा नहीं हुआ। बिलकुल मिट्टी के रुपये वाली कहानी।

  • तो इनमें उनमें क्या फर्क रहा –

असल में तो यहीं पर वे एक्सपोज़ हो जाते हैं कि ये जो खुद को मोदी या भाजपा का नाराज़ समर्थक बतलाते हैं, वे कभी रहे ही नहीं। ये बात का कहना ही दिखाता है कि वे पाला बदलना चाहते हैं। सच्चाई यही होती है कि वे अपनी बात से औरों को बताते हैं कि आप को पाला बदलना चाहिए।

अधिकतर बातें इनमें ही कवर हो जाती हैं। ये उन कालनेमियों की बात है जो खुद को नाराज भाजपाई बताते हैं। बाकी रहे खुले विरोधक, वे अटलजी अच्छे थे आदि राग नहीं अलापते। उनसे बलरामायटिस का खतरा नहीं होता।

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